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Kyap

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'क्याप'-मायने कुछ अजीब, अनगढ़, अनदेखा-सा और अप्रत्याशित। जोशी जी के विलक्षण गद्य में कही गयी यह ‘फसक' (गप) उस अनदेखे को अप्रत्याशित ढंग से दिखाती है, जिसे देखते रहने के आदी बन गये हम जिसका मतलब पूछना और बूझना भूल चले हैं... अपने समाज की आधी-अधूरी आधुनिकता और बौद्धिकों की अधकचरी उत्तर-आधुनिकता से जानलेवा ढंग से टकराती प्रेम कथा की यह 'क्याप' बदलाव में सपनों की दारुण परिणति को कुछ ऐसे ढंग से पाठक तक पहुँचाती है कि पढ़ते-पढ़ते मुस्कराते रहने वाला पाठक एकाएक ख़ुद से पूछ बैठे कि 'अरे! ये पलकें क्यों भीग गयीं।' यथार्थ चित्रण के नाम पर सपाटे से सपाटबयानी और फार्मूलेबाज़ी करने वाले उपन्यासों कहानियों से भरे इस वक़्त में, कुछ लोगों को शायद लगे कि 'मैं' और उत्तरा के प्रेम की यह कहानी, और कुछ नहीं बस, 'ख़लल है दिमाग का', लेकिन प्रवचन या रिपोर्ट की बजाय सर्जनात्मक स्वर सुनने को उत्सुक पाठक इस अद्भुत ‘फसक' में अपने समय की डरावनी सचाइयों को ऐन अपने प्रेमानुभव में एकतान होते सुन सकता है। बेहद आत्मीय और प्रामणिक ढंग से। गहरे आत्ममन्थन, सघन समग्रता बोध और अपूर्व बतरस से भरपूर ‘क्याप' पर हिन्दी समाज निश्चय ही गर्व कर सकता है। -पुरुषोत्तम अग्रवाल

150 pages, Paperback

First published January 1, 2005

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About the author

Manohar Shyam Joshi

55 books38 followers
लखनऊ विश्वविद्यालय के विज्ञान स्नातक मनोहर श्याम जोशी ‘कल के वैज्ञानिक’ की उपाधि पाने के बावजूश्द रोजी-रोटी की खातिर छात्र जीवन से ही लेखक और पत्रकार बन गए। अमृतलाल नागर और अज्ञेय - इन दो आचार्यों का आशीर्वाद उन्हें प्राप्त हुआ। स्कूल मास्टरी, क्लर्की और बेरोजगारी के अनुभव बटोरने के बाद 21 वर्ष की उम्र से वह पूरी तरह मसिजीवी बन गए।

प्रेस, रेडियो, टी.वी. वृत्तचित्र, फिल्म, विज्ञापन-सम्प्रेषण का ऐसा कोई माध्यम नहीं जिसके लिए उन्होंने सफलतापूर्वक लेखन-कार्य न किया हो। खेल-कूद से लेकर दर्शनशास्त्र तक ऐसा कोई विषय नहीं जिस पर उन्होंने कलम न उठाई हो। आलसीपन और आत्मसंशय उन्हें रचनाएँ पूरी कर डालने और छपवाने से हमेशा रोकता रहा है। पहली कहानी तब छपी जब वह अठारह वर्ष के थे लेकिन पहली बड़ी साहित्यिक कृति तब प्रकाशित करवाई जब सैंतालीस वर्ष के होने को आए।

केन्द्रीय सूचना सेवा और टाइम्स ऑफ इंडिया समूह से होते हुए सन् ’67 में हिन्दुस्तान टाइम्स प्रकाशन में साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक बने और वहीं एक अंग्रेजी साप्ताहिक का भी संपादन किया। टेलीविजन धारावाहिक ‘हम लोग’ लिखने के लिए सन् ’84 में संपादक की कुर्सी छोड़ दी और तब से आजीवन स्वतंत्र लेखन करते रहे।

प्रकाशित कृतियाँ: कुरु-कुरु स्वाहा, कसप, हरिया हरक्यूलीज की हैरानी, हमज़ाद, क्याप, ट-टा प्रोफेसर (उपन्यास); नेताजी कहिन (व्यंग्य); बातों-बातों में (साक्षात्कार); एक दुर्लभ व्यक्तित्व, कैसे किस्सागो, मन्दिर घाट की पैड़ियाँ (कहानी-संग्रह); आज का समाज (निबंध); पटकथा लेखन: एक परिचय (सिनेमा)। टेलीविजन धारावाहिक: हम लोग, बुनियाद, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, कक्काजी कहिन, हमराही, जमीन-आसमान। फिल्म: भ्रष्टाचार, अप्पू राजा और निर्माणाधीन जमीन।

सम्मान: उपन्यास क्याप के लिए वर्ष 2005 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार सहित शलाका सम्मान (1986-87); शिखर सम्मान (अट्ठहास, 1990); चकल्लस पुरस्कार (1992); व्यंग्यश्री सम्मान (2000) आदि अनेक सम्मान प्राप्त।

