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Shekhar Ek Jeevani : Part-2
शेखर : एक जीवनी’ को कुछ वैचारिक हलकों में आत्म तत्त्व के बाहुल्य के कारण आलोचना का शिकार होना पड़ा था। साथ ही अपने समय के नैतिक मूल्यों के लिए भी इसे चुनौती की तरह देखा गया था। लेकिन आत्म के प्रति अपने आग्रह के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि 'शेखर’ समाज से विलग, या उसके विरोध में खड़ा हुआ कोई व्यक्ति है। अगर ऐसा होता तो शेखर अपने समय-समाज के ऐसे-ऐसे प्रश्नों से नहीं जूझता जो उस समय स्वाधीनता आन्दोलन के नेतृत्वकारी विचारकों-चिन्तकों के लिए भी चिन्ता का मुख्य बिन्दु नहीं थे, मसलन, जाति और स्त्री से सम्बन्धित प्रश्न। जैसा कि स्वयं अज्ञेय ने संकेत किया है, शेखर अपने समय से बनता हुआ पात्र है। वह परिस्थितियों से विकसित होता हुआ और परिस्थितियों को आलोचनात्मक दृष्टि से देखता हुआ पात्र है। उपन्य
- GenresFiction
261 pages, Kindle Edition
First published January 1, 1944
About the author
सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'
52 books63 followersजन्म : ७ मार्च १९११ को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में।
शिक्षा : प्रारंभिक शिक्षा–दीक्षा पिता की देख–रेख में घर पर ही संस्कृत‚ फारसी‚ अंग्रेजी और बँगला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ। १९२५ में पंजाब से एंट्रेंस की परीक्षा पास की और उसके बाद मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिल हुए।वहाँ से विज्ञान में इंटर की पढ़ाई पूरी कर १९२७ में वे बी .एस .सी .करने के लिए लाहौर के फॉरमन कॉलेज के छात्र बने।१९२९ में बी .एस .सी . करने के बाद एम .ए .में उन्होंने अंग्रेजी विषय रखा‚ पर क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण पढ़ाई पूरी न हो सकी।
कार्यक्षेत्र : १९३० से १९३६ तक विभिन्न जेलों में कटे। १९३६–१९३७ में ‘सैनिक’ और ‘विशाल भारत’ नामक पत्रिकाओं का संपादन किया। १९४३ से १९४६ तक ब्रिटिश सेना में रहे‚ इसके बाद इलाहाबाद से ‘प्रतीक’ नामक पत्रिका निकाली और ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी स्वीकार की। देश–विदेश की यात्राएं कीं। जिसमें उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लेकर जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन का काम किया। दिल्ली लौटे और ‘दिनमान’ साप्ताहिक, ‘नवभारत टाइम्स’, अंग्रेजी पत्र ‘वाक्’ और ‘एवरीमैंस’ जैसी प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया। १९८० में उन्होंने ‘वत्सलनिधि’ नामक एक न्यास की स्थापना की‚ जिसका उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करना था। दिल्ली में ही ४ अप्रैल १९८७ में उनकी मृत्यु हुई।
१९६४ में ‘आँगन के पार द्वार’ पर उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और १९७९ में ‘कितनी नावों में कितनी बार’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।
प्रमुख कृतियाँ –
कविता संग्रह : भग्नदूत, इत्यलम,हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर–मुद्रा‚ पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ‚ महावृक्ष के नीचे‚ नदी की बाँक पर छाया और ऐसा कोई घर आपने देखा है।
कहानी–संग्रह :विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप।
उपन्यास – शेखरः एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।
यात्रा वृत्तांत – अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।
निबंधों संग्रह : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मानेपद, आधुनिक साहित्यः एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल,
संस्मरण :स्मृति लेखा
डायरियां : भवंती‚ अंतरा और शाश्वती।
उनका लगभग समग्र काव्य ‘सदानीरा’ ह्यदो खंडहृ नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध ‘केंद्र और परिधि’ नामक ग्रंथ में संकलित हुए हैं।
विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं के संपादन के साथ–साथ ‘अज्ञेय’ ने ‘तार सप्तक’‚ ‘दूसरा सप्तक’‚ और ‘तीसरा सप्तक’ – जैसे युगांतरकारी काव्य–संकलनों का भी संपादन किया तथा ‘पुष्करिणी’ और ‘रूपांबरा’ जैसे काव्य–संकलनों का भी।
वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध–संग्रहों के भी संपादक हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका–पुरूष थे‚ जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।
Sachchidananda Hirananda Vatsyayana 'Agyeya' (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'), popularly known by his pen-name Ajneya ("Beyond comprehension"), was a pioneer of modern trends not only in the realm of Hindi poetry, but also fiction, criticism and journalism. He was one of the most prominent exponents of the Nayi Kavita (New Poetry) and Prayog (Experiments) in Modern Hindi literature, edited the 'Saptaks', a literary series, and started Hindi newsweekly, Dinaman.
Agyeya also translated some of his own works, as well as works of some other Indian authors to English. A few books of world literature he translated into Hindi also.
