कुछ लेखक रचना के लिए सामग्री जुटाने में ही अपनी अधिकांश शक्ति व्यय कर देते हैं ! उन्हें लगता होगा कि किसी परिघटना से ही महत्त्वपूर्ण या बड़ा जीवन-सत्य व्यक्त किया जा सकता है ! चित्रा मुद्गल जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को चुनती हैं, उनमे व्याप्त तनाव को परखती हैं, उन्हें सामाजिकता के व्यापक धरातल पर ला खड़ा करती हैं ! यह एक तरह से अकथनीय को जाहिर करने का हुनर है ! उनके लिए परिवार सबसे बड़ा सच है ! उनकी अधिकांश कहानियाँ विषम स्थितियों में भी रिश्तों को बचाए रखना चाहती हैं ! चित्रा मुद्गल की सबसे बड़ी शक्ति है उनकी अनोखी किस्सागोई ! जैसे कोई धीमी आँच वाले अलाव के पास बैठे श्रोताओं के भीतर कहानी की लौ तेज कर रहा हो ! अमृतलाल नागर, भगवतीचरण वर्मा, कामतानाथ, विजयदान देथा की भांति चित्राजी ने किस्सागोई या
चित्र मुद्गल जी की कहानियाँ समाज में विद्यमान उन वर्गों की विषमताओं को, जिनकी तरफ समाज के ऊपरी वर्ग देखना नहीं चाहते, वर्णित करती हैं. उनकी कहानियों में संजीदगी, करुणा, दर्द, (अ)मानवीयता, आदि बहुत तीव्र रूप में हैं. उनकी कहानियां बहुत ही आधारभूत भावों- भूख, प्रेम, स्वतंत्रता, आदि के इर्द-गिर्द केंद्रित हैं.
उनकी शैली रोचक है. कहानी की भूमिका बांधने में एक अनुच्छेद (paragraph) से अधिक नहीं लगता, और फिर कहानी पाठक को बाँध लेने वाले संवादों में लिखी गई है. स्थान/स्थिति-परिवर्तन का वर्णन करने में शब्द व्यर्थ नहीं किए गए हैं. पाठक इन परिवर्तनों को समझने में समर्थ है. और फिर कहानी का उपसंहार - जो बहुत ही लघु (शब्दों की गणनुसार) और तीव्र होता है लेकिन अपूर्ण या अपरिपक्व नहीं होता; अप्रत्याशित अवश्य होता है. उनकी भाषा पात्रानुकूल है और देशज शब्दों व क्षेत्रीय लहजों से परिपूर्ण है.
आधुनिक और पास के भूतकाल में स्थित वर्गों, व्यक्तियों, प्रजातियों के द्वंद्व और संघर्ष की और ध्यान दिलाने वाली ये कहानियाँ अवश्य पढ़नी चाहिए.
चित्र मुद्गल की कहानियों के पीछे की प्रेरणा और सन्देश के लिए यह साक्षात्कार [link] देखिए.