सुंदर नाटक। लेकिन लगा कि कुछ हिस्सों में और भी बहतर हो सकता था। मानो हाथ आते आते कुछ छूट गया। पर जिस द्वंद की बात इसका मूल आधार है और जिस तरह से उसे नंद के पात्र के ज़रिए दिखाया गया है वो आपने में सटीक, महत्वपूर्ण और सुंदर है।
लहरों के राजहंस में सांसारिक सुखों और आध्यात्मिक शांति के परस्पर विरोध तथा उसके बीच खड़े व्यक्ति के अंतर्विरोध को चित्रित किया गया है।
सन् 1968 के इस नाटक में दर्शाया गया है कि स्त्री और पुरुष के बीच के कृत्रिम और आरोपित द्वंद के कारण व्यक्ति के लिए चुनाव करना मुश्किल हो जाता है और चुनने की स्वतंत्रता भी नहीं रहती। प्रेम और अध्यात्म के बीच चुनाव की यातना ही इस रचना का कथा-बीज और केंद्र-बिंदु है।
मोहन राकेश ने पात्रों और कथा-स्थिति को एक आधुनिक अर्थ व्यंजना प्रदान की है और एक ऐतिहासिक कथानक (बुद्ध का पत्नी यशोधरा को छोड़ कर जाना) को रचनात्मक स्तर पर भाव के संवेदन से महत्वपूर्ण बना दिया है। वैचारिक और सैद्धांतिक दृष्टि से यह एक बहुआयामी और कलात्मक कृति है।