Wikipedia entry
कविता कोश पता
शिक्षा : प्रारंभिक शिक्षा–दीक्षा पिता की देख–रेख में घर पर ही संस्कृत‚ फारसी‚ अंग्रेजी और बँगला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ। १९२५ में पंजाब से एंट्रेंस की परीक्षा पास की और उसके बाद मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज में दाखिल हुए।वहाँ से विज्ञान में इंटर की पढ़ाई पूरी कर १९२७ में वे बी .एस .सी .करने के लिए लाहौर के फॉरमन कॉलेज के छात्र बने।१९२९ में बी .एस .सी . करने के बाद एम .ए .में उन्होंने अंग्रेजी विषय रखा‚ पर क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेने के कारण पढ़ाई पूरी न हो सकी।
कार्यक्षेत्र : १९३० से १९३६ तक विभिन्न जेलों में कटे। १९३६–१९३७ में ‘सैनिक’ और ‘विशाल भारत’ नामक पत्रिकाओं का संपादन किया। १९४३ से १९४६ तक ब्रिटिश सेना में रहे‚ इसके बाद इलाहाबाद से ‘प्रतीक’ नामक पत्रिका निकाली और ऑल इंडिया रेडियो की नौकरी स्वीकार की। देश–विदेश की यात्राएं कीं। जिसमें उन्होंने कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय से लेकर जोधपुर विश्वविद्यालय तक में अध्यापन का काम किया। दिल्ली लौटे और ‘दिनमान’ साप्ताहिक, ‘नवभारत टाइम्स’, अंग्रेजी पत्र ‘वाक्’ और ‘एवरीमैंस’ जैसी प्रसिद्ध पत्र पत्रिकाओं का संपादन किया। १९८० में उन्होंने ‘वत्सलनिधि’ नामक एक न्यास की स्थापना की‚ जिसका उद्देश्य साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्य करना था। दिल्ली में ही ४ अप्रैल १९८७ में उनकी मृत्यु हुई।
१९६४ में ‘आँगन के पार द्वार’ पर उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ और १९७९ में ‘कितनी नावों में कितनी बार’ पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार।
प्रमुख कृतियाँ –
कविता संग्रह : भग्नदूत, इत्यलम,हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्र धनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर–मुद्रा‚ पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ‚ महावृक्ष के नीचे‚ नदी की बाँक पर छाया और ऐसा कोई घर आपने देखा है।
कहानी–संग्रह :विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप।
उपन्यास – शेखरः एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।
यात्रा वृत्तांत – अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।
निबंधों संग्रह : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मानेपद, आधुनिक साहित्यः एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल,
संस्मरण :स्मृति लेखा
डायरियां : भवंती‚ अंतरा और शाश्वती।
उनका लगभग समग्र काव्य ‘सदानीरा’ ह्यदो खंडहृ नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध ‘केंद्र और परिधि’ नामक ग्रंथ में संकलित हुए हैं।
विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं के संपादन के साथ–साथ ‘अज्ञेय’ ने ‘तार सप्तक’‚ ‘दूसरा सप्तक’‚ और ‘तीसरा सप्तक’ – जैसे युगांतरकारी काव्य–संकलनों का भी संपादन किया तथा ‘पुष्करिणी’ और ‘रूपांबरा’ जैसे काव्य–संकलनों का भी।
वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध–संग्रहों के भी संपादक हैं। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका–पुरूष थे‚ जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।
Sachchidananda Hirananda Vatsyayana 'Agyeya' (सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन 'अज्ञेय'), popularly known by his pen-name Ajneya ("Beyond comprehension"), was a pioneer of modern trends not only in the realm of Hindi poetry, but also fiction, criticism and journalism. He was one of the most prominent exponents of the Nayi Kavita (New Poetry) and Prayog (Experiments) in Modern Hindi literature, edited the 'Saptaks', a literary series, and started Hindi newsweekly, Dinaman.
Agyeya also translated some of his own works, as well as works of some other Indian authors to English. A few books of world literature he translated into Hindi also.
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Displaying 1 - 20 of 20 reviews
November 22, 2021
शेखर - एक जीवनी का दुसरा भाग शेखर कि कथा को आगे क्रमशः बढ़ाता है। शेखर का कॉलेज कि पढ़ाई कि ओर निराशावाद कि अवस्था।अपने जीवन के उद्देश्य के प्रश्न को हल करना।दस महीने जेल में भारत के तात्कालिक सत्य से परिचय। जेल में बाबा, मोहसिन और रामजी से जीवन को समझने का नया दृष्टिकोण।
जेल के दस महीने शेखर को स्वतंत्रता सेनानी के कार्यछेत्र कि ओर उन्मुख करते हैं।पर अंत तक पहुँच कर मैं शेखर के अंदर के विरोधाभास, उसकी निराशावाद, उसके विद्रोही चरित्र को तो समझि, पर ये ना समझ सकी कि क्या था उसके जीवन का उद्देश्य जिस पर उसे उत्सर्ग किया जा सके? समाज व्यवस्था में बदलाव? देश कि स्वतन्त्रता? क्या? जो भी कुछ उसने किया वो तो धारा के प्रवाह में बहने जैसा लगता है।
मैं शशि के पात्र पर बस यही कहूँगी कि वो शेखर कि बहन, उसका प्रेम, उसके जीवन को बांधे रखने वाली एक सूत्र, इन सबसे बढ़कर शशि शेखर कि प्रेरणा थी।परंतु इतना होकर भी शेखर के जीवन का क्या मूल्यांकन हो सकता है?
जेल के दस महीने शेखर को स्वतंत्रता सेनानी के कार्यछेत्र कि ओर उन्मुख करते हैं।पर अंत तक पहुँच कर मैं शेखर के अंदर के विरोधाभास, उसकी निराशावाद, उसके विद्रोही चरित्र को तो समझि, पर ये ना समझ सकी कि क्या था उसके जीवन का उद्देश्य जिस पर उसे उत्सर्ग किया जा सके? समाज व्यवस्था में बदलाव? देश कि स्वतन्त्रता? क्या? जो भी कुछ उसने किया वो तो धारा के प्रवाह में बहने जैसा लगता है।
मैं शशि के पात्र पर बस यही कहूँगी कि वो शेखर कि बहन, उसका प्रेम, उसके जीवन को बांधे रखने वाली एक सूत्र, इन सबसे बढ़कर शशि शेखर कि प्रेरणा थी।परंतु इतना होकर भी शेखर के जीवन का क्या मूल्यांकन हो सकता है?
