आपके हाथों में एक छोटी सी किताब दे रहा हूँ, जो 'उम्मीद से' है | कविता हमेशा उम्मीद से होती है, चाहे वो किसी भी परिपेक्ष में कही हो | सातवीं कक्षा में मैडम सुनीता मल्होत्रा के अनुग्रह पे पहली कविता लिखी थी, और ये निश्चय किया था कि एक दिन खूब सारी कहूँगा | चालीस बरस बीत गए पर अभी ठीक से चालीस भी न कह पाया | हालाँकि ज़िन्दगी सरपट भागी है, पर जब कभी भी रुकी है, कविता बन रुकी है | बस वही आपसे कह रहा हूँ | पर संभाल के, ' उम्मीद से ' है |