Yashpal (3 December 1903 – 26 December 1976) was a Hindi-language author who is sometimes considered to be the most gifted since Premchand. A political commentator and a socialist who had a particular concern for the welfare of the poor and disadvantaged, he wrote in a range of genres, including essays, novels and short stories, as well as a play, two travel books and an autobiography. He won the Hindi-language Sahitya Akademi Award for his novel, Meri Teri Uski Baat in 1976 and was also a recipient of the Padma Bhushan.
Yashpal's writings form an extension to his earlier life as a revolutionary in the cause of the Indian independence movement.
यशपाल जी को पढ़ने का यह मेरा पहला अनुभव था । और पहला ही अनुभव इतना शानदार रहा । इस किताब में १९ कहानियाँ हैं और सभी इस तरह से लिखी गई हैं कि अंत तक वे आपको बाँधे रख सकती हैं । किस्सागोई की इतनी लाजवाब प्रतिभा मैंने पहली बार देखी है (मुंशी प्रेमचंद के बाद) । कहानियाँ झकझोरती हैं, कचोटती हैं और विचार करने पर मजबूर करती हैं । हर कहानी के माध्यम से यशपाल जी ने रूढ़ियों-परंपराओं पर इतने जोर का प्रहार किया है कि कोई संशय नही रह जाता । उनकी कहानियों के केन्द्र में अधिकतर शोषित-पीड़ित तथा बहिष्कृत लोग हैं । पहली कहानी 'करवा का व्रत' जहाँ मुस्कुराहट दे जाती है, वहीं ‘परदा’ गला रूँधा देती है । स्त्रियों के अधिकारों हनन करने वाले समाज से भी उन्होंने कई सवाल किए हैं । पूरी तरह से खुले और नंगे वाक्यांशों का प्रयोग हिला कर रख देता है । मसलन, ‘अपने पत्थर के खुदा से तेरे खुदा का सर फोड़ देती’ और ‘भूख से मरते हैं कमीने आदमियों के बच्चे’ इत्यादि । कहने का सारांश यह कि किताब बेमिसाल है । मेरे संग्रह मे इस किताब का होना मुझे गर्वान्वित करता है । यशपाल जी की बाकी रचनाएँ पढ़ने के लिए मैं लालायित हूँ ।