चूंकि मुझे उर्दू नहीं आती इसलिए नैयर मसूद की कहानियों को पढ़ने के लिए उनके अंग्रेजी अनुवादों की ओर ही जाना पड़ता लेकिन इसी बीच हिंदी कवि महेश वर्मा ने उनकी कुछ कहानियों का उर्दू से हिंदी अनुवाद किया और अनुवाद करने का उनका तरीका भी नैयर मसूद की किसी कहानी सा जान पड़ता है।
इस संग्रह में शामिल सभी कहानियां उल्लेखनीय हैं। छोटे कस्बों/शहरों की ये कहानियां बिना किसी आडम्बर के किसी बहुत साधारण सी जगहों से शुरू होतीं हैं और साधारण लोगों की कहानियां सुनातीं हैं। ये कहानियां बिना किसी अस्मितावादी विमर्श का शोर मचाए, ख़ास मुस्लिम समुदाय के जीवन संघर्ष का बयान हैं लेकिन अपने ट्रीटमेंट में ये कहानियां इतनी ब्रह्मांडीय हैं कि वे इन देश के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
कस्बे की गलियों में, छोटे मोटे, ईंट गारों के मकानों के पीछे, बाज़ार में तमाशा दिखाने वाले, नुक्कड़ों पर आवारा खड़े रहने वाले, कढाईयाँ बनाने वाली औरतें, डब्बे बनाने वाली औरतें, चुपके से ब्याह दी जाने वाली औरतें, खामोशी से मौत के मुंह में समा जाने वाली औरतें, बूढ़े, बेसहारा, मज़दूर, आवारा लड़के, आज्ञाकारी लड़के, भुलक्कड़, गुस्सैल, झगड़ालू जैसे साधारण लोगों से मिलकर नैयर मसूद का कॉस्मिक विश्व तैयार होता है जिसमें सुख दुख हँसी खुशी अपराध संघर्ष स्मृति विस्मृति आते जाते रहते हैं।
मसूद की कहानियों का शिल्प और कहन भी जुदा है। मृत्यु और जादू इसमें कहीं भी और कभी भी उतर आते हैं, बहुत सी बातें रहस्य ही तरह आती हैं और रहस्य की तरह ही छोड़कर चलीं जातीं हैं लेकिन उनके पीछे मनुष्य के संघर्षों और पीड़ाओं का ऐसा विश्व रह जाता है जिसे भुलाना सम्भव नहीं।