रूप, अन्तर्वस्तु, गुण और मात्रा-सभी स्तरों पर आठवें और नवें दशक की हिन्दी कहानी को जिन कथाकारों ने एक सम्मानजनक मुकाम तक पहुँचाया है, संजीव उनमें प्रथम पंक्ति में आते हैं। अन्तर्वस्तु और उपजीव्य स्तर पर संजीव ने अब तक कई अनछुए और वर्जित बीहड़ों की यात्रा की हैं,नये प्रतिमान गढ़े हैं और रूप के स्तर पर भाषा और शिल्प, व्यंजना और विन्यास के नये-नये सम्भार-सौष्ठव सिरजे हैं। बावजूद इसके आज भी वे अपनी इसी मान्यता पर कायम हैं कि कहानी प्रथमतः कहानी होती है, बाद में कुछ और।
संजीव की कहानियों के इस जाने-पहचाने चेहरे के बावजूद, उनके इस संग्रह की कहानियाँ थोड़ी भिन्न हैं। ये मात्र शोषक-शोषित, लाभ-लोभ के हड़बोंग और किन्ही लिंग, सम्प्रदाय या जातीय अन्तर्विरोधी तक जाकर ही नहीं ठहर जातीं, बल्कि इसके आगे जाकर करवट लेते काल के बीच नीयत और नियति के द्वन्द्व में मनुष्य की तकदीर का विश्लेषण करती हैं। संग्रह की ज्वार, योद्धा, बुद्धपथ राख आदि हों या गुफा का आदमी इससे पहले नहीं लिखी जा सकती थीं। निश्चित तौर पर यह संजीव की देश-काल सापेक्ष कथा-यात्रा का प्रस्थान बिन्दु है। ये कहानियाँ आज भी पाठक को यथार्थ और संवेदना के उस तलस्पर्शी लोक तक ले जाकर सभ्यता की इस आदिम पहेली के रूपरू खड़ा कर देती हैं-सच-सच बताओ, तुम गुफा के अन्दर हो या बाहर ? संजीव का यह कहानी-संग्रह प्रकाशित करते हुए भारतीय ज्ञानपीठ को प्रसन्नता है।