कहानियां बहुत ज़रूरी हैं, पता है क्यूं...??? क्योंकि समाज के जिस हिस्से को हम देख नहीं पाते या हमें दिखाया नहीं जाता, वो जानना भी ज़रूरी है... गौरव सोलंकी जी की किताब शायद उन हिस्सों से गुज़रती है, किरदार वही हैं जो हमने शायद अपनी ज़िन्दगी में हमेशा देखे होंगे, पर उन किरदारों का पूर्ण सत्य नहीं जानते होंगे...!!! चाहें फिर वो 'सुधा कहाँ है' में नीलम और मिनी का किरदार हो, या 'ब्लू फ़िल्म' में यादव का किरदार...!!! कभी तो किरदार के दिल के किसी हिस्से से प्यार हो जाता है, या कभी इतनी बू आती है, कि वहां से उठ जाने का मन करता है, ये मानना मुश्किल होता है, कि असल ज़िन्दगी में ऐसे भी लोग होते हैं...!!!
ख़ैर ये किताब बहुत प्यारी लिखी गयी है, जिस कहानी ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया वो 'पतंग' थी, इस कहानी को पढ़ते में बहुत बार अश्क़ कोरों तक आ गए, हो सकता है किसी के ना भी आये हों, हर रिश्ते में एक अलग सच छुपा था, जो परतें दर परतें खुलता रहा, संध्या हर किसी की ज़िन्दगी में कहीं ना कहीं, किसी न किसी मोड़ पर टकराई होगी या टकराने वाली होगी, माँ का वर्णन लेखक द्वारा किया हुआ, दिल ले जाता है, पिताजी की बीमारी हो या वो भाई का पिटना, दोनों ही कष्टप्रद होते हैं, खैर मैं उस कहानी को वैसे शायद ना समझा पाऊं जैसा मैन महसूस किया था पड़ते वक़्त...!!!
और बात जब कहानी की चल ही रही है, तो उस कहानी का ज़िक्र ना करना बेमानी होगा, जिस शीर्षक से ये किताब हमारे बीच आयी...."ग्यारहवीं -A के लड़के" ये शीर्षक उस कक्षा से ज़्यादा उस उम्र की बात करता है, जिसमें शायद कोई पहले तो कोई कुछ समय बाद आता है, मुझे नहीं पता, कि वो जादूगर असल ज़िन्दगी में कैसा होता होगा, पर अमरजोत हो या शायना, वो किरदार ज़रूर होते होंगे, और ऐसे ही होते होंगे, बात अगर रानी की करी जाए, तो उसपर मरने वाले आज भी हर गली में, हर कक्षा में, उतने ही मिलेंगे....इस कहानी को पढ़ते वक़्त सब ऐसा लग रहा था, कि जब हम उस उम्र में थे, तो शायद हमारे आस पास भी ऐसा ही कुछ हो रहा था, शायद सम्पूर्ण ऐसा नहीं पर अधूरा तो ज़रूर, किस्से सुनकर लग रहा था, कि ये वो किस्से हैं जो शायद उस उम्र में, मेरे कानों में फुसफुसाके गया था कोई, पर मैंने उतना गौर ना किया, किन्तु फ़िर भी ये कहानी मुझे उन किस्सों को याद दिलाने में सफल रही...!!
मैं कहता हूँ ये किताब, एक बार ज़रूर पढ़नी चाहिए, पता है क्यों....एक नज़रिए के लिए,कुछ अलग जानने के लिए, और इन सबसे ऊपर, कहानी का श्रेष्ठ रूप देखने के लिए, कि जब किरादर ऐसा लगे कि वो तुम्हारे पास बैठकर, तुम्हें अपने किस्से सुना रहा हो, इससे ये और भी मज़ेदार हो जाती है...!! एक उम्दा किताब, एक विचलित करने वाला, किन्तु यथार्थ लेखन...!!!