2011 में ‘ज्ञानपीठ पुरस्कार’, 2008 में ‘व्यास सम्मान’ और 1969 में ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ से सम्मानित श्रीलाल शुक्ल की यह कृति हिन्दी का श्रेष्ठ उपन्यास है। इसका कथानक और शैली लेखक की रचनाशीलता और जीवन्तता का उत्तम उदाहरण है। प्रत्येक पात्र अपना अलग-अलग व्यक्तित्व रखता है और जीवन के विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करता है। उत्तर प्रदेश के एक अंचल विशेष का इसमें मोहक चित्रण हुआ है। अज्ञातवास में मनुष्य की अपने आपको खोजने की कहानी प्रतीकात्मक रूप में कही गयी है। 2008 में उनके साहित्यिक योगदान के लिए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ से नवाज़ा।
श्रीलाल शुक्ल (31 दिसम्बर 1925 - 28 अक्टूबर 2011) हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। वह समकालीन कथा-साहित्य में उद्देश्यपूर्ण व्यंग्य लेखन के लिये विख्यात थे।
उन्होंने 1947 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक परीक्षा पास की। 1949 में राज्य सिविल सेवासे नौकरी शुरू की। 1983 में भारतीय प्रशासनिक सेवा से निवृत्त हुए। उनका विधिवत लेखन 1954 से शुरू होता है और इसी के साथ हिंदी गद्य का एक गौरवशाली अध्याय आकार लेने लगता है। उनका पहला प्रकाशित उपन्यास 'सूनी घाटी का सूरज' (1957) तथा पहला प्रकाशित व्यंग 'अंगद का पाँव' (1958) है। स्वतंत्रता के बाद के भारत के ग्रामीण जीवन की मूल्यहीनता को परत दर परत उघाड़ने वाले उपन्यास 'राग दरबारी' (1968) के लिये उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके इस उपन्यास पर एक दूरदर्शन-धारावाहिक का निर्माण भी हुआ। श्री शुक्ल को भारत सरकार ने 2008 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया है।
व्यक्तित्व श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व अपनी मिसाल आप था। सहज लेकिन सतर्क, विनोदी लेकिन विद्वान, अनुशासनप्रिय लेकिन अराजक। श्रीलाल शुक्ल अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी भाषा के विद्वान थे। श्रीलाल शुक्ल संगीत के शास्त्रीय और सुगम दोनों पक्षों के रसिक-मर्मज्ञ थे। 'कथाक्रम' समारोह समिति के वह अध्यक्ष रहे। श्रीलाल शुक्ल जी ने गरीबी झेली, संघर्ष किया, मगर उसके विलाप से लेखन को नहीं भरा। उन्हें नई पीढ़ी भी सबसे ज़्यादा पढ़ती है। वे नई पीढ़ी को सबसे अधिक समझने और पढ़ने वाले वरिष्ठ रचनाकारों में से एक रहे। न पढ़ने और लिखने के लिए लोग सैद्धांतिकी बनाते हैं। श्रीलाल जी का लिखना और पढ़ना रुका तो स्वास्थ्य के गंभीर कारणों के चलते। श्रीलाल शुक्ल का व्यक्तित्व बड़ा सहज था। वह हमेशा मुस्कुराकर सबका स्वागत करते थे। लेकिन अपनी बात बिना लाग-लपेट कहते थे। व्यक्तित्व की इसी ख़ूबी के चलते उन्होंने सरकारी सेवा में रहते हुए भी व्यवस्था पर करारी चोट करने वाली राग दरबारी जैसी रचना हिंदी साहित्य को दी।
रचनाएँ • 10 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 9 व्यंग्य संग्रह, 2 विनिबंध, 1 आलोचना पुस्तक आदि उनकी कीर्ति को बनाये रखेंगे। उनका पहला उपन्यास सूनी घाटी का सूरज 1957 में प्रकाशित हुआ। उनका सबसे लोकप्रिय उपन्यास राग दरबारी 1968 में छपा। राग दरबारी का पन्द्रह भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेजी में भी अनुवाद प्रकाशित हुआ। राग विराग श्रीलाल शुक्ल का आखिरी उपन्यास था। उन्होंने हिंदी साहित्य को कुल मिलाकर 25 रचनाएं दीं। इनमें मकान, पहला पड़ाव, अज्ञातवास और विश्रामपुर का संत प्रमुख हैं। