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Coolie Lines
हिन्द महासागर के रियूनियन द्वीप की ओर 1826 ई. में मज़दूरों से भरा जहाज़ बढ़ रहा था। यह शुरुआत थी भारत की। जड़ों से लाखों भारतीयों को अलग करने की। क्या एक विशाल साम्राज्य के लालच और हिन्दुस्तानी बिदेसियों के संघर्ष की यह गाथा भुला दी जायेगी? एक सामन्तवादी भारत से अनजान द्वीपों पर गये ये अँगूठा-छाप लोग आख़िर किस तरह जी पायेंगे? उनकी पीढ़ियों से। हिन्दुस्तानियत ख़त्म तो नहीं हो जायेगी?
लेखक पुराने आर्काइवों, भिन्न भाषाओं में लिखे रिपोर्ताज़ों और गिरमिट वंशजों से यह तफ़्तीश करने निकलते हैं। उन्हें षड्यन्त्र और यातनाओं के मध्य खड़ा होता एक ऐसा भारत नज़र आने लगता है, जिसमें मुख्य भूमि की वर्तमान समस्याओं के कई सूत्र हैं। मॉरीशस से कनाडा तक की फ़ाइलों में ऐसे कई राज़ दबे हैं, जो ब्रिटिश सरकार पर ग़ैर-अदालती सवाल उठाते हैं। और इस ज़िम्मेदारी का अहसास भी कि दक्षिण अमरीका के एक गाँव में भी वही भोजन पकता है, जो बस्ती के एक गाँव में। ‘ग्रेट इंडियन डायस्पोरा' आख़िर एक परिवार है, यह स्मरण रहे। इस किताब की यही कोशिश है।
लेखक पुराने आर्काइवों, भिन्न भाषाओं में लिखे रिपोर्ताज़ों और गिरमिट वंशजों से यह तफ़्तीश करने निकलते हैं। उन्हें षड्यन्त्र और यातनाओं के मध्य खड़ा होता एक ऐसा भारत नज़र आने लगता है, जिसमें मुख्य भूमि की वर्तमान समस्याओं के कई सूत्र हैं। मॉरीशस से कनाडा तक की फ़ाइलों में ऐसे कई राज़ दबे हैं, जो ब्रिटिश सरकार पर ग़ैर-अदालती सवाल उठाते हैं। और इस ज़िम्मेदारी का अहसास भी कि दक्षिण अमरीका के एक गाँव में भी वही भोजन पकता है, जो बस्ती के एक गाँव में। ‘ग्रेट इंडियन डायस्पोरा' आख़िर एक परिवार है, यह स्मरण रहे। इस किताब की यही कोशिश है।
280 pages, Paperback
Published January 1, 2019
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Community Reviews
Displaying 1 - 21 of 21 reviews
July 3, 2019
अपनी हालिया तुर्की यात्रा के दौरान, 'पमुकले' शहर में मुझे एक बुजुर्ग दंपति मिले। उम्र होगी 60 के आसपास। वे साउथ अफ्रीका के वासी थे लेकिन भारतीय मूल के थे। जाति पटेल बताई। बातचीत जब शुरू हुई तो मालूम हुआ कि उन दोनों के ही परदादा/परदादी तकरीबन सौ-डेढ़ सौ साल पहले साउथ-अफ्रीका आए थे। वे क्यों आए थे? कैसे आए थे? उस ज़माने में जब भारत ग़ुलाम भी था और ग़रीब भी। तब समंदर में जहाज के रास्ते ही विदेशों के सफ़र तय किए जाते थे। उन्होंने अपने पूर्वजों की कहानी सुनाने में बहुत दिलचस्पी नहीं दिखाई। क्यों? इसका जवाब मुझे प्रवीण जी की इस किताब में मिला। अब वे लोग एक सामर्थ्यवान परिवार से हैं जो विदेश घूमते हैं, इतिहास जानते हैं। लेकिन उनका ख़ुद का डेढ़ सौ साल पुराना इतिहास वे किसी को नहीं बताना चाहते। मैं पूरे यकीन से तो नहीं कह सकती लेकिन इस किताब को पढ़ने के बाद ऐसा कयास लगा रही हूँ कि उनके पूर्वज भी गिरमिटिया रहे होंगे।
कुछ किताबें सिर्फ इसलिए बेहतरीन नहीं होतीं कि उनका कथ्य, भाषा या शैली सुंदर है बल्कि इसलिए भी कि वे आपके लिए चंद पन्नों में सारी दुनिया समेट लाती हैं। बहुत मेहनत और रिसर्च से तैयार की गई यह कथेतर ना सिर्फ एक ज़रूरी किताब है बल्कि रोचक और कुछ स्थानों पर रोमांचक भी।