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Displaying 1 - 5 of 5 reviews
Profile Image for Divya Pal.
601 reviews3 followers
February 5, 2024
जातिवाद, साम्यवाद, समाजवाद - सामान्य तौर पर राजनेता, नौकरशाही पर शानदार तीखा व्यंग्य (satire)। वन्यजीवों, लकड़ी, जड़ी-बूटियों, खनिजों आदि जैसे प्राकृतिक संसाधनों के शोषण का एक तीव्र आरोप, जैसा कि कुख्यात पहाड़ी विल्सन The Raja of Harsil: The Legend of Fedrick "Pahari Wilson" द्वारा शुरू किया गया था और वर्तमान व्यवस्था द्वारा भी जारी है - दोनों - कानूनी रूप से सरकारी एजेंसियों द्वारा और अवैध रूप से 'माफिया' द्वारा।
इसमें आरएसएस के आदर्शवादी श्री हेडगेवार की ओर संकेत है - यहां वह कम्युनिस्टों के पार्टी के मुख्यविचारक (party idealogue) हैं - 'डाक्साब'।
कथा उत्तराखंड के एक काल्पनिक क़स्बा व जनपद में स्तिथ है। यह विफल एवं अनबिलाषित प्रेम (unrequited love), प्रतिशोध और पागलपन की कहानी भी है।
अत्यंत रोचक व हास्यपूर्ण रचना।
Profile Image for Ashutosh Rai.
67 reviews43 followers
April 1, 2023
ये मनोहर श्याम जोशी की दूसरी किताब है जो मैंने पढ़ी, और इतनी अच्छी लगी कि उनकी कई और किताबें मंगवा ली हैं.

कहानी के शुरू होने के साथ ही लेखक कहानी का एक मुख्य पात्र बन जाता है और अंत तक बना रहता है. कहानी अगाथा क्रिस्टी की मर्डर मिस्ट्रीज़ की तरह शुरू होती है, लेकिन फिर एक ऐतिहासिक ड्रामा में बदल जाती है. ऐसा करते हुए लेखक आपको उत्तराँचल के उस भाग के इतिहास से भी अवगत कराता चलता है जहां से वो आता है, लेकिन वो ऐसा अपनी पहाड़ी गप्प के तरीके से करता है, तो उसका नीर-क्षीर करना पाठक की समझ के ऊपर निर्भर है. इतिहास और भूगोल के पन्नों से निकल कर फिर किताब एक कसप-टाइप की प्रेम-कथा का रूप लेती है, लेकिन वो विस्तृत नहीं है, और बीच ही में रुक जाती है, और फिर शुरू होता है एक नाटक, जो राजनीतिक भी है, और व्यक्तिगत भी, और जो कहानी के सारे सिरों को समेटता है, और उनको कस कर आपस में बाँध देता है. इस गाँठ को सुलझाना मुश्किल है, और पाठक भी शायद "व्हाट इज़ टू बी डन" पर सोचने के लिए मजबूर हो जाता है.

कहानी इतने सारे आयामों को छूने के बावजूद एक डेढ़ सौ पेज की किताब में आसानी से समा जाती है, और मेरे विचार से ऐसा लिखना मनोहर जोशी जैसे लेखक के बिना संभव नहीं होता। उनका ज्ञान इतिहास, भूगोल, राजनीति, भाषा पर तो है ही, लेकिन इन सब से ज्यादा जो जरूरी चीज़ है वो है मानव स्वभाव को समझना, और इसमें जोशी जी को कोई सानी नहीं है. बहुत से और उपन्यास होते हैं जिसमें कुछ चरित्र काफी उभर कर आते हैं, लेकिन इनकी किताबों में लगभग हर चरित्र की में लेयर्स हैं, और उनको बहुत बारीकी से गढ़ा गया है. इन सब से ऊपर जो कहानी कहने का तरीका है, वो आपको शुरू से अंत तक बांधे रखता है, कहानी का अंत कहानी के शुरू में बताने के बाद भी.
एक बात और यह है कि किताब बहुत से राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं को भी छूती है, और ये किताब का एक बहुत महत्त्वपूर्ण भाग है. क्याप की राजनीति आपको ये नहीं बता पाती कि "व्हाट इज़ टू बी डन", लेकिन बहुत गहरे में जाके शायद ये जरूर बता पाती है, कि "व्हाट इज़ नॉट टू बी डन".

कुल मिलाकर बहुत ही सुन्दर और अद्भुत किताब। इसको पढ़ने के आनंद को शब्दों में कह पाना मुश्किल है. ऐसी स्टोरीटेलिंग मिलना मुश्किल है.
210 reviews
April 12, 2024
another gem by MSJ.. i have become his fan. it is my 3rd book of MSJ and planning to buy and read more. when one reads MSJ .. one can experience history , geography , emotions, current , past all in one book. through Kyap he has literally imparted the reader almost entire history of communism in India and congress hate and love relation with it. as with kasap , the dialogues between hero and heroine in this novel also are very amusing and as usual , the heroine though younger seems to be far more matured. very interesting read. another aspect of MSJ is that there are so many up, down or twist in plots that u keep invested in novel. the end is always unpredictable.
Profile Image for Pankaj Verma.
21 reviews
April 1, 2024
This book can easily be read in one sitting. Good read, but not upto the level of Kasap, another book from Manohar Shyam Joshi.
Profile Image for Abhishek.
68 reviews2 followers
June 23, 2025
क्याप ही है ये किताब. निरी गप्प. सिरा पकडते पकडते अंत में याद आता है कि ये तो क्याप है. अगर कसप पढ़कर इस ओर आए हैं तो कुछ नए के लिए तैयार रहें।
Displaying 1 - 5 of 5 reviews

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