‘औघड़’ भारतीय ग्रामीण जीवन और परिवेश की जटिलता पर लिखा गया उपन्यास है जिसमें अपने समय के भारतीय ग्रामीण-कस्बाई समाज और राजनीति की गहरी पड़ताल की गई है। एक युवा लेखक द्वारा इसमें उन पहलुओं पर बहुत बेबाकी से कलम चलाया गया है जिन पर पिछले दशक के लेखन में युवाओं की ओर से कम ही लिखा गया। ‘औघड़’ नई सदी के गाँव को नई पीढ़ी के नजरिये से देखने का गहरा प्रयास है। महानगरों में निवासते हुए ग्रामीण जीवन की ऊपरी सतह को उभारने और भदेस का छौंका मारकर लिखने की चालू शैली से अलग, ‘औघड़’ गाँव पर गाँव में रहकर, गाँव का होकर लिखा गया उपन्यास है। ग्रामीण जीवन की कई परतों की तह उघाड़ता यह उपन्यास पाठकों के समक्ष कई विमर्श भी प्रस्तुत करता है। इस उपन्यास में भारतीय ग्राम्य व्यवस्था के सामाजिक-राजनैतिक ढाँचे की विसं&
Born in 1984 in Santhal Paragana, a remote area of Jharkhand, Nilotpal Mrinal has already established himself among the readers and literary intellectuals with his first novel 'Dark Horse'. Nilotpal, originally hails from Bihar, is also active in political and social activities for the last several years after completing his education from St. Xavier's College, Ranchi. Along with playing a special role in student movements, Mrinal has already reached to TV platform in the field of folk music. These days, he's also trying his luck in poet-concerts and gaining popularity.
"औघड़ अपने समय का गोदान है" : आज के गाँव का कच्चा सच लिखा है औघड़ ने । गाँव का जिक्र आते ही जिनके मन में सरसों के खेतों से धानी सूट पहने नाचती हुई लड़कियाँ निकलने लगती हैं उनके लिए confrontation with reality का क्रैश कोर्स है औघड़। जिन ऊँची मुम्बईया इमारतों के ऐसी कमरे से देश रंगीला रंगीला, देश मेरा रंगीला दिखता है, उनके लिए भारतीय ग्रामीण आँचल में उपस्थित विसंगतियों, जातीय दरारों और वर्गीय शोषण का ब्लैक एंड वाइट एक्सरे है औघड़।
अगर आप अंग्रेज़ी फिक्शन लेखकों की कल्पनाहीनता से ऊब गए हों जो क्रश और सेक्स के अलावा कुछ सोच नहीं पाते, अगर आप मोटिवेशन और कॉन्फिडेंस की गोली बेचते झोलाछाप 'यू कैन डू इट', लेखकों की हवा पम्पू बकबक से ऊब गए हों और अगर आप आसान भाषा में अपने आसपास की सच्चाई बयान करता कुछ पढ़ना चाहते हैं तो "औघड़" खरीद सकते हैं। ये औघड़ आपके बने बनाये मानकों पर तो चोट करेगा ही, आपके सामने परंपराओं और मान्यताओं के खोखलेपन को भी खोल देगा। उपन्यास का नायक है बिरंची, कोई समीर हवा का झोंका टाइप नाम नहीं है इसका। 30-32 साल का लौंडा है , न काम ना ठिकाना। रोज सुबह ठाकुर फूँकन सिंह की दीवार पर मूतने चला जाता है। बताइये, एक छोट जतिया, गाँव के ठाकुर की दीवाल पे मूते, ऐसा जिगरा रखता है। कहता है कि धीरे धीरे इससे दीवार ढहा देगा। ये दीवार सिर्फ फूँकन के पिछवाड़े की दीवार नहीं है, यह उसके जातीय अहं की भी दीवार है। शंका मत लाइये मन में, उपन्यास खत्म करते करते आप भी फूँकन की दीवाल पे लघुशंका करते मिलेंगे। हाँ तो नायक है एक नंबर का लखैरा, बीए पास गंजेड़ी। मगर नॉलेज में जेएनयू के क्रांति क्रांति खेलते लड़कों को भी पानी पिला देता है। किताबी मार्क्सवादी इससे कहते हैं कि धर्म की अफीम छोड़ो, ये उनसे कहता है पहले तुम अफीम छोड़ो। करम में ये पूरे गाँव का है, परंतु पूरे गाँव मे कोई इसका नहीं है। जब जिसको जिस प्रकार की जरूरत हो बिरंची तैयार है, और बिरंची की अपनी जरूरतें कुछ नहीं हैं, हर फिक्र को धुवें में उड़ाता चला रहता है। एक ठाकुर हैं गाँव मे फूँकन सिंह। जैसा कि उत्तर भारत के गाँवो में देखा जाता है, गाँव की पूरी राजनैतिक प्रशासनिक व्यवस्था गांव के बाहुबली अर्थात उनके ही इर्द गिर्द घूमती है। सारे टेंडर उनके नाम, लकड़ी वो कटाएँगे, बालू वो ढोवाएँगे, बीडीओ दारू टीपने उनके यहाँ आएंगे, दरोगा मुर्गा भांजने उनके यहाँ जाएगा। फूँकन सिंह बात में ज्यादा विश्वास नहीं रखते ,चीत में रखते हैं। उनके मैक्सिमम काम सामने वाले की चीत्कार निकाल के होते हैं। यही वजह है कि उनके यहाँ काम करने वाले लटकु की