मेरा पिछले दो महीनों से साहित्यिक किताबें पढ़ना एक तरह से स्थगित है। अपनी आगामी किताब पर काम करते हुए आजकल रिसर्च पेपर्स और उसी से संबंधित किताबें पढ़ते समय बीत जाता है। पढ़ने को बहुत सारी किताबें जमा हो गई हैं। यह किताब भी शायद नहीं पढ़ती, यदि इसमें दिए गए रेफेरेंस ने मुझे आकर्षित नहीं किया होता। एक दिन युहीं बुकशेल्फ के सामने खड़े होकर इस किताब के पन्ने पलट रही थी। और जब प्रति अध्याय दिए गए रेफेरेंस देखे तो इसे पढ़ना तय किया। अच्छी-खासी रिसर्च करके, एक ऐसे विषय पर लिखना जिसका हर सिरा ढूँढना मुश्किल होगा, कई बार नामुमकिन भी, शायद मुझे भी कुछ सिखा जाए।
इस किताब को पढ़ने से पहले तक मुझसे दुनिया का और भारतीयों का यह हिस्सा अनजान था। अधिकांश लोगों के लिए रहता होगा क्योंकि न ही तो इनका ज़िक्र कोर्स में होता है न ही नानी-दादी की कहानियों में। जिन्हें बेच दिया गया उन्हें भुला दिया गया। पर कौन जाने इस किताब को पढ़ते हुए किसी को अपने किसी पूर्वज के बारे में पता लग जाए। वे हज़ारों-लाखों भारतीय थे। हम-आप जैसे ही। उन्हें ना याद करना, उनसे कट जाना या उन्हें भुला देना इतिहास के एक बड़े हिस्से से अनछुआ रह जाना है।
आज हम दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाएं वहां बसे हुए भारतीय वहाँ कैसे पहुँचे यह जानना एक रोमांचक यात्रा हो सकती है जो आप इस किताब की मदद से कर पाएँगे। इसे ज़रूर पढ़िए। इसके बिना आपका साहित्य और इतिहास दोनों अधूरे हैं।
कुछ किताबें सिर्फ इसलिए बेहतरीन नहीं होतीं कि उनका कथ्य, भाषा या शैली सुंदर है बल्कि इसलिए भी कि वे आपके लिए चंद पन्नों में सारी दुनिया समेट लाती हैं। बहुत मेहनत और रिसर्च से तैयार की गई यह कथेतर ना सिर्फ एक ज़रूरी किताब है बल्कि रोचक और कुछ स्थानों पर रोमांचक भी।
मेरा पिछले दो महीनों से साहित्यिक किताबें पढ़ना एक तरह से स्थगित है। अपनी आगामी किताब पर काम करते हुए आजकल रिसर्च पेपर्स और उसी से संबंधित किताबें पढ़ते समय बीत जाता है। पढ़ने को बहुत सारी किताबें जमा हो गई हैं। यह किताब भी शायद नहीं पढ़ती, यदि इसमें दिए गए रेफेरेंस ने मुझे आकर्षित नहीं किया होता। एक दिन युहीं बुकशेल्फ के सामने खड़े होकर इस किताब के पन्ने पलट रही थी। और जब प्रति अध्याय दिए गए रेफेरेंस देखे तो इसे पढ़ना तय किया। अच्छी-खासी रिसर्च करके, एक ऐसे विषय पर लिखना जिसका हर सिरा ढूँढना मुश्किल होगा, कई बार नामुमकिन भी, शायद मुझे भी कुछ सिखा जाए।
इस किताब को पढ़ने से पहले तक मुझसे दुनिया का और भारतीयों का यह हिस्सा अनजान था। अधिकांश लोगों के लिए रहता होगा क्योंकि न ही तो इनका ज़िक्र कोर्स में होता है न ही नानी-दादी की कहानियों में। जिन्हें बेच दिया गया उन्हें भुला दिया गया। पर कौन जाने इस किताब को पढ़ते हुए किसी को अपने किसी पूर्वज के बारे में पता लग जाए। वे हज़ारों-लाखों भारतीय थे। हम-आप जैसे ही। उन्हें ना याद करना, उनसे कट जाना या उन्हें भुला देना इतिहास के एक बड़े हिस्से से अनछुआ रह जाना है।
आज हम दुनिया के किसी भी हिस्से में चले जाएं वहां बसे हुए भारतीय वहाँ कैसे पहुँचे यह जानना एक रोमांचक यात्रा हो सकती है जो आप इस किताब की मदद से कर पाएँगे। इसे ज़रूर पढ़िए। इसके बिना आपका साहित्य और इतिहास दोनों अधूरे हैं।
September 17, 2019
**Warning: this text may contain spoilers** भारतीय इतिहास में एक कम छुए लेकिन महत्वपूर्ण पहलु 'गिरमिटिया' के बारे में जानने के लिए अवश्य पढ़े।
अंग्रेजी शासन के वक्त भारतीयों पर जो अत्याचार हुए वो हम सब जानते हैं। लेकिन क्या हमें पता कि ब्रिटिश ने हमारे देश के लाखों लोगों को अपनी जड़ों से उखाड़ दिया। उनसे उनके अपने छिन गये, सपने छिन गये। अपना गांव, अपनी भाषा अपनी संस्कृति छिन अपना धर्म भी छिन गया। उनमें से कई लोग तो अपनी जड़ों से ऐसे उखडे़ कि आज तक अपने वतन न लौट पाये।