April 19, 2016
दुरूह भाषा, सार्थक कथानक, मौलिक लेखन
August 21, 2020
प्रेम, विश्वास, त्याग, वेदना,संवेदना, संघर्ष, शान्ति, गति और स्थिरता जैसे सुन्दर और मोहक भावों एवं स्थितियों में गूँथ कर बनाई गई एक माला है, यह उपन्यास।
April 18, 2026
‘शेखर एक जीवनी” उपन्यास केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि एक संवेदनशील और जटिल मन की आंतरिक संरचना का दस्तावेज़ है।
प्रथम भाग शेखर के बचपन से युवावस्था तक के मानसिक गठन का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अध्ययन है, जहाँ आत्मविश्लेषण कथा की केंद्रीय शक्ति बन जाता है। वह अपने भीतर उठते प्रेम, अपराधबोध, ईर्ष्या, कामना, समर्पण और नैतिक दुविधाओं का निर्मम विश्लेषण करता है, वह स्वयं को क्षमा नहीं करता, बल्कि अपने ही मन को कटघरे में खड़ा करता है।
घटनाएँ यहाँ रैखिक क्रम में नहीं चलतीं, बल्कि स्मृतियों की तरह उभरती हैं, खंडित, कभी-कभी अधूरी, किंतु अत्यंत जीवंत। शेखर ईश्वर, नैतिकता, आत्मा और स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों से जूझता है, पर किसी स्थिर निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, उसका मूल संघर्ष अस्तित्व का भी है और यही प्रश्न उसे समाज से काटता भी है और उसे एक तीव्र वैयक्तिक चेतना से संपन्न भी बनाता है। भाग एक के अंत तक प्रतीत होता है कि वह उसके अंतर मन के तमाम प्रश्नों के उत्तर के निकट है किंतु उत्तर मिलते नहीं, भाग दो में भी वही उन्ही प्रश्नों से जुज रहा किंतु अब वह उत्तर खोजने के बजाय उन्हीं प्रश्नों को जीवन की ठोस परिस्थितियों में जीने लगता है, विचार अब अनुभव में परिवर्तित हो जाते हैं और आत्ममंथन बाहरी यथार्थ, क्रांतिकारी गतिविधियों, संबंधों, जोखिम और मृत्यु की निकटता से टकराता है। प्रेम भी उसके लिए आश्रय नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षा का क्षेत्र है, वह संबंधों में पूर्णता खोजता है और उसी आग्रह में असंतोष पाता है।
शेखर का चरित्र किसी आदर्श प्रतिमा की तरह निष्कलंक नहीं है, वह विरोधाभासों से भरा है, निर्णयों में ग़लतियाँ करता है, कभी आत्ममुग्ध तो कभी आत्मसंशयी हो उठता है और यही मानवीय अपूर्णता से वह किताब का एक चरित्र मात्र न रहकर,जीवंत बन जाता है। उपन्यास की भाषा दार्शनिक है, जो कभी कभी दुरूह भी जाती है पर वही दुरूहता उसके चिंतन की गहराई को व्यक्त करती है। संवादों की अपेक्षा आत्मसंवाद अधिक है और घटनाओं की अपेक्षा विचारों की आंतरिक गतिकी, संभवतः इसी कारण कुछ पाठकों को उपन्यांस में कथानक धीमा प्रतीत हो सकता है, फिर भी मेरे लिए यह शेखर की आत्मकथा न रहकर, उन सभी लोगों की आत्मकथा बन जाती है जो अपने भीतर की आग को समझने की कोशिश करते है।
भाग एक एवं दो के पैराग्राफ/अंश जो मुझे पसंद आए —
1)”…….. क्या यह आवश्यक है की स्त्रियों को एक ही दृष्टि से देखा जाए, एक ही प्रश्न उनसे पूछा जाए? उसने कहीं पढ़ा था की डाकू जब किसी नए आदमी से मिलते है तब यही सोचते है कि यह हमारा मित्र है या शत्रु, हमारे पाप-कर्म में सम्मिलित होगा, या उसमें विघ्न डालेगा। क्या यह ज़रूरी है कि स्त्रियों की और उसी डाकू वृत्ति से देखा जाए — समझा जाय या तो वे एक विशेष पाप-कर्म-विशेष में पुरुषों की संगिनी है — और या पुरुषों की शत्रु हैं, भयंकर है?”
2) “…….जीवन एक ही बार मिलता है, और मानव जीवन का कोई भी अंश नित्य नहीं, मृत्यु में उसका संपूर्ण अवसान हो जाता है, कुछ भी नहीं रहता जो पुनर्जन्म पा सके….. और शक्ति? शक्ति भी नष्ट हो जाती है? नहीं, शक्ति नहीं नष्ट होती, केवल रूप बदलती है। पर शक्ति तो अकर्तुक ( impersonal) होती है, और शक्ति और पदार्थ विभिन्न नहीं, एक ही कुछ के दो आकार है। तब क्या आज जो मेरी विद्रोही शक्ति है, वही कल किसी को बांधने के लिए लौह शृंखला होगी - किसी विद्रोही को, जो कि मेरी ही भाँति भविष्य को बदलना चाहता होगा, और जो स्वयं अपने भविष्य के लिए बंधन हो जाएगा!”
3)”….. पीड़ा तपस्या है, किंतु असली तपस्या तो जिज्ञासा है — क्योंकि वही सबसे बड़ी पीड़ा है…”
4) “….. बालक दयाभाव से उन बिचारे बच्चों की बात सोचता है जिनके माता पिता ‘ग़रीब लोग’ है और उनके लिए खिलौने नहीं ख़रीद सकते। न फल।
बालक पूछता है, ‘ इनके बच्चे खेलते कहाँ होंगे?
