लाहौर (अब पाकिस्तान) में जन्मे श्री गुरुदत्त हिन्दी साहित्य के एक देदीप्यमान नक्षत्र थे। वह उपन्यास-जगत् के बेताज बादशाह थे। अपनी अनूठी साधना के बल पर उन्होंने लगभग दो सौ से अधिक उपन्यासों की रचना की और भारतीय संस्कृति का सरल एवं बोधगम्य भाषा में विवेचन किया। साहित्य के माध्यम से वेद-ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने का उनका प्रयास निस्सन्देह सराहनीय रहा है।
श्री गुरुदत्त के साहित्य को पढ़कर भारत की कोटि-कोटि जनता ने सम्मान का जीवन जीना सीखा है।
उनके सभी उपन्यासों के कथानक अत्यन्त रोचक, भाषा, अत्यन्त सरल और उद्देश्य केवल मनोरंजन ही नहीं, अपितु जन-शिक्षा भी है। राष्ट्रसंघ के साहित्य-संस्कृति संगठन ‘यूनेस्को’ के अनुसार श्री गुरुदत्त हिन्दी भाषा के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले लेखक थे।
उपन्यास : गुण्ठन, चंचरीक, आशा निराशा, सम्भवामि युगे युगे-भाग 1, सम्भवामि युगे युगे भाग 2, अवतरण, कामना, अपने पराये, आकाश-पाताल, अनदेखे बन्धन, घर की बात, आवरण, जीवन ज्वार, महाकाल, यह संसार, वाम मार्ग, दो भद्र पुरुष, बनवासी, प्रारब्ध और पुरुषार्थ, विश्वास, माया जाल, पड़ोसी, नास्तिक, प्रगतिशील, सभ्यता की ओर, मेघ वाहन, भगवान भरोसे, ममता, लुढ़कते पत्थर, लालसा, दिग्विजय, धर्मवीर हकीकत राय, दासता के नये रूप, स्वराज्य दान, नगर परिमोहन, भूल, स्वाधीनता के पथ पर, विश्वासघात, देश की हत्या, पत्रलता, भारतवर्ष का संक्षिप्त इतिहास, पथिक, प्रवंचना, पाणिग्रहण, परित्राणाय साधूनाम, गृह-संसद, सब एक रंग, विक्रमादित्य साहसांक, गंगा की धारा, सदा वत्सले मातृभूमे, पंकज, सागर-तरंग, भाव और भावना, दो लहरों की टक्कर-भाग 1, दो लहरों की टक्कर-भाग 2, सफलता के चरण, मैं हिन्दू हूँ, मैं न मानूँ, स्व-अस्तित्व की रक्षा, प्रतिशोध, भाग्य का सम्बल, बन्धन शादी का, वीर पूजा, वर्तमान दुर्व्यवस्था का समाधान हिन्दू राष्ट्र, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की अन्तिम यात्रा, सुमति, युद्ध और शान्ति-भाग 1, युद्ध और शान्ति-भाग 2, जमाना बदल गया-भाग 1, जमाना बदल गया-भाग 2, जमाना बदल गया-भाग 3, जमाना बदल गया भाग-4, खण्डहर बोल रहे हैं-भाग 1, खण्डहर बोल रहे हैं-भाग 2, खण्डहर बोल रहे हैं-भाग 3, प्रेयसी, परम्परा, धरती और धन, हिन्दुत्व की यात्रा, अस्ताचल की ओर भाग-1, अस्ताचल की ओर-भाग 2, अस्ताचल की ओर-भाग 3, भाग्य चक्र, द्वितीय विश्वयुद्ध, भैरवी चक्र, भारत में राष्ट्र, बुद्धि बनाम बहुमत, धर्म तथा समाजवाद, विकार, अग्नि परीक्षा, जगत की रचना, अमृत मन्थन, जिन्दगी, श्रीराम।
दिग्विजय गुरुदत्त जी की एक अप्रतिम कृति है। इसके माध्यम से उन्होंने आदिगुरु शंकराचार्य के जीवन में घटित कुछ घटनाओं को एक कहानी के खोल में लपेटकर चित्रित किया है। न सिर्फ आदिगुरु शंकराचार्य के ज्ञान, विलक्षण प्रतिभा, शास्त्रज्ञान और वाक्पटुता का वर्णन है जो कि मूलतः सर्वज्ञात है वरन उनकी उदारता, धैर्यता, सहनशीलता, विनम्रता और अग्र विचारों का भी विवरण है।
गुरुदत्त जी के स्वयं शास्त्रज्ञ और संस्कृत भाषा के जानकार होने के कारण इस पुस्तक में धर्मग्रंथों से कई पंक्तियाँ उद्धृत की गयी हैं जो कथानक में ऐसे जड़ी गयीं हैं मानो स्वर्ण हार में श्रेष्ठ रत्न।
वैसे यह पुस्तक उनके जीवन का चिट्ठा नहीं है, यह उनकी यात्रा और उनके विद्वानों के साथ हुए शास्त्रार्थ का विवरण है जिसके साथ उस समय की सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक और सांस्कृतिक अवस्था की व्यवस्था है। इस मूल कथानक के साथ एक समानांतर कथा भी है जिसमे अन्य पात्रों के माध्यम से दर्शाया गया है कि किस प्रकार भारतीय समाज को कुरीतियों से दूर कर एक संयुक्त इकाई बनाने में शंकराचार्य जी प्रयासरत रहे थे।
भगवान आदि शंकराचार्य जी ने पवित्र भारत भूमि के चारों दिशाओं की यात्रा कर वहाँ स्थापित मतों को जिनमें समय के कारण कुछ दूषण आ गए थे, उन्हें अपने ज्ञान से दूषण मुक्त कर दिग्विजय किया। इसी दिग्विजय की पृष्ठभूमि में है भारतीय समाज जिसकी भिन्न भिन्न समस्याएँ हैं, समाज जो गृहस्थ है, समाज जो पुरोहित है, समाज जो विचारक है। इस समाज में समय के कारण कई धारणाएँ बन जाती हैं, यदि उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं प्राप्त होता, तो यही धारणाएँ कभी कभी मानव विरोधी भी हो जाती हैं। ऐसे में आदि शंकराचार्य जैसी पुण्य आत्माओं का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, जो समय समय पर भारत भूमि में प्रकट होकर समाज का मार्गदर्शन करतीं हैं।
आदि शंकराचार्य जी की दिग्विजय यात्रा पर आधारित ये उपन्यास ऐसे ही एक समाज पृष्ठभूमि पर केंद्रित है। जहाँ समाज की विभिन्न समस्याओं पर तथा पंडितों और आचार्यों की संसार को लेकर जो विचार हैं, उनके विभिन्न पहलुओं पर आदि शंकराचार्य के विचारों को रखा गया है। उनकी दिग्विजय किन अर्थों में समाज उपयोगी और उनकी मार्गदर्शिका है, यही इस पुस्तक का मूल है।