पीढ़ियां बीत गई है और उसमें से कई अब समृद्ध हैं, खुशहाल हैं तो कई अब भी अपनी पहचान को जूझ रहे हैं। कुछ अपनी मिट्टी से अलग हुए तो किसी और मिट्टी ने उन्हें अपनाया ही नहीं। कुछ ने जमीन पर अपने महल खड़े कर लिये, कुछ अब वहां के शासक हो गये, कुछ बड़े व्यापारी हो गये तो कुछ दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे हैं।
विदेशी जमीन पर कहीं उनके धर्म, भाषा, संस्कृति और भोजन की खिचड़ी हो गये तो कहीं वो आज भी अपने धर्म और संस्कृति को अपने में समेटे हुए हैं।
वैसे तो कई लोग भारत से बाहर गये लेकिन गिरमिटिया वो लोग वो प्रवासी हैं जो अंग्रेजों द्वारा अपने खर्च पर अन्य द्वीपों पर काम करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति से भेजे गये ।
पुस्तक में लेखक द्वारा जानकारी मिलती है कि किस तरह भारत से अंग्रेज स्वेच्छापूर्ण, छल कपट से, बहलाकर, अपहरण करके या जबरदस्ती अपने अधिकार क्षेत्र के देशों में लाखों लोगों को मजदूर के तौर पर रियूनियन द्वीप फिजी, गुयाना, सूरीनाम, नीदरलैंड, मॉरिशस, युगांडा, मलेशिया, सेशेल्स, म्यानमार आदि द्वीपों पर ले गये। वहां उन्होनें क्या काम किया? उनके हालत कैसे थे? हिंदुस्तान में उनके क्या हालात थे? क्यों वे अपना देश छोड़ने पर मजबूर हुए? अब वे कहां और किस हालात में हैं? क्या वे आज भी अपने अंदर भारतीयता को बचा पाये हैं? उन पर किस तरह के अत्याचार हुए? उनमें से कई अब बेहतर जिंदगी कैसे जी रहे हैं जो शायद भारत में रहने पर उनके लिए मुश्किल था? महिलाओं की क्या स्थिति थी? आदि कई सवालों पर यह किताब बात करती है। लेखक ने ये जानकारी विभिन्न देशों में भ्रमण करके, रिसर्च करके, लोगों से बात करके, दफ्तरों से जानकारी निकलवा कर, इंटरनेट पर सर्च करके हासिल की और पुस्तक में बड़े ही रोचक रूप से प्रस्तुत की है। मेंने मात्र 4-5 दिन में ही पुस्तक को पूरा पढ़ लिया, क्योंकि यह आपको आगे पढ़ने के लिए जिज्ञासा पैदा करती है। इसलिए मेंने पुस्तक को **** रेटिंग दी है।
जो लोग इन गिरमिटिया मजदूरों के जीवन या विदेशों में पाये जाने वाले भारतीय मूल के इन विदेशी लोगों के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं वो इस पुस्तक को जरूर पढ़े।
साथ ही यह पुस्तक तात्कालिक भारतीय समाज, धर्म, व्यवस्था, परिवार, आर्थिक स्थिति ,,महिलाओं की तात्कालिक स्थिति पर भी कुछ सवाल खड़ी करती है, जिनका इस पलायन से गहरा नाता है।
पिछली कुछ सदियों में हुए बड़े पलायन को जानने, गिरमिटियों के दर्द को समझने, अपनी मिट्टी से बिछड़ने के दर्द को जानने के लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण साधन है ।
अंग्रेजी शासन के वक्त भारतीयों पर जो अत्याचार हुए वो हम सब जानते हैं। लेकिन क्या हमें पता कि ब्रिटिश ने हमारे देश के लाखों लोगों को अपनी जड़ों से उखाड़ दिया। उनसे उनके अपने छिन गये, सपने छिन गये। अपना गांव, अपनी भाषा अपनी संस्कृति छिन अपना धर्म भी छिन गया। उनमें से कई लोग तो अपनी जड़ों से ऐसे उखडे़ कि आज तक अपने वतन न लौट पाये।
पीढ़ियां बीत गई है और उसमें से कई अब समृद्ध हैं, खुशहाल हैं तो कई अब भी अपनी पहचान को जूझ रहे हैं। कुछ अपनी मिट्टी से अलग हुए तो किसी और मिट्टी ने उन्हें अपनाया ही नहीं। कुछ ने जमीन पर अपने महल खड़े कर लिये, कुछ अब वहां के शासक हो गये, कुछ बड़े व्यापारी हो गये तो कुछ दोयम दर्जे की जिंदगी जी रहे हैं।