‘नहीं खेलते’
‘क्यों?’
‘…….’
क्या उत्तर दे कि शरीर में इतनी शक्ति ही नहीं है की खेल सके? ये वे है , जो खेलते नहीं, जो स्वयं खिलौने है, जिनसे विधि खेलती है?”
प्रथम भाग शेखर के बचपन से युवावस्था तक के मानसिक गठन का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक अध्ययन है, जहाँ आत्मविश्लेषण कथा की केंद्रीय शक्ति बन जाता है। वह अपने भीतर उठते प्रेम, अपराधबोध, ईर्ष्या, कामना, समर्पण और नैतिक दुविधाओं का निर्मम विश्लेषण करता है, वह स्वयं को क्षमा नहीं करता, बल्कि अपने ही मन को कटघरे में खड़ा करता है।
घटनाएँ यहाँ रैखिक क्रम में नहीं चलतीं, बल्कि स्मृतियों की तरह उभरती हैं, खंडित, कभी-कभी अधूरी, किंतु अत्यंत जीवंत। शेखर ईश्वर, नैतिकता, आत्मा और स्वतंत्रता जैसे प्रश्नों से जूझता है, पर किसी स्थिर निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, उसका मूल संघर्ष अस्तित्व का भी है और यही प्रश्न उसे समाज से काटता भी है और उसे एक तीव्र वैयक्तिक चेतना से संपन्न भी बनाता है। भाग एक के अंत तक प्रतीत होता है कि वह उसके अंतर मन के तमाम प्रश्नों के उत्तर के निकट है किंतु उत्तर मिलते नहीं, भाग दो में भी वही उन्ही प्रश्नों से जुज रहा किंतु अब वह उत्तर खोजने के बजाय उन्हीं प्रश्नों को जीवन की ठोस परिस्थितियों में जीने लगता है, विचार अब अनुभव में परिवर्तित हो जाते हैं और आत्ममंथन बाहरी यथार्थ, क्रांतिकारी गतिविधियों, संबंधों, जोखिम और मृत्यु की निकटता से टकराता है। प्रेम भी उसके लिए आश्रय नहीं, बल्कि आत्मपरीक्षा का क्षेत्र है, वह संबंधों में पूर्णता खोजता है और उसी आग्रह में असंतोष पाता है।
शेखर का चरित्र किसी आदर्श प्रतिमा की तरह निष्कलंक नहीं है, वह विरोधाभासों से भरा है, निर्णयों में ग़लतियाँ करता है, कभी आत्ममुग्ध तो कभी आत्मसंशयी हो उठता है और यही मानवीय अपूर्णता से वह किताब का एक चरित्र मात्र न रहकर,जीवंत बन जाता है। उपन्यास की भाषा दार्शनिक है, जो कभी कभी दुरूह भी जाती है पर वही दुरूहता उसके चिंतन की गहराई को व्यक्त करती है। संवादों की अपेक्षा आत्मसंवाद अधिक है और घटनाओं की अपेक्षा विचारों की आंतरिक गतिकी, संभवतः इसी कारण कुछ पाठकों को उपन्यांस में कथानक धीमा प्रतीत हो सकता है, फिर भी मेरे लिए यह शेखर की आत्मकथा न रहकर, उन सभी लोगों की आत्मकथा बन जाती है जो अपने भीतर की आग को समझने की कोशिश करते है।
भाग एक एवं दो के पैराग्राफ/अंश जो मुझे पसंद आए —
1)”…….. क्या यह आवश्यक है की स्त्रियों को एक ही दृष्टि से देखा जाए, एक ही प्रश्न उनसे पूछा जाए? उसने कहीं पढ़ा था की डाकू जब किसी नए आदमी से मिलते है तब यही सोचते है कि यह हमारा मित्र है या शत्रु, हमारे पाप-कर्म में सम्मिलित होगा, या उसमें विघ्न डालेगा। क्या यह ज़रूरी है कि स्त्रियों की और उसी डाकू वृत्ति से देखा जाए — समझा जाय या तो वे एक विशेष पाप-कर्म-विशेष में पुरुषों की संगिनी है — और या पुरुषों की शत्रु हैं, भयंकर है?”
2) “…….जीवन एक ही बार मिलता है, और मानव जीवन का कोई भी अंश नित्य नहीं, मृत्यु में उसका संपूर्ण अवसान हो जाता है, कुछ भी नहीं रहता जो पुनर्जन्म पा सके….. और शक्ति? शक्ति भी नष्ट हो जाती है? नहीं, शक्ति नहीं नष्ट होती, केवल रूप बदलती है। पर शक्ति तो अकर्तुक ( impersonal) होती है, और शक्ति और पदार्थ विभिन्न नहीं, एक ही कुछ के दो आकार है। तब क्या आज जो मेरी विद्रोही शक्ति है, वही कल किसी को बांधने के लिए लौह शृंखला होगी - किसी विद्रोही को, जो कि मेरी ही भाँति भविष्य को बदलना चाहता होगा, और जो स्वयं अपने भविष्य के लिए बंधन हो जाएगा!”
3)”….. पीड़ा तपस्या है, किंतु असली तपस्या तो जिज्ञासा है — क्योंकि वही सबसे बड़ी पीड़ा है…”
4) “….. बालक दयाभाव से उन बिचारे बच्चों की बात सोचता है जिनके माता पिता ‘ग़रीब लोग’ है और उनके लिए खिलौने नहीं ख़रीद सकते। न फल।
बालक पूछता है, ‘ इनके बच्चे खेलते कहाँ होंगे?
‘नहीं खेलते’
‘क्यों?’
‘…….’