कटही वाइफ शीला, जो लटकु के लिए मेहारू है, फूँकन सिंह के लिए मेहरुन्निसा है। वहीं फूँकन सिंह के पिताजी पुरुषोत्तम दास मास्टरमाइंड आदमी हैं, राजनीति से काम लेते हैं। महाभोज के दा साहब के करीब पहुँच जाते हैं बड़े ठाकुर। कहानी का मौका और दस्तूर है परधानी के इलेक्शन का। गाँव के लिए परधानी का इलेक्शन गेम ऑफ थ्रोन्स के कास्टरली रॉक थ्रोन से कम लेवल का नहीं होता। गाँव के चुनाव परनाले से लेकर पाकिस्तान के मुद्दों तक लड़े जाते हैं। माहौल तब से शुरू होता है जब बदरी मिशिर अखबार में चुनाव की डेट डिक्लेअर होने की खबर पढ़ते हुवे घोषणा करते हैं, "विंटर इज कमिंग"। गाँव की फिजा में चुनाव के जातिगत कॉम्बिनेशन तैरने लगते हैं। कौन से रियेक्टेंट से कौन सा प्रोडक्ट निकलेगा अबूझ हो जाता है। एक तरफ हैं प्रधानी के प्रबल दावेदार फूँकन सिंह और एक तरफ है बिरंची। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब कहानी के सीधे से दिखने वाले सबड्यूड पात्र अपने अपने पत्ते खोलते हैं। सस्पेंस कहानी के अंत तक है और कुछ भी खोलने की बत्तमीजी मैं यहाँ नहीं करूँगा। बस इतना कहूँगा कि औघड़ बिरंची जाते जाते लखन लुहार को तो औघड़ कर ही गया, पाठकों को भी औघड़ करने की पूरी योजना के साथ गया है। औघड़ की भूमिका में लेखक ने लिखा है कि उसने किसी को नहीं बख्शा है और उसने सच में किसी भी किताबी ज्ञान वादी को नहीं बख्शा है। गांजा वादी भारतीय मार्क्सवाद जिसके विचारों के कैनवास में भारत आता ही नहीं है, मार्क्स से चलकर, माओ से होते हुवे (भगत सिंह को इग्नोर करके) फिदेल कास्त्रो पे पहुँच जाता है, भारतीय जनमानस के आसमान में उसके परकटे पन को आइना दिखाना जरूरी भी था। लफुआ नारीवाद जिसके लिए नारी की मुक्ति , ब्रा स्ट्रैप बाहर लटकाने की स्वतंत्रता के समकक्ष है, मधु के माध्यम से, गाँव घर मे नारी की वास्तविक स्थिति का सामना व्यंग्य के झन्नाटेदार झापड़ से कराना जरूरी हो जाता है। पुरुषवादी पुरुष केवल अपनी पत्नी का घूंघट उतारना चाहता है, नारीवादी पुरुष सबकी पत्नियों के घूंघट उतारना चाहता है। कुछ खास लोगों को तो बुला बुलाकर , जूता मारा है लेखक ने। जब चुनावी घोषणा हो जाने के बाद शेखर की मोटरसायकिल, लखन की झोपड़ी के सामने रुकती है, मैं उसके झोपड़ी में घुसने से पहले ही लोटपोट हो जाता हूँ। मैं जान जाता हूँ कि नीलोत्पल भइया इसे फिर यूनिवर्सिटी से उठा लाये हैं मार्क्स कम नारीवादियों की फजीहत करने। भाषा की शैली उनकी अपनी है, जब जिस भाषा /बोली को आदेश करते हैं, संवेदना के भाले की नोक में जाकर लग जाता है। सच्चाई के कड़वेपन को हास्य की मिश्री में घोलकर परोसते हैं, स्वाद देर तक बना रहता है। संवेदना का स्तर तो ये है कि अपने आँसू समेट कर चली जाने वाली मधु आपके अपने आप को नोचने पर मजबूर कर जाएगी। किसी चुटीले प्रसंग पर हंसते हँसते आपके सामने चीज़ों की निःसारता उजागर हो जाएगी और आप रो देंगे। भइया ने कहा भी था कि यूनानी ट्रैजिकल कॉमेडी जैसा कुछ प्रयास किया है और मैं कहूँगा कि पाठक की कैथार्सिस में आप सफल रहे हैं ....इससे ज्यादा क्या कहूँ, हर पन्ने का अपना तंज है, कहीँ कहीं ध्यान देना होगा, नहीं तो मिस कर जाएंगे...अंत मे इतना कहूँगा कि अगर आप 'महाभोज' और 'धरती धन न अपना' के कंबाइंड तेवर को श्रीलाल शुक्ल और परसाई जी के आशीर्वाद पोषित व्यंग्य में पढ़ना चाहते हैं तो औघड़ पढ़ लीजिये। एडुकेट कर देगी आपको"
" हर क्रांतिकारी - मार्क्सवादी बेटे के पीछे एक ठीक ठाक पूंजीवादी बाप होता है जिसके भेजे पैसे पे फुटानी और क्रांति चलता है । जिस दिन ये महीने का पैसा भेजना बन्द हो जाएगा न, उसी दिन क्रांति का तंबू जरूरत और अभाव की आंधी में उड़ जाएगा । अभी रोटी दाल की चिंता नही है न, इसलिए देश का चिंता वहन कर लेते हो । जब रोटी आएगा न समस्या बन के तब देश के चिंता का बोझ उतर जाएगा ।पीठ पर गृहस्थ का बोझ लादने के बाद जगह ही कहाँ बचता है कि उसपर दूसरा बोझ रखा जाए ।
The "औघड़" was Nilotpal's second novel after impeccable succes of his debut book "Dark horse". The success of "Dark Horse" some how convince me to hold this book.