विदेशी जमीन पर कहीं उनके धर्म, भाषा, संस्कृति और भोजन की खिचड़ी हो गये तो कहीं वो आज भी अपने धर्म और संस्कृति को अपने में समेटे हुए हैं।
वैसे तो कई लोग भारत से बाहर गये लेकिन गिरमिटिया वो लोग वो प्रवासी हैं जो अंग्रेजों द्वारा अपने खर्च पर अन्य द्वीपों पर काम करने के लिए साम, दाम, दंड और भेद की नीति से भेजे गये ।
पुस्तक में लेखक द्वारा जानकारी मिलती है कि किस तरह भारत से अंग्रेज स्वेच्छापूर्ण, छल कपट से, बहलाकर, अपहरण करके या जबरदस्ती अपने अधिकार क्षेत्र के देशों में लाखों लोगों को मजदूर के तौर पर रियूनियन द्वीप फिजी, गुयाना, सूरीनाम, नीदरलैंड, मॉरिशस, युगांडा, मलेशिया, सेशेल्स, म्यानमार आदि द्वीपों पर ले गये। वहां उन्होनें क्या काम किया? उनके हालत कैसे थे? हिंदुस्तान में उनके क्या हालात थे? क्यों वे अपना देश छोड़ने पर मजबूर हुए? अब वे कहां और किस हालात में हैं? क्या वे आज भी अपने अंदर भारतीयता को बचा पाये हैं? उन पर किस तरह के अत्याचार हुए? उनमें से कई अब बेहतर जिंदगी कैसे जी रहे हैं जो शायद भारत में रहने पर उनके लिए मुश्किल था? महिलाओं की क्या स्थिति थी? आदि कई सवालों पर यह किताब बात करती है। लेखक ने ये जानकारी विभिन्न देशों में भ्रमण करके, रिसर्च करके, लोगों से बात करके, दफ्तरों से जानकारी निकलवा कर, इंटरनेट पर सर्च करके हासिल की और पुस्तक में बड़े ही रोचक रूप से प्रस्तुत की है। मेंने मात्र 4-5 दिन में ही पुस्तक को पूरा पढ़ लिया, क्योंकि यह आपको आगे पढ़ने के लिए जिज्ञासा पैदा करती है। इसलिए मेंने पुस्तक को **** रेटिंग दी है।
जो लोग इन गिरमिटिया मजदूरों के जीवन या विदेशों में पाये जाने वाले भारतीय मूल के इन विदेशी लोगों के इतिहास के बारे में जानना चाहते हैं वो इस पुस्तक को जरूर पढ़े।
साथ ही यह पुस्तक तात्कालिक भारतीय समाज, धर्म, व्यवस्था, परिवार, आर्थिक स्थिति ,,महिलाओं की तात्कालिक स्थिति पर भी कुछ सवाल खड़ी करती है, जिनका इस पलायन से गहरा नाता है।
पिछली कुछ सदियों में हुए बड़े पलायन को जानने, गिरमिटियों के दर्द को समझने, अपनी मिट्टी से बिछड़ने के दर्द को जानने के लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण साधन है ।
This entire review has been hidden because of spoilers.
September 14, 2020
“They have taken away my right to own a slave,” wrote Max Stirner, the opening words of the chapter on human rights in his great book, The Ego and its Own (1844). Once slavery was abolished in Europe, a new arrangement was made by colonial powers especially the British empire in India. They started exploring Indian labor overseas for the production of lucrative cash crops like Sugarcane, Coffee, Cocoa, and Rubber. At what cost, death of millions due to disease, suicides, horrible poverty, and sexual exploitation. While labor suffered together in coolie lines, the system was designed to protect the financial interests of the British empire.
Why should we read an amateur book on diaspora created through the Indian indenture system? Because the book explains to us the humane story of the Indians who were dehumanized to mere stick figures, all stuck under an umbrella identity of the coolie that merely highlights their journey and lives across seas. Indians mostly lower caste exploited by feudalism and casteism tried their luck and went through displacement into distant lands.