क्या उत्तर दे कि शरीर में इतनी शक्ति ही नहीं है की खेल सके? ये वे है , जो खेलते नहीं, जो स्वयं खिलौने है, जिनसे विधि खेलती है?”
January 17, 2026
मैंने कुछ ही दिनों पहले अज्ञेय का उपन्यास 'शेखर : एक जीवनी' का (पहला भाग पढ़ने के बाद) दूसरा भाग (संघर्ष) पढ़ा है। और यह किताब अब तक की मेरी सबसे प्रिय किताबों में से एक बन चुकी है और अज्ञेय मेरे प्रिय लेखक। पढ़ने पर बार बार लगता है कि यह किसी दूसरे की अथवा काल्पनिक कहानी नहीं चल रही, ये मेरी ही कहानी है। ठीक ही कहा है अज्ञेय ने - "इसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है।" ये किताब हर व्यक्ति को पढ़नी चाहिए क्योंकि इसमें युग परिवर्तन की क्षमता है। यह समाज और पारिवारिक संस्थाएँ कैसे व्यक्ति को ग़ुलाम बना देती है और अपनी इस परवरिश और ग़ुलामी के प्रति कैसे कोई व्यक्ति जीवन-भर विद्रोह करता रह सकता है, यह 'शेखर' उपन्यास हमें सिखाता है। बालक-शेखर के रूप में बालमन का मनोविज्ञान और उस निरीह,मासूम बालमन की जिज्ञासाओं के साथ कैसा छद्म व्यवहार यह समाज करता है, इसे अत्यंत दक्ष तरीके से दिखाया गया है। शेखर और शशि का प्रेम, प्रेम की एक मौलिक अवधारणा प्रस्तुत करता है। जिस भी व्यक्ति को प्रेम को उसके विशुद्ध रूप में जानना हो वह उन दोनों के प्रेम को समझे, जहाँ शशि कहती है कि - " शेखर, तुम मुझे बहिन, माँ, भाई, बेटा, कुछ मत समझो, क्योंकि मैं अब कुछ नहीं हूँ।.... और अमूर्त होकर मैं- तुम्हारा अपना-आप हूँ, जिसे तुम नाम नहीं दोगे।" जो भी प्रेम को सम्बन्धों का नामकरण कर उसका परिसीमन करते हैं वे यहाँ आएँ और प्रेम की पराकाष्ठा को आत्मानुभूत कर जाएँ। क्रांति व्यक्ति का भीतरी बीज है, कोई बाहरी 'टेबलेट' नहीं, ये समझने वाले यहाँ आएँ। एकांत बाबा मदनसिंह जैसी बड़ी-बड़ी सिद्धियों का उत्स है, ये जानने वाले यहाँ तक आएँ। आज की सभ्यता कैसे 30-30, 40-40 साल के बच्चे पैदा कर रही है, इस दृश्य की भयावहता को जानने वाले यहाँ आएँ। 'ज़िंदगी कैसे लोगों को नीरव इशारे करती है' और 'लोग इसे नहीं देखते हैं', यह पूरा तंत्र समझने के लिए यहाँ आएँ। ऐसे हज़ारों कारण जिसके कारण आपको 'शेखर एक जीवनी' तक आना चाहिए और उसे आत्मसात करना चाहिए। प्रश्न की भाषा मे कहूँ तो उसे पढ़ना चाहिए।
January 20, 2020
I always wanted to read this wonderful book, I known to any. I thank a lot to GOODREADS to make this book available for we good readers. Loves a lot!
This entire review has been hidden because of spoilers.
February 16, 2024
"शेखर एक जीवनी" जो अज्ञेय जी ने तीन खंडों में कारावास के दौरान लिखा था लेकिन तीसरे खंड का जेल से रिलीज न होने के कारण से इसे दो ही खंडों में छापा गया। कुछ लोग इसे अज्ञेय की जीवनी बताते है जबकि अज्ञेय जी के अनुसार शेखर में मेरापन कुछ अधिक है लेकिन ये आत्मजीवनी नही है।
शेखर एक ऐसा लड़का है जो बचपन से हर चीज में एक सवाल खोज लेता है फिर वो भगवान(धर्म) को लेकर हो या फिर समाज को लेकर। जैसे हम क्यू भगवान की पूजा करते है, क्यू पड़ोस में रहने वाली लड़की(जो की शुद्र है) के साथ मैं खेल नही सकता या उसका दिया कुछ खा नही सकता। ऐसी ही कई सवाल है जो वो हमेशा पूछता रहता है।
उपन्यास के पहले खंड में शेखर के बचपन के जीवन का वर्णन है जहां उसके स्कूली जीवन तक का वर्णन मिलता है। वही पर दूसरे खंड में स्कूल के बाद का वर्णन है।
शेखर शुरू से ही विद्रोही होता है अपनी इन्ही आदतों की वजह से जहां वो कुछ गरीब बच्चो को फ्री में पढ़ाता है वही पर एक स्वयंसेवक संघ से जुड़कर 10 महीनो के लिए जेल भी चला जाता है जहां पर उसकी मुलाकात बाबा और मोहसिन से होती है जिनसे वह जीवन और मृत्यु, निराशा और आशा, सफलता और विफलता, प्रेम और घृणा, रचनात्मकता और आत्म-विनाश, व्यक्तिपरकता और निष्पक्षता जैसे विचारो पर सवाल करता है और पूरी पुस्तक में वह इन्ही विचारो से जूझता रहता है। उसकी मौसेरी बहन शशि का उसके जीवन पर बहुत गहरा पर पढ़ता है जिसका पति उसको शेखर से उसके रिश्ते के शक के चलते घर से निकाल देता है।
यह एक बहुत ही खूबसूरत उपन्यास है जो 1920 के आसपास के समय के बारे में बहुत अच्छी तरह से जानकारी देती है साथ ही हमे कुछ कठिन प्रश्नों का जवाब देने की भी कोशिश करती है।
