कृष्ण विचलित नहीं हुए । अपने खुद के वचन की यथार्थता मानो सहजभाव से प्रकट होती है । नाश तो सहज कर्म है । यादव तो अति समर्थ है; फिर कृष्ण- बलराम जैसे प्रचंड व्यक्तियों से रक्षित हैं- उनका सहज नाश किस प्रकार हो? उनका नाश कोई बाह्य शक्ति तो कर ही नहीं सकती । कृष्ण इस सत्य को समझते हैं और इसलिए माता गांधारी के शाप के समय केवल कृष्ण हँसते हैं । हँसकर कहते हैं - ' माता! आपका शाप आशीर्वाद मानकर स्वीकार करता हूँ; कारण, यादवों का सामर्थ्य उनका अपना नाश करे, यही योग्य है । उनको दूसरा कोई परास्त नहीं कर सकता । ' कृष्ण का यह दर्शन यादव परिवार के नाश की घटना के समय देखने योग्य है । अति सामर्थ्य विवेक का त्याग कर देता है और विवेकहीन मनुष्य को जो कालभाव सहज रीति से प्राप्त न हो, तो जो परिणाम आए वही तो खरी दुर्गति ह&
Mahabharata being the magnum opus is very difficult to comprehend but legends like Dinkar joshi ji make it easy to understand the complexities and subtle messages which a person like me misses out easily. The analogies in this book clear the misunderstanding and we kind of agree with the point of view author puts in front of us.
After reading his earlier books, the expectations were high and book is beyond those expectations without any hesitation.
A very good book from Mr. Dinkar Joshi. Really a masterpiece but still it feels that more should be there. The philosophy and knowlwdge gained through the teachings of Krishna always inspires and aspires one to know more.
यह पुस्तक मैंने 2015 में ख़रीदी थी पर आज तक पढ़ नहीं पाया था। आज मुजे ऐसा लग रहा है की अगर मैंने यह पुस्तक उस वक़्त पढ़ी होती तो कुछ ज़्यादा समझ नहीं आया होता। शायद मेरे लिये यही सही वक़्त था इसे पढ़ने का और इसका श्रेय भी श्री कृष्ण को जाता है यह में समझ ना सकु इतना नासमझ तो नहीं हूँ।
इस पुस्तक का पहला संस्करण 1990 में छपा और अभी तक इसके और भी कई सारे संस्करण आ चुके है। इसी से आप इस पुस्तक की भव्यता का अन्दाज़ लगा सकते है। दिनकर जोषी गुजराती साहित्य की जानी मानी हश्ती है। अभी तक उनकी रचनाएँ क़रीब क़रीब 140 से ज़्यादा हो चुकी है। श्री कृष्ण और गांधीजी इनके अभ्यास और संशोधन के मुख केंद्र रहे है। उनके लेखों का कई सारी भारतीय भाषा में अनुवाद हुवा है और इन्हें गुजरात राज्य साहित्यिक अकादमी, गुजराती साहित्य परिषद जैसी अनेक साहित्यिक संस्था द्वारा पुरस्कार प्राप्त हुवे है।
इस पुस्तक में भगवान श्री कृष्ण के महत्वपूर्ण जीवन प्रसंगों और उनके साथ गहराई से जुड़े पात्रों की चर्चा है। लेखक पहले घटना की इतिहासिक जानकारी सामने रखते है और फिर उसपे चर्चा होती है और यह समझाने का प्रयास होता है की वह क्यों और किस हिसाब से हुवा होगा। वो कही पर भी यह नहीं कहते की में कह रहा हूँ एसा ही हुवा है। पर लगभग सभी जगह आप उनके तथ्यों और अभिप्रायों से सहमत होंगे।