Traditional history doesn't give space to the voices of slaves and conquered. The current generation of the indentured Indians wants to forget the cruel past and European powers are convenient not to address the hidden history in plain sight. The book is remarkable because it gives us glimpses of the whole system devised colonial powers like recruitment by false pretenses, absence of labor laws in plantations, forced religious conversions, and cruelty of the white owners.
The author takes us into a global tour of cultural preservation by indentured diaspora through poems, fusion with the local culture, and the spread of Indian festivals by this diaspora forming a mini India everywhere. This journey of decades is marked with mini revolts led by indentured labors, the suffering of Indian women across all continents, intermingling of the caste groups, the violence incited by the local population against Indians, prosperity achieved by the current generation of Indians. Read the book and unveil the history of our ancestors. This book is a tribute to the forgotten past.
Why should we read an amateur book on diaspora created through the Indian indenture system? Because the book explains to us the humane story of the Indians who were dehumanized to mere stick figures, all stuck under an umbrella identity of the coolie that merely highlights their journey and lives across seas. Indians mostly lower caste exploited by feudalism and casteism tried their luck and went through displacement into distant lands.
Traditional history doesn't give space to the voices of slaves and conquered. The current generation of the indentured Indians wants to forget the cruel past and European powers are convenient not to address the hidden history in plain sight. The book is remarkable because it gives us glimpses of the whole system devised colonial powers like recruitment by false pretenses, absence of labor laws in plantations, forced religious conversions, and cruelty of the white owners.
The author takes us into a global tour of cultural preservation by indentured diaspora through poems, fusion with the local culture, and the spread of Indian festivals by this diaspora forming a mini India everywhere. This journey of decades is marked with mini revolts led by indentured labors, the suffering of Indian women across all continents, intermingling of the caste groups, the violence incited by the local population against Indians, prosperity achieved by the current generation of Indians. Read the book and unveil the history of our ancestors. This book is a tribute to the forgotten past.
June 26, 2020
This is my first hindi book after joining Goodreads. I will not comment on the writing style because writing this kind of book is very difficult because you cannot get information easily which need to be collected from so many sources from different countries. Writer Praveen has done a great amount of research to tell the stories of the migrants - girmitiyas . Only after reading this book I got the answers like why there are so many Hindi speaking people in Fiji ,and Indian named West Indies cricket players.
July 21, 2019
इतिहास का वो पहलू जिस को याद कर के शायद हम गर्ववान्वित ना मारसूस करे उसका क्या किया जा सकता है| ये किताब यहीं बताता है की उनको याद रखने से ही हमारा भविष्य मजबूत होगा, अपनी ताकत और पहुँच का थोड़ा अंदाज़ा लगना आवश्यक है, ये हमारे संस्कृति के विस्तार और अनुकूलन छमता को दर्शाता है| गिरमिटिया शब्द का बनना ही ये बताता है की लोगो को अंग्रेज़ो द्वारा (या कहे आरकाटी द्वारा) किसी ना किसी तरीके से धोखा ही दिया गया पर लोगो की क्या मज़बूरी थी की वो बार बार धोखा खाते रहे| ये भी काफी रोचक है की कैसे गिरमिटिया जिनको कुली भी कहा जाता था, अलग अलग द्वीपों पर अलग अलग तरीके से समायोजित हुए| इसमें उनके कॉन्ट्रैक्ट, वहाँ के शाशक , वहाँ के मूलनिवासी, विश्व में हो रहे सामाजिक बदलाव और अनेकानेक चीजों का बहुत बड़ा हाथ था| हमारे आपके लिये शायद सबसे बड़ी सीख़ तो ये होगी की, जो कल तक कुली कहे जाते थे (जिन्हे हमने समाज निकाला भी किया) और जिन्होंने बहुत सारे तकलीफे भी सही उन्होंने हमारे समाज की कुरीतियों को छोड़ा, मज़बूरी में और सामाजिक संरचना के कारण ही सही, पर हम अभी भी उन कुरीतियों से जूझ ही रहे हैं|
ये किताब हमे एक मौका देता है की जिन लोगो ने बाहर जा के हमारे सामाज का विस्तार किया उनसे हम सकारात्मक रूप से जूड़े, प्रेरणा ले और अपने से जोड़े रखने का भरपूर प्रयास करें|
ये किताब हमे एक मौका देता है की जिन लोगो ने बाहर जा के हमारे सामाज का विस्तार किया उनसे हम सकारात्मक रूप से जूड़े, प्रेरणा ले और अपने से जोड़े रखने का भरपूर प्रयास करें|
February 22, 2021
मुझे लगता है कि जब से इंसान के दिलो-दिमाग में संग्रह करने का कांसेप्ट आया होगा तब से उसकी निकृष्टता और बढ़ गई होगी !