यदि आपने इससे पहले अज्ञेय जी के "नदी के दीप" या "कसप" को पढ़ रखा है तो आप उनकी लेखनी से वाकिफ होंगे कि उनका उपन्यास ऐसे ही सीधे सीधे नही लिखा होता हर पृष्ट एक किताब जैसा लंबा लगता है लेकिन फिर भी आप उसे पढ़ना चाहते है।
"शेखर एक जीवनी" एक कमाल का उपन्यास है जिसे सभी हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले को पढ़ना चाहिए । मुझे पूरा विश्वास है कि इस किताब के बाद आप उनकी बाकी रचनाओं को भी जरूर पढ़ना चाहेंगे।
ऐसे ही किताबों से जुड़े जानकारी के लिए और उनकी समीक्षा के लिए आप इंस्टाग्राम पर मुझे @amitandbooks_ फॉलो जरूर करे।
शेखर एक ऐसा लड़का है जो बचपन से हर चीज में एक सवाल खोज लेता है फिर वो भगवान(धर्म) को लेकर हो या फिर समाज को लेकर। जैसे हम क्यू भगवान की पूजा करते है, क्यू पड़ोस में रहने वाली लड़की(जो की शुद्र है) के साथ मैं खेल नही सकता या उसका दिया कुछ खा नही सकता। ऐसी ही कई सवाल है जो वो हमेशा पूछता रहता है।
उपन्यास के पहले खंड में शेखर के बचपन के जीवन का वर्णन है जहां उसके स्कूली जीवन तक का वर्णन मिलता है। वही पर दूसरे खंड में स्कूल के बाद का वर्णन है।
शेखर शुरू से ही विद्रोही होता है अपनी इन्ही आदतों की वजह से जहां वो कुछ गरीब बच्चो को फ्री में पढ़ाता है वही पर एक स्वयंसेवक संघ से जुड़कर 10 महीनो के लिए जेल भी चला जाता है जहां पर उसकी मुलाकात बाबा और मोहसिन से होती है जिनसे वह जीवन और मृत्यु, निराशा और आशा, सफलता और विफलता, प्रेम और घृणा, रचनात्मकता और आत्म-विनाश, व्यक्तिपरकता और निष्पक्षता जैसे विचारो पर सवाल करता है और पूरी पुस्तक में वह इन्ही विचारो से जूझता रहता है। उसकी मौसेरी बहन शशि का उसके जीवन पर बहुत गहरा पर पढ़ता है जिसका पति उसको शेखर से उसके रिश्ते के शक के चलते घर से निकाल देता है।
यह एक बहुत ही खूबसूरत उपन्यास है जो 1920 के आसपास के समय के बारे में बहुत अच्छी तरह से जानकारी देती है साथ ही हमे कुछ कठिन प्रश्नों का जवाब देने की भी कोशिश करती है।
यदि आपने इससे पहले अज्ञेय जी के "नदी के दीप" या "कसप" को पढ़ रखा है तो आप उनकी लेखनी से वाकिफ होंगे कि उनका उपन्यास ऐसे ही सीधे सीधे नही लिखा होता हर पृष्ट एक किताब जैसा लंबा लगता है लेकिन फिर भी आप उसे पढ़ना चाहते है।
"शेखर एक जीवनी" एक कमाल का उपन्यास है जिसे सभी हिंदी साहित्य में रुचि रखने वाले को पढ़ना चाहिए । मुझे पूरा विश्वास है कि इस किताब के बाद आप उनकी बाकी रचनाओं को भी जरूर पढ़ना चाहेंगे।
ऐसे ही किताबों से जुड़े जानकारी के लिए और उनकी समीक्षा के लिए आप इंस्टाग्राम पर मुझे @amitandbooks_ फॉलो जरूर करे।
January 16, 2026
Yesterday, after a long time, I read over two hundred pages of a book in a day—and that too while translating many passages using AI, as my grasp of Hindi is not good enough to understand the dense shuddha Hindi-Sanskrit mix of Agyey’s prose.
...शेखर कमरे में इधर-उधर टहलने लगा, जो कुछ उसने सुना-कहा था, उसे पूरी तरह समझने और अपनाने का प्रयत्न करने लगा... पिछली रात से जो आत्मीयता का वृत्त स्थापित—प्रकट—हो गया था, उसके बारे में उसके मन में रत्ती भर भी संशय नहीं था—शशि असन्दिग्ध और अपरिहार्य रूप से उसके ‘इह’ का अंश थी; और शशि के साथ खड़े होने का जो कर्त्तव्य उसने अपनाया था, उसकी करणीयता—और प्रीतिपूर्वक, गौरव मानकर करणीयता—भी उतनी ही असन्दिग्ध थी; किन्तु क्या इस असन्दिग्धता देखना केवल एक समस्या की ही असन्दिग्धता देखना नहीं है; क्या यह समस्या का निराकरण भी उसमें उतना ही असन्दिग्ध है?... उसे बोध हुआ कि 'दूसरा रास्ता भी होगा' के आग्रह में 'दूसरा रास्ता है' का आश्वासन नहीं है। वह आश्वासन—
शेखर: एक जीवनी by अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) is pretty dense, animated with inner and outer turmoils, and deeply psycho-philosophical. You cannot understand truth and ethics unless you encounter them, and he puts you right in the center of it, churning your thoughts and leaving you ennobled, all while aligning his rebel nature against his family, society, and the British Empire. Also, he takes the stock themes and characters of the Hindi novel and elevates them to an altogether different level.
I have been this agitated only while reading Naipaul, Bellow, Hesse, and Rand.
