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नंदरानी के घर

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मोबाइल की लगातार बज रही घंटी ने हमें जगा दिया। सच्ची हमें अखर गया था इस टाइम ये घंटी बजना। हमारे घर में दो मोबाइल थे। एक हमारे इनके पास रहता था। इनके? हाय राम! इनका नाम कैसे ले लें हम! बड़े शहरों की बेशरम औरतें लेती होंगी नाम अपने आदमी का, हम तो नहीं ले सकते, चाहें कोई मार ही डाले हमें। पर जी बात तो मोबाइल की हो रही थी। दूसरा मोबाइल कहिए तो पंचायती था। घर पे रहता था, रिश्तेदारों में जिसको भी इनके अलावा किसी से भी बात करनी होती थी तो इस वाले पे ही घंटी मारता था। खास हमारे लिए इसपे कोई फोन नहीं आता था। हमारा इनसे ब्याह हुए आठ साल हो गए थे पर अभी तक एक बार तो बाबा के मरे की खबर देने के लिए अम्मा ने फोन किया था। उसके अलावा साल में राखी और भइया दूज पे किसी भइया का या भौजाई का फोन आ जाता था। भाइयों-भî

231 pages, Kindle Edition

Published November 12, 2019

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Lolita L

1 book

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