The entire story is plotted in rural village of Malkhanpur. It tries to make a significant dint on political - sociological complexities and was largely successful in delivering what he wanted to.The delivery of strong message in a sarcastic way makes Nilotpal stand in a different queue. The book has lot to offer, good story, unique characters, untouchability, discrimination, unemployed youth, education, sarcasm, irony and in the end a lot of emotions as story meets a tragic and unexpected end.This could be a treasure for eager reader, wants to feel and live village life just by holding this particular book. This piece of work was largely successful in portraying and attacking prevailing caste system and existing hypothetical democracy at such a low level as Panchayati Institution.
On the whole, in this dominating english novel age, Nilotpal's this piece of work prove to be a sigh of relief for hindi lover. A must read book for everyone.
यह किताब 21वी सदी के वैसे गाँव का दर्पण है जिसमे सामंतवाद जा रहा है पर गया नहीं है, विज्ञान आ रहा है पर आया नहीं है, और पूंजीवाद खुद को जल्द से जल्द गाँव के संस्कार एवं संस्कृति में घोल लेना चाहता है| इस बहते बदलाव की गंगा में सभी लोग चाहे वो गाँव के पढ़ी लिखी पीढ़ी हो , बाहर काम करने वाले लोग हो या बाहर से पढ़ के आए बुद्धिजीवी हो, सब हाथ धोना चाहते है| शायद जो इन सब से अलग है वही औघड़ है या अलग रह के कुछ कर नहीं पाने से कुंठित है वो औघड़ है या फिर जो इन सब तरह के "वादी" वालो से अलग खुद का सोच लिये चल रहा है निर्भीक और निश्चिन्त वो औघड़ है!!
Tldr: An excellent book that is well worth a read.
This is a book that is much better than what I was anticipating it to be. There are a lot of unexpected twists, delivered at a very slow pace. It’s written in very regional form of hindi which was a bit awkward for me at the beginning and I easy grew to like it a lot. It’s funny at places, it’s sad at others and entertaining throughout.
Told in a third person, the point-of-view character in the book often changes with the chapters. While changing the characters, the author maintains his focus on describing the actions and motivations behind all of them.
I only have a couple of issues with the book. One is that the book is bit too through. There aren’t enough places where the reader is allowed to think for themselves and draw their own conclusions. This takes a rather fascinating and frustrating form in the way in which every quote from the characters end. Almost everything that a character says in the book ends with a description of how and why those words are spoken. So almost every sentence ends with a “said this angrily”, “said this relentlessly arguing”, “said sharply” etc. This get boring after a hundred pages of this, but a bit later it almost became funny for me because not once do we have the same description repeated.
The only other issue I had with the book is that it is too down on everything. It is really nice to read such a skeptical point-of-view especially in the context of the WhatsApp ecosphere that accepts anything that agrees with them. But at the same time, it kinda makes you feel hopeless. And that can encourage inaction too. It focuses too heavily on the futility of trying to change. The only character that changes, dies at the end. What am I supposed to take from that?
This entire review has been hidden because of spoilers.
I would recommend aughad to everyone who wants to feel and experience village life....it showcases the brutal side of our society in which u can not trust anyone or any relation, where all the higher authorities are in hand of powerful and rich people..no one cares about the life of poor ones..and they believe "everything is fare in politics"... story is slow in the beginning, middle part is quite heart rending , emotional and touching but climax..oh my god climax of AUGHAD is very despairing and sorrowful..
I would recommend aughad to everyone who wants to feel and experience village life....it showcases the brutal side of our society in which u can not trust anyone or any relation, where all the higher authorities are in hand of powerful and rich people..no one cares about the life of poor ones..and they believe "everything is fare in politics"... story is slow in the beginning, middle part is quite heart rending , emotional and touching but climax..oh my god climax of AUGHAD is very despairing and sorrowful..
लेखक ने गांव के जीवन को सजग रूप से अपनी पुस्तक में दर्शाया हैं। गांव का रहन सहन , वहाँ की आशाएं, निराशाएं, राजनितिक, सामाजिक तरंगो को किसी कारीगर के तरह पिरो कर हमारे सामने प्रस्तुत किया हैं। पढ़ते समय किताब को रखने का मन नहीं करता, हर किरदार के साथ आप जुड़ जाते है। यह पुस्तक वर्तमान सामाजिक-आर्थिक परिवेश पर व्यंग्यपूर्ण टिप्पणियों से भरी हुई है, जो हमारे देश की कठोर वास्तविकताओं को सामने लाने के साथ-साथ हंसाती भी है। The ending of the book is however, very abrupt as against the storyline which is very compelling. However, would definitely recommend reading the book, given the in-depth dive it takes in rural India, the compelling storyline and the representation of the 70% of our country's population, which is usually missing in the books we read.