दिनकर जी की एक बात जो मेरे दिल को छू गई वह यह है की “उनकी तमाम मानुषी मर्यादा स्वीकार करने के बाद भी कृष्ण केवल मुट्ठी भर नहीं पर एक योजन ऊँचे मानवी है” यहाँ उन्होंने श्री कृष्ण को भगवान की जगह महापुरुष, महामानवी के रूप में देखा हैं। में जिन्हें गुरु मानता हूँ वह हमेशा कहते थे की श्री कृष्ण और श्री राम महामानव थे। जो अपने महान कर्म से भगवान के तुल्य पूजनीय है।
पुस्तक के मध्य चरण के बाद में जब आप कुरुक्षेत्र के 19 वे दिन का विवरण पढ़ते है जब माँ गांधारी श्री कृष्ण को श्राप देती है। वह चित्रण इतना दर्द भरा है की आपकी सारी वेदना, दुख, सहानुभूति श्री कृष्ण के साथ हो जाती है। आप मन ही मन चिल्लाने लगते है की काश एसा श्री कृष्ण को नहीं सहना पड़ा होता। पर क्या करे यही विधि का विधान था। और उस इंसान की महानता देखिए की अपने कुल के विनाश का श्राप भी वे हस्ते हुवे स्वीकार करते है और कहते है माता आपका श्राप आशीर्वाद मानकर स्वीकार करता हूँ। ये श्री कृष्ण ही कर सकते है।
श्री कृष्ण के देह त्याग का वर्णन में कभी भी, कहीं पर भी, किसी भी लेखक का लिखा, किसी भी पुस्तक में पढ़ता हूँ तब मेरा ह्रदय चूर-चूर हो जाता है। मेरे लिये हर बार वह उतना ही असह्य होता है। माना के काल की यही महानता है की वह सब के लिए एक समान चलता है। पर यह घटना मेरे लिए कभी स्वीकार्य नही थी, ना है और कभी स्वीकार कर पाऊँगा। श्री कृष्ण विलय हमेशा मुजे व्यथित कर देता है। अपने आप को सँभालना मुश्किल हो जाता है। हज़ारो सवाल, बातें, जैसे एक साथ मेरे दिमाग़ में चलने लगती हैं और में इन सब को समझ ही नहीं पाता।
पुस्तक के समाप्त होने तक आपको श्री कृष्ण और महाभारत से जुड़े ढेर सारे सवालो के जवाब मिल जाएँगे और ढेर सारे नये सवाल खड़े हो जाएँगे जिसका आपको अंदाज़ा भी नहीं होगा। और यही बात आपको आगे श्री कृष्ण और महाभारत के बारे में जानने के लिए प्रेरित करेंगी। इस पुस्तक का अंत, अंत नही है। आगे एसे और पुस्तक पढ़ने की जिज्ञासा देकर जाएँगा। बहुत कम पुस्तकें एसी होती है जहां आपका पठन पुस्तक के अंत के साथ समाप्त नहीं होता पर वहाँ से एक नयी शुरुआत होती है। जैसे मनीष जी की क्रांतिदूत पढ़ने के बाद मेरे साथ हुवा था।
श्री कृष्ण के पूर्ण-पुरुषोत्तम होने का महात्मय यहाँ जैसे समझाया है वैसा मैंने पहले कभी नहीं पढ़ा। श्री कृष्ण के पूर्ण-पुरुषोत्त की उमदा व्याख्या इससे उत्तम हो ही नही सकती। अंत में दिनकर जी कहते है की “मानवजाति जब तक सोचना चालू रक्खेगी तब तक श्री कृष्ण टीके रहेंगे।”
श्री कृष्ण एक एसा व्यक्तित्व है जिसे स्वीकार करे बिना किसी से भी नहीं रहा जा सकता।
मथुरा में जन्मे एक नन्हें बालक की कहानी इन्ही सब क़िस्सो के साथ ख़त्म होती है और कई सवाल छोड़ कर जाती है। इस धरती पर उनका आगमन भी सुखद नहीं था ना ही विदाय। पर इन दोनों घटनाओं के बीच में वो इंसान जो जीवन बिता कर गये वो आज हज़ारो सालो बाद भी लोगो को प्रेरणा देता है। इसी लिए कहा गया है “कृष्णम वन्दे जगद्गुरूम”।