मल्लिका आधुनिक हिन्दी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की वह प्रेमिका थी जिसके संबंध में इतिहास और साहित्य मौन है। भारतेन्दु के घर के पास रहने वाली बाल-विधवा, मल्लिका ने भारतेन्दु से हिन्दी पढ़ना-लिखना सीखकर बांग्ला के तीन उपन्यासों का हिन्दी में अनुवाद किया। उन्हीं अनुवादों ने भारतेन्दु को ‘उपन्यास’ विधा से परिचित करवाया और इसी से प्रेरणा पाकर वे आधुनिक हिन्दी के निर्माता बने। लेकिन भाग्य की ऐसी विडंबना कि मल्लिका ने जो स्वयं मौलिक उपन्यास लिखा, उसका कहीं कोई ज़िक्र तक नहीं मिलता; जबकि उनका वह उपन्यास हिन्दी का प्रथम उपन्यास माने जाने वाले, परीक्षागुरु, से पहले का है। इतिहास के धुंधलके से गल्प के सहारे मनीषा कुलश्रेष्ठ ने उसी विस्मृत और उपेक्षित नायिका को खोज निकाला है और उसके जीवन पर एक काल्पनिक जीवनीपरक उपन्यास रचा है। मनीषा कुलश्रेष्ठ एक सुपरिचित लेखिका हैं जो कथा साहित्य के कई महत्त्वपूर्ण सम्मान और फ़ैलोशिप प्राप्त कर चुकी हैं। इनके अब तक सात कहानी-संग्रह और चार उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें शिगाफ़, पंचकन्या, स्वप्नपाश और किरदार उल्लेखनीय हैं। इनकी कई कहानियाँ विदेशी भाषाओं में भी अनूदित हो चुकी हैं।
कृष्ण बलदेव वैद फैलोशिप – 2007 रांगेय राघव पुरस्कार वर्ष 2010 (राजस्थान साहित्य अकादमी) कृष्ण प्रताप कथा सम्मान 2011 गीतांजलि इण्डो – फ्रेंच लिटरेरी प्राईज़ 2012 ज्यूरीअवार्ड रज़ा फाउंडेशन फैलोशिप – 2013 अन्य साऊथ एशियन लैग्वेज इंस्टीट्यूट, हायडलबर्ग (जर्मनी) में उपन्यास ‘शिगाफ़’ का अंश पाठ व रचना प्रक्रिया पर आलेख प्रस्तुति. (2011) नौवें विश्व सम्मेलन (2012) जोहांसबर्ग में शिरकत. संप्रति– स्वतंत्र लेखन और इंटरनेट की पहली हिन्दी वेबपत्रिका ‘हिन्दीनेस्ट’ का दस वर्षों से संपादन.
हरिश्चन्द्र और मल्लिका एक आत्मा दो शरीर थे। बस इसके बाद कुछ बचता ही नहीं। उम्मीद करूँगा की हर हरिश्चन्द्र को उसकी चंद्रिका सही वक्त पर मिल जाए। और हर मल्लिका को उसका ज्यूँ का एक निष्ठा प्रेम मिल सके।
बहुत अद्भुत कहानी हैं। कहानी का शीर्षक भी सार्थक हैं।हर एक पात्र की सृष्टि बहुत सलीके से किया गया हैं। मल्लिका का पात्र बहुत अच्छा लगता हैं। अकेले रहकर उसने अपना जीवन को एक लक्ष्य दिया और उसपर टिकी भी।सबके लिए पढ़ने योग्य कहानी हैं।
Mallika not tells us about the love story of two kindered spirit, but also depicts the social condition during the times of Indian renaissance. On the one hand, the society was illuminated by the stalwarts, on the other it was recuperating from the scars of the first war of Indian independence. The condition of women was no better, somewhere people were trying to prevent the child marriages, on the other side, the widows were exiled in places like Varanasi. In a such a juncture, met two people, one a widow from Bengal, another a spendthrift from Benaras, both loved literature. This love brought them both near and nearer.
The end of the story reminded me of the famous Manjari Opera penned by Tarashankar Bandyopadhyay. Therein Manjari was removed from the scene by the family members of her paramour. Here Mallika refused to go and meet dying Bharatendu for the same reason; no social recognition.