This novel gives you a real peek into life in rural North India. Woven through the story are women’s struggles, caste tensions, and deep economic divides. Told with a belly-laugh style, it still hits hard when it talks about what folks in a small Indian village deal with everyday!
The action takes place in Malkhanpur village. Here, Biranchi Kumar is that simple guy everyone can’t quite decide if they love or hate. He stands against the most vicious power couple you can imagine, Purushottam Singh and Phukan Singh. When the news of the village Panchayat elections drops, Biranchi throws his hat into the ring and the election quickly turns into a messy mud fight. You’ll want to pick it up to see how dirty it really gets!
The author knows how to mix a good joke with hard truth. Some pages have you chuckling, while others serve a dose of village reality that gets you thinking hard. You’ll laugh, you’ll cringe, and by the last chapter, you’ll maybe even see your own neighborhood in these Malkhanpur streets!
This book blew me away! Let me tell you, Biranchi is the real standout hero, while Pabittar Das is pure villain material. The story is a reminder that, at the end of the day, we can only trust on our parents to be on our side. It packs in some lessons you won’t soon forget!
Even though the story felt super real, I couldn’t help but wonder why it had to end like that. Why do people lie? Why is it so simple to get wrapped up in trickery? Those questions keep swirling around in my mind, showing up everywhere, not just in politics!
I totally think you should check out Aughad if you want a taste of village life from the safety of your couch. It doesn’t sugarcoat a thing, the story shows how the rich look the other way while the weak get walked on. It starts a little slow, but once you hit the middle, it gets seriously intense, and the ending? Absolutely crushing. I highly recommend this book to everyone! 🫶🏻
पूरी पुस्तक में केवल जाति ही केंद्रीय विषय रहा है। उपन्यास काफी लंबा था। कहानी एक चलचित्र (बॉलीवुड फिल्म) की तरह थी — ठाकुर शोषण करेगा, लाला लूटेगा, ब्राह्मण पाखंड करेगा और बाकी सभी पात्र सताए गए होंगे। यदि कोई सवर्ण वर्ग का पात्र जातिवादी नहीं है, तो उसका मार्क्सवादी होना अनिवार्य है। भाषा ठीक-ठाक थी, गाँवों की बोली थी और गालियाँ भी थीं। अंत अनपेक्षित था।
बहुत सालों बाद मैंने कोई उपन्यास पढ़ा । ‘औघड़’ बहुत ही प्रभावशाली उपन्यास है। पूरी पुस्तक आपको शुरू से लेकर अंत तक बाँध कर रखती है ।यह आपको हंसाती है,रुलाती है और मानव जीवन के विभिन्न सत्यों से सामना कराती है ।लेखक ने पुस्तक के शुरू में सही ही बोला था की वो किसी को बख़्शेगा नही और यही हुआ भी ।अंततः बस वो व्यक्ति बच पाया जिसकी जाति नहीं पता थी और वही औघड़ कहलाया।
This entire review has been hidden because of spoilers.
This book is one of the best book I have ever read. Relatable scenarios from politics to casteism women empowerment to communism. गांव देहात से जुड़े हुए रिश्ते के ताने-बाने से मिलजुल कर एक बहुत ही सुंदर कहानी को अंजाम दिया है आज के परिदृश्य से बहुत मिलता जुलता संवाद है। एक बहुत ही सुंदर दोस्ती की कथा सुनाई गई है। उस दोस्ती में कैसे उतार-चढ़ाव आते हैं वह बतलाया गया है। विश्वास और विश्वासघात की एक अनोखी कहानी का बहुत ही तरीके से वर्णन किया है।
एक उत्कृष्ट कृति से कम कुछ नही । आज के दौर में प्रेमचंद सरीखे लेखक बन गए नीलोत्तपल मृणाल, कालजयी कृति । यह पुस्तक एक सम्मोहन है और नीलोत्पल मृणाल कलम के जादूगर l हिंदी साहित्य में अगर औघड़ नही पढ़ी है तो बहुत कुछ छूट गया आप से ।
तुलना करना उद्देश्य नहीं और ना ही तुलनात्मक रूप से पढ़ा लेकिन पढ़ते समय बरबस ही मैला आँचल और राग दरबारी की याद आ जाना लाज़मी है. जबरदस्त लेखन है. अनुसरण करते हुए भी मौलिक है.
