अपने अपने राम वस्तुतः एक विशाल षड्यंत्र कथा है जिसका ताना-बाना लेखक ने बड़ी बारीकी से बुना है। इसलिए अति-परिचित कथा में भी आदि से अन्त तक कुतूहल बना रहता है और बहुत कुछ ‘डिटेक्टिव' का-सा मजा आता है। वसिष्ठ के जासूस हर जगह हैं।-डॉ. नामवर सिंह
भगवान सिंह का जन्म, 1 जुलाई 1931 गोरखपुर जनपद के एक मध्यवित्त किसान परिवार में। गोरखपुर विश्व विद्यालय से एम. ए. (हिंदी) । आरंभिक लेखन सर्जनात्मक कविता, कहानी, उपन्यास और आलोचना। 1968 में भारत की सभी भाषाओं को सीखने के क्रम में भाषाविज्ञान और इतिहास की प्रचलित मान्यताओं से अनमेल सामग्री का प्रभावशाली मात्रा में पता चलने पर इसकी छानबीन के लिए स्थान नामों का भाषावैज्ञानिक अध्ययन, अंशतः प्रकाशित, नागरीप्रचारिणी पत्रिका,(1973)। इसके बाद मुख्य रुचि भाषा और इतिहास के क्षेत्र में अनुसंधान में और सर्जनात्मक लेखन प्रासंगिक हो गया। इसके बाद के शोधग्रंथों में हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य, दो खंडों में, (1987) राधाकृष्ण प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली; दि वेदिक हड़प्पन्स,(1995), आदित्य प्रकाशन, एफ 14/65, मॉडल टाउन द्वितीय, दिल्ली- 110009; भारत तब से अब तक(1996) शब्दकार प्रकाशन, अंगद नगर, दिल्ली-92, (संप्रति) किताबघर प्रकाशन, दरियागंज, नई दिल्ली; भारतीय सभ्यता की निर्मिति (2004) इतिहासबोध प्रकाशन, इलाहाबाद; प्राचीन भारत के इतिहासकार, सस्ता साहित्य मंडल, नई दिल्ली,(2011); कोसंबीः कल्पना से यथार्थ तक, आर्यन बुक्स इंटरनेशनल, नई दिल्ली,(2011); आर्य- द्रविड़ भाषाओं का अंतः संबंध, सस्ता साहित्य मण्डल (2013); भाषा और इतिहास,(प्रकाश्य)। संप्रति ऋग्वेद का सांस्कृतिक दाय पर काम कर रहे हैं।
"अपने अपने राम" राम की कथा को सर्वथा भिन्न रूप में प्रस्तुत करता उपन्यास है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका यथार्थ रूप। यह कोरा आदर्श नहीं है। इसमें राम 'राम' हीं हैं 'भगवान' नहीं। यहाँ राम की मर्यादा थोथी या जड़ न होकर जीवित और जागृत है। अपने लिए 'देवता' शब्द का प्रयोग सुन कर वे कहते हैं - "लक्ष्मण, किसी मनुष्य की हत्या करने के दो उपाय हैं - उसे देवता या पशु बना देना। दोनों का परिणाम एक ही है - उस मनुष्य को न रहने देना।" पृ०250 अब तक आपने जब भी कभी राम की कथा पढ़ी या सुनी होगी तो आपका 'दिल' प्रभावित हुआ होगा ; यह उपन्यास आपके 'दिमाग' को प्रभावित करेगा। एक तरह से आपका 'ब्रेनवाश' करेगा। वैसे ये ब्रेनवाश आपके लिए सहायक सिद्ध होगा। वर्तमान में, राम की यह कथा पूर्व-रचित अन्य राम-कथाओं से अधिक ग्राह्य है।
यह पुस्तक रामायण का एक कल्पित पाठांतर है। यूँ कहें कि यदि प्रभु राम और उनके परिवार के साथ बिग बॉस खेला जाये तो कुछ ऐसा ही बनेगा। भगवान सिंह जी ने क्या खूब लिखा है! कई बार तो मुझे विश्वास न हुआ तो मैंने पुस्तक में उद्धृत हिस्सों को वाल्मीकि रामायण में ढूँढा - एकदम प्रामाणिक है। आज तक और किसी ने कभी इस बारे में कुछ क्यों नहीं लिखा इस बात पर मुझे आश्चर्य होता है। शायद आज के समय में यह पुस्तक प्रकाशित होती तो बहुत हंगामा होता और शायद प्रतिबन्ध भी लग जाता।
साधारणतः माना जाता है कि महाभारत रामायण से अधिक हिंसक और पारिवारिक क्लेश से भरा है। रामायण के सारे पात्र प्रेम से भरे हैं ख़ास कर प्रभु राम और उनका परिवार। लेखक ने कुछ अपनी कल्पना और कुछ रामायण से उद्धृत अंशों का मेल कर रामायण कथा का ऐसा रूप प्रस्तुत किया है जो आपने पहले कभी न देखा हो - राजभवन की षड़यंत्र और राजनीति।
ज्यादा कुछ लिखूँगा तो कहानी का भेद खुल जायेगा। एक बार ओरछा गया था तो वहां एक मंदिर देखा था राजा राम मंदिर - इस पुस्तक तो पढ़ उस मंदिर कि कहानी याद हो आयी। अगर आप ऐतिहासिक/पौराणिक कहानियों में रूचि रखते हैं तो इस पुस्तक को जरूर पढ़ें। मैं निश्चितता के साथ कहता हूँ कि आप एक बार पढ़ना शुरू करें तो फिर बंद नहीं कर पाएंगे।
