पागलखाना उन लोगों के लिए है जिन्हें न स्वतंत्र राष्ट्र बर्दाश्त कर सकता है न परतंत्र राष्ट्र, जिन्हें न धार्मिक बर्दाश्त कर सकते हैं न धर्मनिरपेक्ष, जिन्हें न ब्राहमण बर्दाश्त कर सकते हैं न दलित, जिन्हें न स्त्रियां बर्दाश्त कर सकती हैं न पुरुष, जिन्हें न उभयलिंगी बर्दाश्त कर सकते हैं न एल जी बी टी, जिन्हें न ...
वो हर आदमी जो अकेला है, असहमत है, जो ईमानदारी और लोकतांत्रिकता के साथ अपनी तरह जीने की थोड़ी-सी जगह चाहता है......
पागलखाना बताता है कि शोकेस में ‘मंटो’, ग़ालिब’, ’प्रेमचंद’और ‘चेख़व’ को सजा लेने से......मरने के बाद उनको महापुरुष बना देने से कुछ नहीं होता, उनके जीवित रहते उनको जगह देना भी आना चाहिए......
तथाकथत उदारवादियों और तथाकथित अहिंसकों की पोल तभी खुल जाती है जब वो पागलखाना साम