उपन्यास:- औघड़ लेखक:- नीलोत्पल मृणाल प्रकाशक:- हिन्द युग्म पन्ने:- 384 लेखक परि��य:- नयी हिंदी पढ़ने वाले या शायद इस नाम अनभिज्ञ हों. इनकी पहली किताब “डार्क हॉर्स” को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। इनके लेखन में सामाजिक विषमताएँ, विडम्बनाएं संघर्ष स्पष्ट रूप से देखने को मिल जाता है। नए हिंदी के लेखकों की बात की जाये तो अवश्य ही ये बहुत ऊँचे पद पर देखने को मिलते हैं। कहानी :- क्या बतायें भैया …. इसकी कहानी को समझाना कोई खेल ठट्ठा नहीं है …. क्योंकि ये किसी एक पात्र की कहानी नहीं है, ये भारतीय ग्रामीण समाज की कहानी है। ये कहानी किसी एक पात्र को फॉलो नहीं करती बल्कि एक पूरे गाँव को साथ में लेकर चलती है और एक भारतीय गाँव की सामाजिक आपा-धापी को दिखाती है। ये कहानी है मलखानपुर नाम के एक पूरे गाँव की, जहाँ समाज में मिलने वाले लगभग हर तरह के लोगों से मिलता जुलता एक किरदार आपको मिल जायेगा। हालांकि बाद में बिरंची नाम का किरदार मुख्य भूमिका में आता दिखता है। भाषा:- कहानी नयी वाली हिंदी में लिखी गयी है और पढ़ने में बिलकुल आसान है, आपको कोई दिक्कत नहीं होगी इसको पढ़ने में, कोई भी इसकी हिंदी को पढ़ और समझ सकता है। भाषा का प्रभाव:- नीलोत्पल मृणाल की कई खासियतों में से एक यह है की उनकी भाषा सरल होते हुए भी काफी प्रभावशली है … ये कहानी आपको हंसाएगी, रुलायेगी और सबसे जरुरी बात … इसमें जो सामाजिक मुद्दे उठाये गए हैं …उसके ऊपर आपको विचार करने के लिए मजबूर करेगी। यही इस किताब की खूबसूरती है … एक तरफ आप किरदारों के डायलाग और उसके बाद होने वाले नरेशन पर हँस तो ज़रूर लेंगे …. लेकिन आपके दिमाग का एक हिस्सा उस मुद्दे के बारे में जरूर सोचने लगेगा। इसमें कुछ गीत लिखे हुए हैं …जो नीलोत्पल मृणाल जी ने खुद लिखे हैं …. उसके बोल काफी सुन्दर हैं …. बाद में मुझे पता चला की मृणाल जी ने बाकायदा उनको कंपोज़ भी किया है …. आप उन गीतों को एक बार जरूर सुनें …. दिल को सुकून ना मिले तो कहियेगा। कमियाँ:- कमी के तौर पर मैं यह कहूँगा की कहानी में एक मुख्य पात्र का उद्भव काफी देर से होता है। लगभग आधा उपन्यास पूर्ण होने के बाद हमें बिरंचि नामक एक किरदार मुख्य भूमिका में आता दिखता है। और एक मेरा पर्सनल जो थोड़ा दुःख है कि इन्होंने अंत में एकदम से वक़्त बदल दिये …. जज़्बात बदल दिये….काश कि इसे थोड़ा अलग तरीके से खत्म किया होता। रेटिंग :- ⅘ ओपिनियन :- जीवन में एक बार तो जरूर पढ़िये….यकीन मानिये आप हमेशा इस उपन्यास को याद रखेंगे।
औघड़ समाज की नीच मानसिकता को दिखाता है और कुछ खरीदे हुए ईमान की कहानी बतलाती है जो कुछ धन के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते है ।
समाज की एक घिनौनी राजनीति और झुटी रुतबा को बचाने के लिए लोग कितने गिर जाते है इस उपन्यास में आपको देखने को मिलेगी और अगर आप भी इस जीवन शैली को जी रहे है तो आपको इस पुस्तक से कुछ सीखना होगा और एक नए समाज की स्थापना तभी हो पाएगी ।
लोग क्या कहेंगे इस मानसिकता से भी आपका इस उपन्यास में साक्षात्कार होगा।
ये उपन्यास समाज की छोटी और नीच मानसिकता पे एक कड़ा तमाचा है और में चाहुना को आप इस उपन्यास को एक बार और देखे इस समाज की दुर्गति और सोचिए ।
क्रांति सूर्य के प्रकाश की तरह है जहां जाती है अपनी रोशनी बिखेर देती है कुछ इसी तरह एक संघर्ष की कहानी को लेखक ने बड़ी समझदारी और तथ्य के साथ दिखाया है ।
मुझे लेखक की उपन्यास पढ़ने में बहुत अच्छा लगता है वो देश की सच्ची बात अपने उपन्यास में दर्शाते है और इन्ही के उपन्यास डार्क हॉर्स से मैंने पढ़ने के शुरुआत करी थी और अब मुझे बिना पढ़े मन ही नही लगता ।
हिंदी भाषी है अगर आप तो इस उपन्यास को एक बार जरूर पढ़े और हिंदी के लेखकों को लिखने का बढ़ावा दे ताकि हमारी नीव कमजोर न हो ।
आप इस उपन्यास को amazon या flipkart और या अन्य जगह से ले सकते है।
एक झलक कहानी की और
यह कहानी मलखानपुर एक छोटे से गांव पे आधारित है जहां पे एक रईस नाम है फुकन सिंह और बरसो से इस गांव में उन्ही की चलती आ रही है और जो कहते है वोही होता है एक तरह से ये सबसे बड़े गुंडे है गांव के उनके इशारे से गांव का हर इंसान चलता है।
बिरंची नाम का एक नौजवान है जो इस चीज को खत्म करना चाहता है और एक नई क्रांति लाता है कुछ नौजवानों में, खुद तो जिंदगी में कुछ कर नही पाया क्योंकि जब को कुछ करने चला था तो गांव के कुछ गुंडे ने उसके हाथ का अंगूठा तोड़ दिया जिसके कारण वो अब लिख भीं नही पता है और पढ़ना आगे छोड़ कर छोटी मोटी काम करने लगा और जब भी बोलता समाज को एक गहरी चोर करता था जिसके कारण सब उसे दबा के रखते थे पर कहते है न जब कुछ करने का मौका मिले तो हटना नही चाहिए और इसने भी वोही किया और किस्मत को कुछ और मंजूर था।