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी" | यही इस महा काव्यात्मक उपन्यास का शीर्षक आभास कराता है | लेखक के "राम" न तो भगवान हैं और न कोई महामानव | हाँ, अपने उद्दात्त चरित्र के कारण वे कई बार असामान्य प्रतीत होते हैं | कैकई और वशिष्ठ के प्रति उनका व्यवहार उन्हें सचमुच महानतम मनुष्यों की श्रेणी में खड़ा कर देता है | स
सड़े गले शास्त्रों के प्रति जो विचार इस उपन्यास में राम के माध्यम से लेखक ने प्रस्तुत किये हैं, वो अत्यंत क्रांतिकारी हैं | क्या धर्म और संस्कृति को बहती हुई नदी के समान निरंतर प्रवाहित होना आवश्यक नहीं है ? इसे कुछ स्वयंभू ठेकेदारों के द्वारा एक गंदे पोखर में बदल दिया गया है |
पंडितों और पुरोहितों से लेखक की चिढ वशिष्ठ के चरित्र चित्रण में साफ़ झलकती है, जिसका कारण मुझे स्पष्ट नहीं है | लेखक के जीवन से जुड़ी कोई घटना या राजनीतिक विचारधारा इसकी वजह हो सकती है |
अंतिम अध्यायों में कैकई के मनोभावों का विश्लेषण जिस कुशलता के साथ किया गया है, उसे पढ़कर लगता है कि लेखक मनोविज्ञान के भी अच्छे जानकार हैं |
अंत में इतना अवश्य कहूँगा कि जो लोग राम कथा का प्रतिदिन "मानस" के रूप में "पाठ" करतें हैं, यह उपन्यास उनके लिए कतई नहीं है | यदि आप "राम" को समझना चाहते हैं, तो एक बार अवश्य इसे पढ़ें |
At first , I thaught this book was written from a liberal or “woke” perspective, aiming to malign characters like Sitaji or Ramji and the Ramayan
However, as I continued reading, I realized that the author approaches the subject through reason and logic something often missing from traditional interpretations of the Ramcharitmanas. It turned out to be a thought provoking and worth read that challenges conventional understanding
While I must have read over 25+ books on Mahabharata as it is a rather complex story with so many shades that can be explored and delved deeper, I always felt that Ramayana lacks that array of colors. It always felt like a story like it’s protagonist - too good to be true. This was why while I continue to read Ramcharita Manas every year (although not for religious reasons, being an agnostic), and have read few peripheral books on the subject, the broader storyline always intrigued me lesser than Mahabharata.
This book was a revelation!
This is a book that confidently breaks all the stereotypes and retells the story of Ram from an entirely different perspective. It felt like as if written by Barbarik, from a distance, looking at it impartially. And that makes it extremely beautiful.
This book courageously retells the story of Ramayana by making all it’s characters very human, including Ram, Bharat, Dashrath, Hanuman, Kaikeyi and that helps connect to the narrative immediately. It depicts politics, royal facade, sibling rivalry, social injustice very meticulously but most of all it addresses head-on the problems of Casteism. That was a masterstroke. In this book it is not Ravana who is the anti-hero but Vashistha and league of Brahmins. Quite an interesting take.
All in all, a wonderful read and now I am too intrigued to pick Kohli ji’s retelling of Ramayana.
So glad I was recommended this by a friend and the book found me.