This book was the source of Dharamvir Bharati’s tragic love story Gunahon Ka Devta.
I might read it again while relishing parts of it, but now I am on to his biography and his next novel, Nadi Ke Dweep. The titles of his books are as poetic as his poems, such as Kitni Navon Mein Kitni Bar and Apne Apne Ajnabi.
...शेखर कमरे में इधर-उधर टहलने लगा, जो कुछ उसने सुना-कहा था, उसे पूरी तरह समझने और अपनाने का प्रयत्न करने लगा... पिछली रात से जो आत्मीयता का वृत्त स्थापित—प्रकट—हो गया था, उसके बारे में उसके मन में रत्ती भर भी संशय नहीं था—शशि असन्दिग्ध और अपरिहार्य रूप से उसके ‘इह’ का अंश थी; और शशि के साथ खड़े होने का जो कर्त्तव्य उसने अपनाया था, उसकी करणीयता—और प्रीतिपूर्वक, गौरव मानकर करणीयता—भी उतनी ही असन्दिग्ध थी; किन्तु क्या इस असन्दिग्धता देखना केवल एक समस्या की ही असन्दिग्धता देखना नहीं है; क्या यह समस्या का निराकरण भी उसमें उतना ही असन्दिग्ध है?... उसे बोध हुआ कि 'दूसरा रास्ता भी होगा' के आग्रह में 'दूसरा रास्ता है' का आश्वासन नहीं है। वह आश्वासन—
शेखर: एक जीवनी by अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन) is pretty dense, animated with inner and outer turmoils, and deeply psycho-philosophical. You cannot understand truth and ethics unless you encounter them, and he puts you right in the center of it, churning your thoughts and leaving you ennobled, all while aligning his rebel nature against his family, society, and the British Empire. Also, he takes the stock themes and characters of the Hindi novel and elevates them to an altogether different level.
I have been this agitated only while reading Naipaul, Bellow, Hesse, and Rand.
This book was the source of Dharamvir Bharati’s tragic love story Gunahon Ka Devta.
I might read it again while relishing parts of it, but now I am on to his biography and his next novel, Nadi Ke Dweep. The titles of his books are as poetic as his poems, such as Kitni Navon Mein Kitni Bar and Apne Apne Ajnabi.
October 9, 2024
इस उपन्यास को पाठ्यक्रम में होने के कारण विवशता में पढ़ना शुरू किया था पर आज लगता है जैसे एक शेखर, हर व्यक्ति में कहीं न कहीं रहता है। हम अनजाने ही उसे पोषित करते हैं और स्वयं में उसे विकसित होने का अवसर भी देते है।
एक व्यक्ति और एक रिश्ता जो सामाजिक स्तर पर स्वीकार्य नहीं, उसे इतनी संवेदना और सहज रूप से सामने रख देना अज्ञेय ही कर सकते हैं।
ये सोच कर भी हैरानी होती है कि आज से 80 वर्षों पूर्व लेखक एक आत्मघात के लिए प्रस्तुत व्यक्ति की मनोदशा इतनी सटीकता से चित्रित कर सकता है।
शेखर वो व्यक्ति नहीं है जिसे समाज सहजता से अंक में लेता है परंतु वह वो है जो समाज के उसके अनुसार न होने पर समाज को भी ठुकरा सकता है। ये साहस हर किसी में नहीं होता।
शेखर विलक्षण है और इस विलक्षणता को सहज शशि करती है। वो स्त्री जो स्वयं से ही इतनी संघर्षरत रहती है कि बाहर की दुनिया में वो एकदम शांत और जड़ प्रतीत होती है। शशि और शेखर दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। न शेखर के अभाव में शशि संभव है न शशि के अभाव में शेखर।
एक व्यक्ति और एक रिश्ता जो सामाजिक स्तर पर स्वीकार्य नहीं, उसे इतनी संवेदना और सहज रूप से सामने रख देना अज्ञेय ही कर सकते हैं।
ये सोच कर भी हैरानी होती है कि आज से 80 वर्षों पूर्व लेखक एक आत्मघात के लिए प्रस्तुत व्यक्ति की मनोदशा इतनी सटीकता से चित्रित कर सकता है।
शेखर वो व्यक्ति नहीं है जिसे समाज सहजता से अंक में लेता है परंतु वह वो है जो समाज के उसके अनुसार न होने पर समाज को भी ठुकरा सकता है। ये साहस हर किसी में नहीं होता।
शेखर विलक्षण है और इस विलक्षणता को सहज शशि करती है। वो स्त्री जो स्वयं से ही इतनी संघर्षरत रहती है कि बाहर की दुनिया में वो एकदम शांत और जड़ प्रतीत होती है। शशि और शेखर दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। न शेखर के अभाव में शशि संभव है न शशि के अभाव में शेखर।
January 20, 2026
सच कहूँ तो शेखर: एक जीवनी की शुरुआत से लेकर अंत तक मुझे यह अपनी ही कहानी लगी। अंतर बस इतना है कि मेरी भावनाएँ शेखर जितनी प्रगाढ़ नहीं हैं, पर उसके भीतर की rebelness, मेहनत करने का जुनून, एकांत से गहरा प्रेम और उम्र से पहले आ गई गंभीरता — ये सब कहीं न कहीं मेरे भीतर भी जीवित हैं।
शेखर आज के उन युवाओं की प्रतिलिपि है जो रोज़गार पाने या अपने अस्तित्व को साबित करने की लड़ाई में लगातार जूझ रहे हैं। रहस्यों की खोज करते-करते स्वयं एक रहस्य बन जाना — यही शेखर की सबसे बड़ी त्रासदी और सुंदरता दोनों है।
वह रास्ता जिसे शेखर चुनता है, समाज के तयशुदा रास्तों से बिल्कुल अलग है। प्रेम, क्रोध, अपमान, सद्भावना और अन्याय — हर भावना इतनी तीव्रता से उभरती है कि पाठक कई बार असहज भी हो उठता है, पर यही इस कृति की आत्मा है।
शेखर केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक चेतना है — और उसे जन्म देने वाले अज्ञेय को नमन। ऐसी रचना जो पढ़ी नहीं जाती, बल्कि भीतर तक उतर जाती है।
शेखर आज के उन युवाओं की प्रतिलिपि है जो रोज़गार पाने या अपने अस्तित्व को साबित करने की लड़ाई में लगातार जूझ रहे हैं। रहस्यों की खोज करते-करते स्वयं एक रहस्य बन जाना — यही शेखर की सबसे बड़ी त्रासदी और सुंदरता दोनों है।
वह रास्ता जिसे शेखर चुनता है, समाज के तयशुदा रास्तों से बिल्कुल अलग है। प्रेम, क्रोध, अपमान, सद्भावना और अन्याय — हर भावना इतनी तीव्रता से उभरती है कि पाठक कई बार असहज भी हो उठता है, पर यही इस कृति की आत्मा है।
शेखर केवल एक पात्र नहीं, बल्कि एक चेतना है — और उसे जन्म देने वाले अज्ञेय को नमन। ऐसी रचना जो पढ़ी नहीं जाती, बल्कि भीतर तक उतर जाती है।
November 13, 2022
Cannot really find what is so great about this incestuous book? What kept me engaged was the use of pure Hindi.
