कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।
कुछ बदलने वाला है...है ना? यह आहट बरबस हम तक पहुँच जाती है। जैसे सालों से थमें हुए तालाब के किनारे हम बरसों-बरस इंतज़ार कर रहे थे... तभी एक कंकड़ कहीं से आकर गिरता है , लहरें उठती हैं, और हमें पता चलता है कि इस थमें हुए तलाब के भीतर कितना कुछ था जो हरकत कर रहा था... और कुछ भी वैसा नहीं रहता जो सालों से चला आ रहा है... ठीक उस क्षण, सब कुछ बदल जाता है।
IT WAS SURREAL READ TILL DATE IN MY LIFE....Manav Kaul is the writer that has power to grab you in his words world...i really really wish to see this play live at prithvi theatre :)