शनिवार-रविवार का दिन हो और आप क़िस्सा क़िस्सा लखनउवा के पन्ने पलट रहे हों तो लगता है कि आप किताब नहीं पढ़ रहे, बल्कि चौक की किसी तंग गली में चलते हुए बाजपेई साहब को सुन रहे हैं। हिमांशु खुद को उसी चौक यूनिवर्सिटी का छात्र मानते हैं, जिसके वाइस-चांसलर अमृतलाल नागर हुआ करते थे। और सच कहिए तो उनकी लेखनी में वही चौक की गंध, वही आवाज़, वही ठहाका है।
हिमांशु कहते हैं, लखनऊ की गलियों में यूं ही भटकना ऐसा है जैसे महबूबा की ज़ुल्फ़ों के ख़म खोलना। और ये किताब पढ़ते हुए बार-बार लगता है कि हम उसी इश्क़ के हिस्सेदार हैं।
इस किताब की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें न कोई नवाब है, न कोई बादशाह। इसमें हैं आम लोग पानवाड़िनें, रिक्शेवाले, दुकानदार, डिप्टी कलेक्टर, तवायफें, शायर। वही लोग जिनसे शहर की असली पहचान बनती है। बाजपेई बार-बार याद दिलाते हैं कि असल इतिहास इन गलियों में लिखा गया है, उन लोगों की ज़ुबानी, जो रोज़ सुबह से शाम तक इस शहर को जीते हैं। यही वजह है कि किताब पढ़ते हुए लखनऊ किसी स्मारक या हवेली में नहीं, बल्कि छोटी दुकानों, भीड़भाड़ वाले चौक और आम लोगों की हंसी में सांस लेता दिखाई देता है।
हिमांशु की फिक्र सिर्फ किस्सा कहने तक सीमित नहीं है। वो उस लखनऊ को बचाना चाहते हैं जो वक्त की धूल में दबता जा रहा है। वो लखनऊ जहाँ मेल-जोल था, तहज़ीब थी, मोहब्बत थी और मज़हबी तासुब का नामोनिशान नहीं। यह किताब उसी तहज़ीब का दस्तावेज़ है।
और जब खाने-पीने की बात आती है किताब से ही पता चला कि लखनऊ सिर्फ़ टुंडे कबाब तक नहीं हैं । हिमांशु उस बावर्ची का किस्सा बताते है जो नवाब आसफ़ुद्दौला के लिए बस दाल पकाता था। लखनउवा खान-पान की यही विविधता और सादगी किताब में उतनी ही जगह पाती है जितनी उसके ठाट-बाट वाली कहानियाँ।
इस किताब की भाषा उसका सबसे बड़ा तिलिस्म है। न हिंदी, न उर्दू, बल्कि एक प्यारी-सी हिंदुस्तानी ज़ुबान, जो चौक और नखास की गलियों में गूंजती थी। इसमें मुहावरे हैं, इस्तलाहें हैं, वो लहजा है जिसमें लखनउवा अदब और नफ़ासत घुली हुई है। पढ़ते हुए लगता है जैसे लेखक सामने बैठा है और हर पन्ना किसी दास्तानगो की महफ़िल का हिस्सा बन गया है।
2021 में साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार से नवाज़ा जाना किताब की अहमियत का सबूत ज़रूर है, मगर सच कहूँ तो ये किताब किसी इनाम के लिए नहीं लिखी गई। यह किताब उस शहर की यादें बचाने के लिए लिखी गई है, जो वक्त के साथ कहीं “फना” और कहीं “फरामोश” हो रहा है।
हाँ, एक छोटी-सी इल्तिज़ा है अगर फुटनोट में उर्दू अल्फ़ाज़ के मायने भी मिल जाते तो हम जैसे पाठकों का सफ़र और आसान हो जाता। मगर शायद यही तो हिमांशु बाजपेई का हुनर है कि उलझाकर भी वो हमें उसी लखनऊ में खींच ले जाते हैं जहाँ हर किस्सा हमारी रगों में उतरने लगता है।