कोर्ट मार्शल *********** इनकी सबसे प्रसिद्ध नाटक "कोर्ट मार्शल" का विषय भारतीय सेना के अंदर ऑफिसर्स और सबसे निचले तबके के सैनिकों के बीच व्याप्त भेद-भाव है। आज के दौर में सेना को "holy cow" की तरह दिखाने की कोशिश की जाती है, लेकिन हर संस्था में इंसान इसी समाज से ही जाता है तो उसमें अच्छे और बुरे दोनों का सम्मिश्रण तो होगा ही। इस नाटक में वर्णित घटनाक्रम पाठक को पूरी तरह से बांधे रखता है।
(5 आउट ऑफ़ 5 स्टार्स फॉर दिस वन।) ------
नाटक बाल भगवान ******
समाज में व्याप्त अन्धविश्वास और धर्म के व्यापार को विषय बनाया गया है। कुछ भी नयापन या अनोखा नहीं है इस नाटक में।
(1 आउट ऑफ़ 5 स्टार्स।)
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सबसे उदास कविता *********
इसकी कथावस्तु सशस्त्र वर्ग संघर्ष है। नक्सल मूवमेंट्स के साथ सिम्पैथी दिखाता हुआ एकतरफा कहानी है ---- अर्बन नक्सल लिटरेचर सॉर्ट ऑफ।
(2.5 आउट ऑफ़ 5 स्टार्स।)
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PS : सन् 1991 में कलकत्ता में कोर्ट मार्शल के मंचन के बाद से ही लेखक मानसिक बीमारी की गिरफ्त में चले गए थे और 97 तक दुनिया से कटे रहे थे। इस समय अंतराल में PGI चंडीगढ़ में इलाज़ के दौरान MD कर रही एक डॉक्टर "डॉ वसंथा" से मुलाकात होती है जो इन्हें "पापा" कहकर संबोधित करती थी। उसके पिताजी नक्सल आंदोलन के नेता रहे होंगे और उन्हें फाँसी हुई होगी। डॉ वसंथा भी जानती है कि मेडिकल कॉलेज से निकलने के बाद किसी भी दिन पुलिस उसे भी मार देगी। इसी डॉ वसंथा के लिए उन्होंने "सबसे उदास कविता" नाटक लिखा । इस नाटक की मुख्यपात्र "अपूर्वा", जो कि एक जर्नलिस्ट और नक्सल क्रन्तिकारी है, इसी डॉ पर बेस्ड है।
Court Martial is really well written but the other two plays come nowhere close to it. Both "Baal Bhagwan" and "Ek Udaas Kavita" are packed with insights and great one-liners but the characters just seem like they are there to keep expounding the ideologies they believe in and don't seem real after a point. The drama also seems to drag on in these two plays. All three plays have similar endings which is a little disappointing.