Sapiens : A brief history of humankind पढ़ने के बाद ये विश्वास और सुदृढ़ हुआ था कि इस ग्रह की सबसे निकृष्ट प्रजाति हम इंसान ही हैं।
ये पुस्तक भी समर्थ इंसानों की निकृष्टता की गाथा समेटे है। इस पुस्तक की sub-title, "गाथा गिरमिटियों की वे जहाजी जो कभी हिंदुस्तान नहीं लौट सके", से इसका कंटेंट स्पष्ट होता है।
गुलामी प्रथा के समापन की तरफ बढ़ते विश्व में कैश क्रॉप से जुड़े मालिकों को सस्ते और आज्ञाकारी मज़दूरों की आवश्यकता पड़ी। गुलाम भारत की परिस्थितियाँ मज़दूर सप्लाई के लिए माकूल थी। फिर इस देश से लाखों अनपढ़, मूढ़, गरीब लोग विश्व के कोने-कोने में भेजे गए ―कुछ सुखद भविष्य का स्वप्न संजोये इच्छा से गए, कुछ यहाँ की गरीबी और शोषण से छुटकारा पाने को, कुछ दलालों द्वारा ठग-फुसलाकर, कुछ जबरदस्ती। इन गिरमिटिया समूह में महिलाएं भी थीं ― कुछ अपने परिवार के साथ, तो कुछ वैधव्य के कारण हो रहे शोषण से भागने की चाह लिए, कुछ वेश्या भी और कुछ घर में सताई जा रही महिलाएं भी इनमें शामिल थीं। इनमें से कुछ रास्ते में ही मर गए -बीमारी, शोषण, आपसी लड़ाई और आत्महत्या तक से, कुछ वहाँ पहुँच कर शोषण से मर गए, कुछ विद्रोह के कारण मार दिए गए, कुछ के नसीब में वापसी भी लिखी थी, कुछ लौट कर आए लेकिन फिर से चले गए और अधिकांश वहीं के हो कर रह गए। जो रह गए उनमें कुछ की पीढ़ियाँ संघर्ष कर सफल हो गईं और कुछ जगहों में अब भी पहचान के लिए संघर्षरत हैं। साथ रहने के कारण इन लोगों के बीच से जातिभेद ख़त्म हो गया, भिन्न कल्चर और रेस वालों से शादी व्याह कर आपस में घुलमिल भी गए। कुछ ने धर्म और भाषा बचाये रखा और कुछ एकदम से वहीं के हो गए। कुछ अपनी जड़ो को याद करते हैं और तलाशने की कोशिश भी करते हैं। कई इस कोशिश में पूर्ण या आंशिक सफल भी हुए। कई लोग पुरानी बात को बिलकुल भूल जाना चाहते हैं।
इन्हीं लोगों के इतिहास को लेखक ने प्रस्तुत करने की कोशिश की है। ये कार्य दुरूह और बहुत मेहनत का है। लेखक ने काफी प्रयास से तथ्य और किस्से जुटाए होंगे। किताब बेतरतीब ढंग से लिखी गई है, फिर भी पढ़नी चाहिए और इस सद्प्रयास के लिए लेखक बधाई के पात्र हैं।
April 10, 2020
A Poorly written must-read!
One often wonders why Hindi is a commonly spoken by the locals of Fiji. Or why many West Indian cricketers have names that “sound Indian”. Or why many in Mauritius “look Indian” and have many elements of Indian culture.
Dealing with a rare and almost forgotten chapter in world history, “Coolie Lines” is a non-fiction book themed around the migration of indentured labour from India by the British, French and Dutch to far-away islands like Mauritius, Surinam, Guyana, Fiji and the likes. The book brings out, in a rather unstructured and amateurish way, the heart wrenching plight of Indian indentured labourers in the late 1800s and early 1900s- illiterate, poor souls who chose month-long voyages to go to countries whose names they couldn’t even pronounce under contracts they couldn’t even understand to make a living.
The book is an amateur attempt by an Indian physician, Praveen Jha, living in Norway. The structure, content and style of the book give away his inexperience without restraint. The book basically comes across as a dump of all rough research notes the author must have made on the subject. He jumps from history to memoir to anthropology in an unabashed consistent pace. And yet, it makes an interesting read given the rare subject it deals with.
This largely forgotten chapter from world history explains a lot about the present of many countries- it is a fascinating tale of how the British re-invented slavery, a tale of illiterate, helpless survivors who carried a little piece of India with them more than a hundred years ago- and still nurture it after all these years! It is a fascinating epic of the survival of the humans against all odds.