कठोर और कड़वा और चिरंतन नारी का अभिमान कि जो समाज उसका आदर नहीं करता, उसीके हाथों नष्ट-भ्रष्ट, छिन्न-त्रस्त-ध्वस्त होकर वह उसकी अवमानना करेगी... आशीर्वाद? क्या आर्शीवाद हो उस नारी को क्षुद्र पुरुष का? कि तू हुतात्मा हो, मेरी ज्वाला उज्जवल और सुगन्धित और निर्धूम हो! लज्जा क्षोभ और आत्मग्लानि से शेखर ने अपनी बंधी हुई छाती में मार ली
जल, ऊर्ध्वगे, जल यज्ञ-ज्वाला जल! उत्तप्त जल, उज्जवल और सुवासित जल, क्षार-हीन और निर्धूम और अक्षय जल! यह मुझ अभागे का आशीर्वाद हो!
भेड़ों की तरह झुण्ड बांधकर रहेंगे, तो भेद-चाल चलनी पड़ेगी। भेद-चाल का सभ्य नाम संस्कृति है।
June 13, 2025
एक पुस्तक जो एक जिज्ञासु मन, जो अछूत प्रेम और समाज में हो रही कुरीति और भी अनेक प्रकार की चीजों से लड़ रहा है और सदैब ही जान ने और सीखने को तत्पर, कई बार लड़ते लड़ते हार कर भी कोशिश नहीं बंद करता।
शेखर को परिभाषित करना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि वह सब कुछ है वह प्रेमी है, वह एक प्रेमी भाई है, वह एक अजीब पुत्र( अपने अजीब सवालों के कारण), वह एक पाठक है, वह एक कैदी है, वह एक क्रांतिकारी है, वह एक नौसिखिया है, वह एक पेंटर है, वह एक बहन की अटूट प्रेम है।
पढ़िए और जानिए शेखर को यह बहुत कुछ सिखाएंगे
शेखर को परिभाषित करना बहुत ही मुश्किल है क्योंकि वह सब कुछ है वह प्रेमी है, वह एक प्रेमी भाई है, वह एक अजीब पुत्र( अपने अजीब सवालों के कारण), वह एक पाठक है, वह एक कैदी है, वह एक क्रांतिकारी है, वह एक नौसिखिया है, वह एक पेंटर है, वह एक बहन की अटूट प्रेम है।
पढ़िए और जानिए शेखर को यह बहुत कुछ सिखाएंगे
April 3, 2023
शेखर एक जीवनी भाग 2
भाग 2 में 4 खंड है जिसमें शेखर के कॉलेज जीवन से लेकर उनकी व्यस्क होने तक के घटनाक्रमों का सजीव मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव से भरा हुआ चित्रण है
अपने समय काल की परिस्थितियों का भी जीवन दोनों करते हैं
भाग 2 में 4 खंड है जिसमें शेखर के कॉलेज जीवन से लेकर उनकी व्यस्क होने तक के घटनाक्रमों का सजीव मनोवैज्ञानिक उतार-चढ़ाव से भरा हुआ चित्रण है
अपने समय काल की परिस्थितियों का भी जीवन दोनों करते हैं
July 24, 2023
This afternoon, I finished reading this book. My heart has found a new home in this. Maybe not everyone will appreciate the vulnerability, but maybe it is not for everyone either.
I have a feeling, tonight, I will hug this book to sleep.
I have a feeling, tonight, I will hug this book to sleep.
January 1, 2023
Not reading this book would be a shame.
April 24, 2023
उत्तम
पुस्तक छायावादी है। एक सामान्य बालक से क्रांतिकारी युवक होने तक का ऊहा पोह चित्रित किया गया है जो अनूठा है।
पुस्तक छायावादी है। एक सामान्य बालक से क्रांतिकारी युवक होने तक का ऊहा पोह चित्रित किया गया है जो अनूठा है।
April 1, 2025
शेखर एक जीवनी ,केवल जीवनी न होकर अज्ञेय द्वारा शेखर के रूप में रहकर लड़ा गया आदर्शवाद और यथार्थवाद के बीच का द्वंद्व है।
April 30, 2026
I wish i could read the third part-
July 8, 2026
Overhyped
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