रामकथा हम सबके जीवन में किसी न किसी मोड़ पर आई है। कभी दादी की गोद में, कभी मोहल्ले की रामलीला में, कभी टीवी पर। और हर बार हमने राम को वैसे ही देखा मर्यादा पुरुषोत्तम, भगवान, आदर्श। लेकिन जब आप भगवान सिंह का ‘अपने अपने राम’ उठाते हैं, तो यह किताब आपको अचानक झटका देती है। जैसे कोई कह दे कि वही कहानी जो तुमने बरसों से सुनी है, अब उसे नए सिरे से सुनो।
यहाँ राम युद्ध के नायक नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाले इंसान हैं। वह कर्मकांडों से चिढ़ते हैं, यज्ञ-बलिदान को बर्बरता मानते हैं, और समाज की जड़ताओं पर गुस्सा करते हैं। यह राम आपके भीतर के तर्कशील हिस्से से बात करते हैं। और सीता? वह तो इस उपन्यास में बिल्कुल नई लगती हैं। वाल्मीकि आश्रम में बैठी, अपनी कहानी खुद कहने वाली। आत्मनिर्भर, आत्मसम्मानी और बेख़ौफ़। वह सिर्फ़ त्याग की प्रतिमा नहीं हैं, बल्कि समाज की आँखों में आँख डालकर खड़ी होने वाली स्त्री हैं।
पढ़ते हुए एक अजीब-सा रोमांच बना रहता है। नामवर सिंह ने इसे षड्यंत्र कथा कहा था, और सच में, कई बार लगता है जैसे आप कोई डिटेक्टिव नॉवेल पढ़ रहे हों। घटनाओं के पीछे देवताओं की इच्छा नहीं, बल्कि सत्ता और राजनीति की चालें काम कर रही होती हैं। यह दृष्टि किताब को ताजगी देती है औ��� पुराने किस्से में नया रंग भर देती है।
लेकिन सच यही है कि यह किताब उतनी आसान नहीं है। इसमें विचारों का इतना बोझ है कि कहानी कई बार दम तोड़ देती है। पात्रों के संवाद उपदेश में बदल जाते हैं। राम और सीता जैसे पात्र, जिन्हें हम दिल से महसूस करना चाहते हैं, इतने तर्कशील और आधुनिक बना दिए गए हैं कि उनसे भावनात्मक जुड़ाव टूट जाता है। पारंपरिक पाठक के लिए यह राम शायद बहुत अजनबी लगेंगे। और जब लेखक रावण को सिर्फ़ ‘दास व्यापारी’ बना देते हैं, सीता-हरण को दास-व्यापार से जोड़ देते हैं, या बार-बार ब्राह्मणवाद पर एकतरफ़ा प्रहार करते हैं तो यह सब कल्पना ज़्यादा और प्रमाण कम लगता है। यही वजह है कि कई जगह उपन्यास साहित्यिक कथा से ज़्यादा वैचारिक घोषणापत्र-सा लगता है।
फिर भी, इस किताब की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह साहस करती है। यह राम को मंदिर से उतारकर इंसान की ज़मीन पर लाती है और कहती है कि हर किसी के अपने-अपने राम हो सकते हैं। कोई उन्हें भगवान मानता है, कोई सुधारक, कोई तर्कशील इंसान। और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है, यह हमें हमारे भीतर झाँकने के लिए मजबूर करती है।
तो पढ़नी चाहिए यह किताब? हाँ, बिल्कुल। लेकिन श्रद्धा का चश्मा उतारकर। अगर आप वही राम ढूँढना चाहते हैं जो बचपन की कहानियों में थे, तो यह किताब आपको परेशान कर सकती है। लेकिन अगर आप यह समझना चाहते हैं कि साहित्य कैसे पुराने मिथकों को नए अर्थों से भरता है, कैसे राम को केवल धार्मिक प्रतीक नहीं बल्कि विचार का केंद्र बनाया जा सकता है, तो ‘अपने अपने राम’ एक अनिवार्य पठन है।
क्यों पढ़ें? इसलिए कि यह किताब आसान जवाब नहीं देती। यह कठिन सवाल छोड़ जाती है। और वही साहित्य टिकता है, जो हमें सोचने पर मजबूर करे।
कितने समय बाद कोई ऐसी पुस्तक मिली जिसने कथानक के किरदार, आरम्भ और अंत एक जैसे ही रखे पर उस कहानी का केंद्र-बिंदु ही बदल दिया। उसके पात्रों को देखने का नज़रिया ही बदल दिया। इस किताब को वही व्यक्ति पढ़ कर सराह सकता है जिसमें लीक से हटकर प्रश्न पूँछने का साहस और दूसरे दृष्टिकोण को बिना किसी पूर्वाग्रह के समझने की क्षमता हो।
This is a must read book for everyone interested in Ram. It is so well written that I feel compelled to read it again and again and my respect and devotion for Ram has increased.