Read it- despite all its flaws, it’s a must-read, especially for all Indians
One often wonders why Hindi is a commonly spoken by the locals of Fiji. Or why many West Indian cricketers have names that “sound Indian”. Or why many in Mauritius “look Indian” and have many elements of Indian culture.
Dealing with a rare and almost forgotten chapter in world history, “Coolie Lines” is a non-fiction book themed around the migration of indentured labour from India by the British, French and Dutch to far-away islands like Mauritius, Surinam, Guyana, Fiji and the likes. The book brings out, in a rather unstructured and amateurish way, the heart wrenching plight of Indian indentured labourers in the late 1800s and early 1900s- illiterate, poor souls who chose month-long voyages to go to countries whose names they couldn’t even pronounce under contracts they couldn’t even understand to make a living.
The book is an amateur attempt by an Indian physician, Praveen Jha, living in Norway. The structure, content and style of the book give away his inexperience without restraint. The book basically comes across as a dump of all rough research notes the author must have made on the subject. He jumps from history to memoir to anthropology in an unabashed consistent pace. And yet, it makes an interesting read given the rare subject it deals with.
This largely forgotten chapter from world history explains a lot about the present of many countries- it is a fascinating tale of how the British re-invented slavery, a tale of illiterate, helpless survivors who carried a little piece of India with them more than a hundred years ago- and still nurture it after all these years! It is a fascinating epic of the survival of the humans against all odds.
Read it- despite all its flaws, it’s a must-read, especially for all Indians
October 31, 2021
Its a coincidence that I read this book and Black and British: A Forgotten History within a span of a few months. While the latter described the role of British in removing slavery and how slavery became illegal in different parts of the world, this book discusses another phenomenon which happened as slavery retreated. Estate owners still needed the work to be done, and this gave rise to a milder form of slavery - contractual labor. And India became one of the largest supplier of this contractual labor which today makes a lot of Indian diaspora in far off islands. Praveen Jha has done a decent research to collect and analyze there stories and try to imagine the socio-economic condition in which these coolies lived in India and abroad.
August 14, 2019
It was excellent way to know about history of indians living on many island etc.
This was my amazing experience to read this book as i have seen saurabh dwedi's lallantop with praveen kumar jha then only i felt i should go for this book and truly it is my wonderful experience to know about indians living across the globe and how they reached there ...well written praveen ji.
This was my amazing experience to read this book as i have seen saurabh dwedi's lallantop with praveen kumar jha then only i felt i should go for this book and truly it is my wonderful experience to know about indians living across the globe and how they reached there ...well written praveen ji.
March 27, 2020
काफी इंतजार के बाद जब कोलकाता बुक फेयर में ये किताब मिली तो बिना वक्त बिताये इसको पढ़ना आरंभ किया। इतना कठिन काम लेखक के लिए कि शुरुआत कहाँ से की जाय। एक पाठक के रूप में मैं बंधा रहा पूरी यात्रा में। सबसे अच्छी जानकारी मुझे वेस्ट इंडीज के उन क्रिकेटरों की लगी जिनके नाम का एक हिस्सा भारतीय होता था। लेखक प्रवीण जी और वाणी प्रकाशन दोनों ही बधाई के पात्र हैं।
April 14, 2021
"यह इतिहास है विश्व के सबसे बड़े पलायन और अप्रवास का, जो लगभग भुला दिया गया।"
इतिहास की दृष्टि से एक रोचक किताब जिसमे तथ्यों को काफी शोध करने के बाद प्रस्तुत किया गया है। गिरमिटिया शब्द तो शायद हम सभी से स्कूल में इतिहास की किताबों में सुना है लेकिन गिरमिटिया (कौन थे, क्या थे ) जैसे कई प्रश्नों का उत्तर देने का काम यह किताब करती है।
Overall a good read.
इतिहास की दृष्टि से एक रोचक किताब जिसमे तथ्यों को काफी शोध करने के बाद प्रस्तुत किया गया है। गिरमिटिया शब्द तो शायद हम सभी से स्कूल में इतिहास की किताबों में सुना है लेकिन गिरमिटिया (कौन थे, क्या थे ) जैसे कई प्रश्नों का उत्तर देने का काम यह किताब करती है।
Overall a good read.
May 25, 2023
People who left India but kept India in their heart
This book tells the story of Indian who went to different parts of world for the search of a better livelihood. This story is about their oppression by colonial powers. This story is about their love for India. This story is about Freddy Mercury , Kamla Devi bisesar and many more people of Indian origin.
This book tells the story of Indian who went to different parts of world for the search of a better livelihood. This story is about their oppression by colonial powers. This story is about their love for India. This story is about Freddy Mercury , Kamla Devi bisesar and many more people of Indian origin.