"बेटा सुनो, हर क्रांतिकारी-मार्क्सवादी बेटे के पीछे एक ठीक-ठाक पूंजीवादी बाप होता है जिसके पैसे पर फुटानी और क्रांति चलता है। जिस दिन ये महीना का पैसा बंद हो जाएगा न, उसी दिन क्रांति का तंबू जरूरत और अभाव में उड़ जाएगा।" यह पंक्तियां उपन्यास 'औघड़' से है जिसके लेखक 'नीलोत्पल मृणाल' हैं। कुल 384 पृष्ठों में समाहित इस उपन्यास को अभी-अभी पढ़कर समाप्त किया। लंबे 'अंतराल' के बाद कोई पुस्तक हाथ लगी जो इतने कम समय में पढ़कर पूरी की। धार्मिक पाखंड, जात-पात, छुआछूत, राजनीति, अपराध और प्रसाशन के गठजोड़ की कलई खोलती यह पुस्तक ग्रामीण परिवेश की 'पड़ताल' का एक अनूठा प्रयास है। लेखक "औघड़" के प्रमुख पात्र विरंची के माध्यम से ग्रामीण परिवेश के उन समस्त बिंदुओं को एक-एक कर उपन्यास का हिस्सा बनाता है जहाँ बाकी लेखक इस तरह के कार्य के लिए दूर सुदूर तक नजर नहीं आते। इस पुस्तक में व्यंग्य का लहजा जोरदार है। उपन्यास के इस संवाद से आप खुद समझ लीजिए। पढ़ा लिखा शेखर गांव के ग्रामीण को समझाता है, "धर्म अफीम है, नशा है, बीमारी है.... इसे छोड़ना बेहतर है।" तभी बगल में बैठ गांव का बीए पास बिरंची बोल उठता है, "शेखर जी, हां हम भी पहली दफे पढ़े तो बड़ा तगड़ा बात लगा ये मार्क्स वाला डायलोग। फिर बाद में हमको एक बात समझ नहीं आया कि चलिए मार्क्स बोलता है कि धर्म अफीम है, धर्म को छोड़ दो। इस पर मार्क्सवादी लोग धर्म छोड़ दिया पर साला, अफीम काहें नहीं छोड़ा।" ऐसे ही एक संवाद में लेखक लिखता है "अक्सर ज्यादातर आदमी अपनी जवानी के दौर में समाजवादी, नारीवादी, या मार्क्सवादी में से कुछ-न-कुछ जरूर होता है और एक दौर के बाद वो निश्चित रूप से इनमें से कुछ भी नहीं होता है। सिर्फ कमाता-खाता आदमी होता है..।" जय हो नीलोत्पल... बहुत दिनों बाद औघड़ के रुप में एक अच्छा उपन्यास पढ़ने को मिला।
A dark satire on Indian polity..........Aughad by Nilotpal Mrinal teleports you directly into the scene in the book, such intricate and raw is the description of the book. The most amazing fact about this book is that it itself lives the story. The language and words used are very much spoken by people of Eastern UP and bordering areas. It delves deeply into the social and religious beliefs of people and evaluates and defines them from a rationale perspective. Writer has even managed to carve comic scenes, which can to be related to real life incidents in rural areas to some extent. Some scenes will make you laugh from your stomach while others will make you contemplate about the reality.
The storyline of book may not be called as completely logical and there are some loopholes making readers wonder about the logic behind. But this book is no thriller. So these small fallacies can be ignored. Though I would call some events described exaggeration of reality as per modern times...and their idea inspired from old Bollywood movies. This I think could have been better. But overall the book is amazing and i suggest you tore ad it if you really want to know North Indian Society from inside. The book aims at bringing out the irregularities in Rural elections of India and effect of Indian caste and geopolitics upon it. And has been successful in doing so.
निलोत्पल मृणाल बताते हैं कि उनके प्रिय लेखक रेणु जी हैं। और ये उनके लेखन में आँचलिक भाषा के प्रयोग से बखूबी उभर के आता भी है।
उपन्यास के पात्रों को इस तरह गढ़ा गया है की कोई भी गांव या छोटे शहरों से जुड़ा व्यक्ति उसे अपने आस पास के लोगों से जोड़ पाएगा। पात्रों का जो परिचय शुरू में कराया गया वो अंत तक अपने उस पहचान पे कायम रहे, ये उनके हर संवाद में ध्यान रखा गया है।
लेखक ने जातिवाद, ब्राह्मणवाद पे चोट करने की अच्छी और अलग एक सार्थक कोशिश की है। कई सारे लेखकों ने जातिवाद पे बात की है लेकिन इसमें जो अलग लगा वो है हर पहलुओं को उजगार करना। मुख्यतः लेखक गण जातिवाद की बात करते तो हैं लेकिन आज की नई पीढ़ी में अधिकतर लोग इससे ऊपर उठ चुके हैं या उठ रहे हैं, ये बताने में कतराते हैं। लेकिन इस उपन्यास में उन अनछुए पहलुओं को भी दर्शाया गया है।
उपन्यास में एक मैदान सजाया गया है, राजनीति के खेल का मैदान। राजनीति का खेल और उसके खिलाड़ी सबसे खतरनाक होते हैं। अजब ही खेल है, खेलते खिलाड़ी हैं लेकिन हारते दर्शक हैं। गरीबों की लड़ाई लड़ते-लड़ते गरीबों के नेता अमीर हो जाते हैं और गरीब, गरीब का गरीब ही रह जाता है।
काफ़ी सामान्य भाषा के साथ कहानी को एक रंग दिया गया है। ना ही गांव-देहात की पृष्ठभूमि का सहारा ले के जबरजस्ती गालियां ठूसी गई हैं, ना ही नायक को लार्जर दैन लाइफ दिखाने की कोशिश की गई है। जो भी है उचित मात्रा में है जिससे पान्नों पे वास्तविकता उतर के आए।
कुल मिलाकर सराहनीय लेखन है। उपरोक्त बिंदुओं के विषय में अगर रुचि है तो उपन्यास पढ़ के निराशा हाथ नही लगेगी, इसमें कोई दो राय नही है।
Presently, I am shocked. This novel is a Satirical but Serious Commentary on the Socio-political structure of a village of India.
