हिन्दी और उर्दू के बीच संवाद, आवाजाही और लेन-देन हिन्दी परम्परा का एक ज़रूरी हिस्सा रहे हैं। उर्दू साहित्य का बहुत बड़ा हिस्सा देवनागरी और हिन्दी में पढ़ा-गुना-सराहा जाता रहा है। हमें इसी क्रम में उर्दू के मशहूर कथाकार नैयर मसूद की कहानियों का एक चयन हिन्दी में प्रस्तुत करते हुए $खुशी है। यह सिर्फ एक समृद्ध भारतीय प्रतिभा से परिचित कराने भर का उद्यम नहीं है, यह इस सच्चाई पर इसरार करना भी है कि उर्दू में नवाचार सशक्त ढंग से अनेक रूपों में हो रहा है। इस नवाचार का आस्वाद हिन्दी पाठक को भी लेना चाहिए।
Masud's stories have a beautiful, subtle, mildly occult way of hinting at the presence of the absent, the portentously phantom quality of tangible lives. By the time one passes through any of his stories, one feels like one had been offered a thread and was following it keenly, registering its sensations, but in the end of the tale remaining only with the sensation of having lost an elusive something which one had attained with effort, of having lost that thread but retaining just the experience of passing through it. Much like passing through a windy hurricane and afterwards having only a few raindrops on your hands to prove the severity of the storm.
This is no less than Kafka, than the best of the best surrealists. It's a shame he wasn't more known, and I hope that changes.
चूंकि मुझे उर्दू नहीं आती इसलिए नैयर मसूद की कहानियों को पढ़ने के लिए उनके अंग्रेजी अनुवादों की ओर ही जाना पड़ता लेकिन इसी बीच हिंदी कवि महेश वर्मा ने उनकी कुछ कहानियों का उर्दू से हिंदी अनुवाद किया और अनुवाद करने का उनका तरीका भी नैयर मसूद की किसी कहानी सा जान पड़ता है।
इस संग्रह में शामिल सभी कहानियां उल्लेखनीय हैं। छोटे कस्बों/शहरों की ये कहानियां बिना किसी आडम्बर के किसी बहुत साधारण सी जगहों से शुरू होतीं हैं और साधारण लोगों की कहानियां सुनातीं हैं। ये कहानियां बिना किसी अस्मितावादी विमर्श का शोर मचाए, ख़ास मुस्लिम समुदाय के जीवन संघर्ष का बयान हैं लेकिन अपने ट्रीटमेंट में ये कहानियां इतनी ब्रह्मांडीय हैं कि वे इन देश के सभी समुदायों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
कस्बे की गलियों में, छोटे मोटे, ईंट गारों के मकानों के पीछे, बाज़ार में तमाशा दिखाने वाले, नुक्कड़ों पर आवारा खड़े रहने वाले, कढाईयाँ बनाने वाली औरतें, डब्बे बनाने वाली औरतें, चुपके से ब्याह दी जाने वाली औरतें, खामोशी से मौत के मुंह में समा जाने वाली औरतें, बूढ़े, बेसहारा, मज़दूर, आवारा लड़के, आज्ञाकारी लड़के, भुलक्कड़, गुस्सैल, झगड़ालू जैसे साधारण लोगों से मिलकर नैयर मसूद का कॉस्मिक विश्व तैयार होता है जिसमें सुख दुख हँसी खुशी अपराध संघर्ष स्मृति विस्मृति आते जाते रहते हैं।
मसूद की कहानियों का शिल्प और कहन भी जुदा है। मृत्यु और जादू इसमें कहीं भी और कभी भी उतर आते हैं, बहुत सी बातें रहस्य ही तरह आती हैं और रहस्य की तरह ही छोड़कर चलीं जातीं हैं लेकिन उनके पीछे मनुष्य के संघर्षों और पीड़ाओं का ऐसा विश्व रह जाता है जिसे भुलाना सम्भव नहीं।
इस किताब में नैयर मसूद साहब की सात कहानीयां हैं - गंजीफ़ा, अल्लाम और बेटा, किताबदार, बादेनुमा, अजारियान, मिस्किनो का अहाता और बड़ा कूड़ाघर।
कहानियों को कहते समय नैयर मसूद अपने जादुई स्पर्श को बनाए रखते हैं जिसमें सपना, रहस्य और अन्य उपकथाएं बखूबी अपना काम करती हैं। वह पुरानी चीजों और नएपन के असमंजस को बड़े उदास पाश्र्व संगीत के साथ सुनाते हैं।
Life, existentialism, and loneliness. Very well articulate into these themes. Naiyer Masud is a prolific Urdu writer and this one is must-read if you like his work.