संस्कृत के प्रख्यात गद्यकार बाणभट्ट सातवीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन के समय में हुए। उनकी दो कृतियाँ हर्षचरितम् तथा कादम्बरी संस्कृत गद्य का अपार वैभव और सौंदर्य ही नहीं, भारतीय कथा का अद्भुत संसार भी हमारे सामने खोलती हैं। बाणभट्ट की कादम्बरी पारंपरिक कथा की विधा को अद्वितीय योगदान भी है और आधुनिक उपन्यास की विधा का एक भारतीय मानक भी प्रस्तुत करती है। इसके औपन्यासिक कलेवर और विस्तार के कारण ही मराठी में उपन्यास के अर्थ में ‘कादम्बरी’ शब्द एक जातिवाचक संज्ञा भी बन गया। प्रस्तुत उपन्यास बाणभट्ट कीकादम्बरी का एक ह और नवीन रूपांतर है, जिसे संस्कृत के जाने-माने विद्वान् तथा साहित्यकार राधावल्लभ त्रिपाठी ने रचा है। यह कादम्बरी पर आधारित एक मौलिक नई कृति होने के कारण भारतीय
बाणभट्ट रचित कादंबरी का यह औपन्यासिक रूपांतरण किसी छुपे हुए खज़ाने से कम नहीं, एक पल के लिए भी यह नहीं लगता की यह संस्कृत की कालज्यी रचना का अनुवाद है। वर्णात्मक शैली का यह उपन्यास बाणभट्ट की महानता तथा राधावल्लभ त्रिपाठी जी के अद्भुत सर्जनशक्ति को दर्शाता है। भारतीय साहित्य को चाहनेवालो को एक बार इसे अवश्य ही पढ़ना चाहिए।
Hindi Literature after a long long time and it turns out to be the translation of a 7th Century Sanskrit book. Unbelievably story with its twists and turns and that too all happening around my own hometown of Ujjainy :) Although a very short book from my standards with merely 158 pages but it took me 4-5 days to finish it all thanks to its chaste Hindi which totally took me by surprise. I read a few lines to my wife's amazement too and she was shocked that Hindi language can be so rich and expressive. I am definitely looking forward to one more work from the original author (Radhavallabh Tripathi only translated this book). A gem of a story.