The story is of "Malkhanpur" Village and its residents of which "Biranchi Kumar" is a part too, hated and despised by most villagers due to his straightforward views and voice..and loved by few.. Than there is the family of "Purushottam Singh" and "Phukan Singh" Who has a stronghold on the Village politics and simply are the goons, sadly the villagers are always ready to bow to them, all except Biranchi. When Fresh Panchayat Elections are announced he brings up a candidate to contest against phukan singh and the dirty game begins.. What happens at the end.. is for you to know after you have read it..
The language used and the way of presenting it, is really humorous, it will make you laugh with each line but is in no way something to ignore, along with that laugh you will be forced to think seriously on the matters highlighted in the story.
The Story talks about Caste differences, Class differences, Dirty Politics, State of Women among many others...
The author has really done a commendable Job, to show a different Picture of a village than what a comman urban folk percieves a village to be.
मैंने जब यह क़िताब Storytel पे देखी तो मैंने कहानी आख़िरकार सुनने की सोची। लेकिन जब मैंने देखा की लेखक़ खुद इस कहानी के वाचक है तो बस फिर क्या था, मैंने सोचना बंद और सुनना शुरू किया। जिस लिहज़े में कहानी को लेखक़ ने सुनाया है मुझे ऐसा लगता है की कोई और शायद नहीं सुना पाता। मुझे ये कहानी पढ़ते और सुनते वक्त मुंशी प्रेमचंद जी के लेखन की अनुभूति सी हो रही थी। कहानी गाँव की जहां एक तरफ़ सादगी और मेहनतकश ज़िंदगी की दृश्य को चित्रित करती है वही दूसरी ओर गाँव में अमीरों और उच्चवर्ग वाले लोगों द्वारा ग़रीबों और निम्न वर्ग के लोगों का शोषण भी दिखाया है। गाँव में एक तरफ़ निम्न वर्ग के लोग अपनी दशा सुधारने की जद्दोज़द्द में लगे दिखते है वही उच्च वर्ग वाले उनकी तरक़्क़ी से असुरक्षित दिखायी पड़ते है।बीच बीच में कुछ गानो का भी ज़िक्र है जिसे लेखक़ की आवाज़ में सुनकर कहानी में चार चाँद सा लगता है क्यूँकि लेखक़ की गायकी भी उनके लेखनी सी क़ाबिले तारीफ़ है। कहानी सुनते वक्त गाँव की याद आना लाज़मी है क्यूँकि लेखक़ ने गाँव का चित्रण और भाषा का उपयोग पूरा देसी रखा है। मुझे लगता है की सबको एक बार ये कहानी लेखक़ की ज़ुबानी ज़रूर सुननी चाहिये। कहानी में हर एक भावना का छेड़ने की क्षमता है। हरेक जाति और वर्ग के लोगों के संघर् ष, विचारधारा, राजनीति और ईर्ष्या के भावनाओं का सटीक चित्रण है।अंत काफ़ी झकझोरने वाला है।
औघड़" शब्द सुनते ही हमारे दिमाग में सबसे पहले जो चित्र आता है, वह किसी अघोरी बाबा या किसी ऐसे साधु का होता है जो अपने आप में मस्त-मलंग होता है। परन्तु यह किताब अघोरी बाबा या किसी साधु की नहीं। औघड़" किताब ग्रामीण परिवेश पर आधारित है। लेखक ने बड़े खूबसूरत तरीके से भारतीय समाज की अहम कमजोरियों, जैसे-जाति व्यवस्था, भ्रष्टाचार, ग्रामीण-राजनीति आदि पर चोट की है। गांव के बस अड्डे के पास मुरारी साव की दुकान से शुरू हुई यह वह यात्रा है जो अपने पाठकों को अंत में नदी किनारे पहुंचा अंदर से झकझोर देती है और मन व्याकुल हो बस बिरंची के बारे में सोचता है। मार्क्सवादी नौजवानों के धूप अगरबत्ती छोड़ गाजा हाथ में लेकर क्रांति लाने के विचारधारा, नारी के मन की गहराई, गांव के डॉक्टर के डिग्री और इलाज का तरीका के अलावा कई ऐसे घटनाओं का वर्णन है जिसे पढ़ते समय कभी आपके चेहरे पर मुस्कान होगी तो कभी कुछ करने की बचैनी! हिंदी साहित्य की एक अनमोल धरोहर ! गांवों की हर बारीकियों को शब्दों की बेड़ियों के माध्यम से इस किताब में लाया गया है।
यह कहानी ज्ञान चतुर्वेदी जी की लेखन शैली की नकल है, लेकिन उनके लेखन के सामने शैशवावस्था के स्तर की है। समाज में बेवजह उपहास करने से अच्छा लेखन विकसित नहीं होता। नीलोत्पल भ्रमित हैं, और स्पष्ट नहीं है कि वे क्या कहना या लिखना चाहते हैं। इस उपन्यास को साहित्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता—यह कुछ-कुछ पैरानॉर्मल और कुछ सस्ता थ्रिलर जैसा है। इसका अंत निराशाजनक है; वास्तव में, सबसे निचले स्तर का पल्प फिक्शन भी इससे बेहतर है। नीलोत्पल जैसे लेखकों को डॉक्टर राही मासूम रज़ा, भगवती चरण वर्मा, आर. के. नारायण, सत्यजीत रे, रस्किन बॉण्ड, शिवाजी सावंत, और श्रीलाल शुक्ल जैसे लेखकों के लेखन का अध्ययन करके लिखना शुरू करना चाहिए, ताकि पाठकों का पैसा और समय बर्बाद न हो। वैसे, लिखना जरूरी नहीं है; दुनिया में करने के लिए कई और काम हैं।