July 20, 2020
बेहतरीन किताब
जिनको इतिहास प्यारा हो, अपनी जड़ों से लगाव हो उन लोगों के लिए अनमोल किताब है। लेखक ने बहुत मेहनत की है जो रंग भी लाई है। मैंने किंडल एडिशन लिया है, अब किताब ऑर्डर कर रहा हूं। मेरा बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो उसको दूंगा पढ़ने के लिए।
जिनको इतिहास प्यारा हो, अपनी जड़ों से लगाव हो उन लोगों के लिए अनमोल किताब है। लेखक ने बहुत मेहनत की है जो रंग भी लाई है। मैंने किंडल एडिशन लिया है, अब किताब ऑर्डर कर रहा हूं। मेरा बच्चा थोड़ा बड़ा हो जाएगा तो उसको दूंगा पढ़ने के लिए।
November 28, 2021
This really broadened my perspective about the immigration Indians have been involved in through the colonial era. It is really informative. It caused me information overload. I am not able to remember many facts.
January 12, 2020
Well written.
Would have been more elaborate. Every chapter has a set formula on which profile of all the countries have been written which make things repitative
Would have been more elaborate. Every chapter has a set formula on which profile of all the countries have been written which make things repitative
November 3, 2020
A must read
एक बेहतरीन प्रयास है। यह किताब उत्सुकता जगाती है गिरमिटिया के बारे में और जानने की। जरूर पढ़ी जानी चाहिए।
एक बेहतरीन प्रयास है। यह किताब उत्सुकता जगाती है गिरमिटिया के बारे में और जानने की। जरूर पढ़ी जानी चाहिए।
May 22, 2024
When and why Bihari left their homeland and went to latin America and now become residents of that place
July 21, 2019
इतिहास का वो पहलू जिस को याद कर के शायद हम गर्ववान्वित ना मारसूस करे उसका क्या किया जा सकता है| ये किताब यहीं बताता है की उनको याद रखने से ही हमारा भविष्य मजबूत होगा, अपनी ताकत और पहुँच का थोड़ा अंदाज़ा लगना आवश्यक है, ये हमारे संस्कृति के विस्तार और अनुकूलन छमता को दर्शाता है| गिरमिटिया शब्द का बनना ही ये बताता है की लोगो को अंग्रेज़ो द्वारा (या कहे आरकाटी द्वारा) किसी ना किसी तरीके से धोखा ही दिया गया पर लोगो की क्या मज़बूरी थी की वो बार बार धोखा खाते रहे| ये भी काफी रोचक है की कैसे गिरमिटिया जिनको कुली भी कहा जाता था, अलग अलग द्वीपों पर अलग अलग तरीके से समायोजित हुए| इसमें उनके कॉन्ट्रैक्ट, वहाँ के शाशक , वहाँ के मूलनिवासी, विश्व में हो रहे सामाजिक बदलाव और अनेकानेक चीजों का बहुत बड़ा हाथ था| हमारे आपके लिये शायद सबसे बड़ी सीख़ तो ये होगी की, जो कल तक कुली कहे जाते थे (जिन्हे हमने समाज निकाला भी किया) और जिन्होंने बहुत सारे तकलीफे भी सही उन्होंने हमारे समाज की कुरीतियों को छोड़ा, मज़बूरी में और सामाजिक संरचना के कारण ही सही, पर हम अभी भी उन कुरीतियों से जूझ ही रहे हैं|
ये किताब हमे एक मौका देता है की जिन लोगो ने बाहर जा के हमारे सामाज का विस्तार किया उनसे हम सकारात्मक रूप से जूड़े, प्रेरणा ले और अपने से जोड़े रखने का भरपूर प्रयास करें|
ये किताब हमे एक मौका देता है की जिन लोगो ने बाहर जा के हमारे सामाज का विस्तार किया उनसे हम सकारात्मक रूप से जूड़े, प्रेरणा ले और अपने से जोड़े रखने का भरपूर प्रयास करें|
August 18, 2020
इस किताब को पढ़ते मैं कहीं गुम सा हो गया ... एक अजीब उदासी में डूबता उतरता... मजबूर गिरमिटिया के दर्दनाक मंज़र को महसूसता मैं । सिर्फ़ इतिहास ही नहीं... एक अद्रश्य अहसास की अनुभूति । दीन की दुर्दशा दर्शाती दूसरी दुनिया से दो चार कराती और दिल पर दस्तक देती किताब । एक बार जरूर पढ़ कर देखिए 😍
November 25, 2019
Masterpiece!!! Just Great!! Must read for everyone...
Read
January 2, 2020A must read book. Author Dr. Praveen Jha really work hard for this book.
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