Full Review: https://soundingwords.blogspot.com/20... राजस्थान में रहकर भी विजयदान देथा जी के साहित्य से मेरी मुलाकात कुछ दिन पहले हुई। उनकी किताब “अन्तराल” पढते हुए विश्वास करना मुश्किल था कि इतनी गहराई से हिन्दी में लिखा पढ रही हूँ। हर एक कहानी के पात्र और उनके अंतर्मन से गुजरने पर पहली बार एहसास हुआ कि विजयदान देथा जी को “राजस्थान का शेक्सपियर” क्यूँ कहा गया है, और उनकी कृति 2011 में नोबल पुरुस्कार के लिए क्यूँ नामांकित किया गया था। लोककथाओं के जादूगर विजयदान देथा उर्फ बिज्जी की किताब अंतराल उनकी 16 बेहतरीन कहानियों का संग्रह है। हर कहानी से गुजरते वक्त रुक-रुक कर उनके शब्दो को आत्मसात करने को जी रहा था। सुगढ पात्रो को कितने भोलेपन से रचा ने देथा जी ने, शब्द ना कम ना ज्यादा। मन चाह रहा था, कुछ पक्तियों पर पेंसिल फेर लूँ। लेकिन पूरी किताब पर ये कारस्तानी करना कहाँ मुम्किन होता है। कुछ नए शब्द इजाद किए गए थे, नए अहसासो को कई रूपकों में पिरोकर पाठको को नया नज़रिया दिया गया है। अहसासो की गहराई के साथ-साथ, उनके पात्र हंसाते भी है, चाहे वो ‘दूरी’ की हव्वा हो जो ड्राईवर की सीट से हटने को तैयार नहीं है लेकिन चाहती है अपने बेटे से मिलने तुंरत पहुंच जाए।