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अठारह उपन्यास

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दो दशक से भी अधिक समय गुजर जाने के बावजूद आज अठारह उपन्यास की प्रासंगिकता बनी हुई है तो इसके कुछ खास कारण हैं। इसमें एक प्रतिष्ठित कथा-लेखक की प्रतिक्रियाएँ भर नहीं हैं, अपने समय की कतिपय महत्वपूर्ण कृतियों को परखने की विशिष्ट समीक्षा दृष्टि भी मौजूद है। एक सर्जक की रचना दृष्टि से लैस समीक्षा इस अर्थ में अलग होती है कि वह रचना और उसकी प्रक्रिया से जुड़े तमाम पहलुओं पर भी पूरी संलग्नता से विचार करती है। इस रूप में राजेन्द्र यादव, सुमित्रानन्दन पंत, अज्ञेय और मुक्तिबोध के क्रम में एक जरूरी समीक्षा लेकर आते हैं। अठारह उपन्यास के बहाने दरअसल यहां राजेन्द्र यादव इसकी नई समीक्षा दृष्टि लेकर उपस्थित हुए हैं।
उनकी यह समीक्षा दृष्टि,उस समय की कथा-समीक्षा के सिर्फ तत्कालीन या फौरी सरोकारों और मूल्यांकन कर डालने की सीमा में बँधे होने और व्यक्तिगत राय या पसंद बनकर रह जाने के विरोध में ही नहीं, उनके सर्टिफिकेट बन जाने और इतिहास दृष्टि से अछूते रह जाने के कारण भी प्रारंभ हुई थी। जाहिर है ऐसे में रचनाकार, समीक्षक राजेन्द्र यादव ने रचना की जरूरत के मुताबिक नए औजारों की तलाश करते हुए कथा-आलोचना में एक नई शुरूआत की थी। रचना में प्रवेश के लिए राजेन्द्र यादव ने तो कई-कई युक्तियों का इस्तेमाल किया है, पत्र-शैली की सीधी-सरल शैली में भी वे रचना के भेद खोलने में सफल रहे हैं। समीक्षा से रचना प्रक्रिया तक के इस क्रम में राजेन्द्र यादव स्वयं को भी इस तरह शामिल कर लेते हैं जैसे अपने रचनाकार को भी वे एक खास दूरी से देख रहे हों।

223 pages, Hardcover

Published January 1, 1999

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About the author

Rajendra Yadav

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राजेन्द्र यादव हिन्दी के सुपरिचित लेखक, कहानीकार, उपन्यासकार व आलोचक होने के साथ-साथ हिन्दी के सर्वाधिक लोकप्रिय संपादक भी थे। नयी कहानी के नाम से हिन्दी साहित्य में उन्होंने एक नयी विधा का सूत्रपात किया। उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द द्वारा सन् 1930 में स्थापित साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन उन्होंने प्रेमचन्द की जयन्ती के दिन 31 जुलाई 1986 को प्रारम्भ किया था। यह पत्रिका सन् 1953 में बन्द हो गयी थी। इसके प्रकाशन का दायित्व उन्होंने स्वयं लिया और अपने मरते दम तक पूरे 27 वर्ष निभाया।

28 अगस्त 1929 ई० को उत्तर प्रदेश के शहर आगरा में जन्मे राजेन्द्र यादव ने 1951 ई० में आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० की परीक्षा हिन्दी साहित्य में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान के साथ उत्तीर्ण की। उनका विवाह सुपरिचित हिन्दी लेखिका मन्नू भण्डारी के साथ हुआ था। वे हिन्दी साहित्य की सुप्रसिद्ध हंस पत्रिका के सम्पादक थे।

हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा राजेन्द्र यादव को उनके समग्र लेखन के लिये वर्ष 2003-04 का सर्वोच्च सम्मान (शलाका सम्मान) प्रदान किया गया था।

28 अक्टूबर 2013 की रात्रि को नई दिल्ली में 84 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ।

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