Mrinal dives deep in village societies and its hierarchy. He deals with caste, politics, religious intricacies in an Indian village and how it creates barriers to freedom of most of villagers. How different crimes are tolerated and appreciated by people who have become so fake that they can not confront themselves and have lost every hope to live a better life. Honour and Purity are biggest factor for controlling people in India. Caste/religious purity and family honour has destroyed human element in people and they have been domesticated by few.
Would have been an excellent social commentary, but for the thriller-esque last couple of pages, an ending that was totally uncalled for. An excellent social commentary that if even a dalit leader manages to break into the higher reaches of power, he only lifts himself to sit at par with the upper castes, but his community still lingers at the bottom.
My another peeve is with how Indian writers miss the mark when they write of Muslim societies. Whatever form of discrimination Indian Muslims might show to each other, it never extends to (1) sharing of food, and, (2) sharing of space.
After a long time did I came across such a masterpiece. I felt like reading Munshi Premchand again. One of those books that I took a lot of time to finish off. It had everything. Literally made me cry many times. There were moments when I just could not read ahead. The story starts with Biranchi, a loveable character. His curiosity and art of questioning the structure of society in simple terms, right from the beginning are so rare. The book felt so real. Why, but in the end, it had to happen? Why do humans are all but lies? Why is it so easy to lure someone into the web of tactics? Not just the politics but all of us. The book serves its purpose.
It's my first book by Nilotpal Mrinal ji and from the first book itself I've become his fan. This book is simply fantastic. The way he has developed his characters, the village life he has showcased, the essence of a common middle class man, the pain they feel, the way a pure hearted man is fooled by the person he considered his friend, the power-play, the deception in fact everything in this book has hit the chord with the readers. The readers coming from North India will definitely relate with this novel. Through this novel he has shown the truth. And if I talk about the ending then it was totally unexpected. And it has left me craving for more.
Loved it. Characterization is powerful. Could easily be turn into Netflix series. Story start in early morning with opening of tea stall and how people of village comes for their morning cup of tea. Author has Keen observation. He gradually introduce characters of different caste , religion, beliefs and work. Along with their daily life struggles , opinions, grudges. First 30-40 pages were about characters though it tells about life of village but it gave longer pauses to go ahead with book. I am happy that my pauses didn't turn into period. Language, dialects are awesome. I enjoyed it.
हास्यास्पद एवं व्यंग्यात्मक शैली में भारत के एक गांव की राजनीतिक एवं आर्थिक व्यवस्था पर चोट करता एक बेजोड़ उपन्यास है औघड़। एक चाय की दुकान चलाने वाले की खेती की जमीन रेल की पटरी की भेंट चढ़ने की घटना को लेखक ने कुछ इस तरह कहा है, "चाय वाला अक्सर अपने खेत में मवेशियों को नुकसान करने से बचाने के लिए बाहर निकालता था, लेकिन विकास ने तो उसके खेत में रेलगाड़ी घुसा दी थी जिसको निकालना नामुमकिन था”। ऐसे अनेक वाक्य है औघड़ में। फिल्म देखते देखते तो लोग कई बार भावुक हो जाते है, अगर किताब पढ़ते पढ़ते ऐसा चाहते है तो औघड़ उसके लिए सर्वश्रेष्ठ है।
‘औघड़’ भारतीय ग्रामीण जीवन और परिवेश की जटिलता पर लिखा गया उपन्यास है जिसमें अपने समय के भारतीय ग्रामीण-कस्बाई समाज और राजनीति की गहरी पड़ताल की गई है। एक युवा लेखक द्वारा इसमें उन पहलुओं पर बहुत बेबाकी से कलम चलाया गया है जिन पर पिछले दशक के लेखन में युवाओं की ओर से कम ही लिखा गया। ‘औघड़’ नई सदी के गाँव को नई पीढ़ी के नजरिये से देखने का गहरा प्रयास है। ‘औघड़’ गाँव पर गाँव में रहकर, गाँव का होकर लिखा गया उपन्यास है। ग्रामीण जीवन की कई परतों की तह उघाड़ता यह उपन्यास कई विमर्श भी प्रस्तुत करता है।