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ हैं - 1. सूनी घाट का सूरज (1957) 2. अज्ञातवास (1962) 3. ‘राग दरबारी (1968) 4. आदमी का ज़हर (1972) 5. सीमाएँ टूटती हैं (1973) 6. ‘मकान (1976) 7. ‘पहला पड़ाव’(1987) 8. ‘विश्रामपुर का संत (1998) 9. बब्बरसिंह और उसके साथी (1999) 10. राग विराग (2001) 11. ‘यह घर मेरी नहीं (1979) 12. सुरक्षा और अन्य कहानियाँ (1991) 13. इस उम्र में (2003) 14. दस प्रतिनिधि कहानियाँ (2003) • उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य रचनाएँ हैं- 1. अंगद का पाँव (1958) 2. यहाँ से वहाँ (1970) 3. मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएँ (1979) 4. उमरावनगर में कुछ दिन (1986) 5. कुछ ज़मीन में कुछ हवा में (1990) 6. आओ बैठ लें कुछ देरे (1995) 7. अगली शताब्दी का शहर (1996) 8. जहालत के पचास साल (2003) 9. खबरों की जुगाली (2005) आलोचना 1. अज्ञेय:कुछ रंग और कुछ राग (1999) विनिबंध 1. भगवतीचरण वर्मा (1989) 2. अमृतलाल नागर (1994) उपन्यास: सूनी घाटी का सूरज (1957)· अज्ञातवास · रागदरबारी · आदमी का ज़हर · सीमाएँ टूटती हैं मकान · पहला पड़ाव · विश्रामपुर का सन्त · अंगद का पाँव · यहाँ से वहाँ · उमरावनगर में कुछ दिन कहानी संग्रह: यह घर मेरा नहीं है · सुरक्षा तथा अन्य कहानियां · इस उम्र में व्यंग्य संग्रह: अंगद का पांव · यहां से वहां · मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनायें · उमरावनगर में कुछ दिन · कुछ जमीन पर कुछ हवा में · आओ बैठ लें कुछ देर आलोचना: अज्ञेय: कुछ राग और कुछ रंग विनिबन्ध: भगवती चरण वर्मा · अमृतलाल नागर बाल साहित्य: बढबर सिंह और उसके साथी
निधन ज्ञानपीठ पुरस्कार और पद्म भूषण से सम्मानित तथा 'राग दरबारी' जैसा कालजयी व्यंग्य उपन्यास लिखने वाले मशहूर व्यंग्यकार श्रीलाल शुक्ल को 16 अक्टूबर को पार्किंसन बीमारी के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 28 अक्टूबर 2011 को शुक्रवार सुबह 11.30 बजे सहारा अस्पताल में श्रीलाल शुक्ल का निधन हो गया।
श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास में कई विषयों को छुया गया है। सोशलिज्म की यलगार माँगती सोच, कभी न जाने वाली जाति से उगता उत्पीड़न, एक विभाजित समाज में विवाह की जटिलता, सच्ची मित्रता की कटाक्ष करती जिह्वा -- इन सभी पर इस लघु उपन्यास ने प्रकाश डाला है।
अज्ञातवास को अंग्रेजी में क्या कह कर समझाएं। शायद यह अंग्रेजी का शब्द ओब्लिविओन है। शायद यह अंडरग्राउंड होने की बात करता है। यहाँ, इस उपन्यास में, मुख्य पात्र रजनीकांत का अज्ञातवास है उनकी आत्मीयता का वो सच, जो उन्ही से दूर बैठा कहीं छुप गया है। उस धुरी की बिना जो भी व्यवहार में उजागर होता है वो एक रूप मात्र है। रजनीकांत बड़े अफ्सर हैं, सालों से विदुर हैं, एक बेटी के जिम्मेदार पिता हैं, मित्रो के मित्र हैं, परिश्रम के आदि हैं -- इत्यादि। पर क्या इन्ही सब से उनकी व्याख्या हो सकती है? क्या हम इससे इतना भी अनुमान लगा सकते है की यह आदमी काबिल-इ-तारीफ है या दण्डनीय । वो अतीत की पर्चियाँ ही तो हैं जो हमें जवाब दे सकती है, जो हमें बता सकती है की किस समाज से किस समाज तक की दौड़ लगाई रजनीकांत ने, क्या साथ लिए और क्या छूट गया। पर अतीत के घुरमुटों में तो हमारा सच अज्ञातवास पाता है, अतीत में ही तो वो है जिसकी हमारे वर्तमान को समझ नहीं, न ही समझने का माद्दा है।
श्रीलाल शुक्ल अपने चरम पर हैं जब वो चार दोस्तों की व्हिस्की से खनकती शाम का व्याख्यान करते हैं। तब भी जब वो वर्जिनिया वूल्फ की तरह अपने पात्रों की मानसिक उथल-पुथल को स्पष्ट करते हैं। उपन्यास जब तक इन्ही हल्की अटखेलियों से खेलता है, तब तक रचना के उत्कृष्ट पड़ाव पर रहता है। धीरे-धीरे, एक मॉडर्निस्ट इंटरनेशनल उपन्यास से यह कृति एक भारतीय उपन्यास बनने की डगर पर चलती है। समाज घुसता है, जाति घुसती है, शहर और गाँव के बीच का अलगाव घुसता है। कुछ देर लगता है की ये उपन्यास भी सोशल रेअलिस्म की भेंट चढ़ जायेगा। पर लेखक इसे भाच लेते हैं। क्यूंकि वो डरते नहीं। क्यूंकि वो उस बलात्कार के दृश्य से भी नहीं घबराते जो एक समाज दुसरे पर करता है, जो दाम्पत्य में एक हिस्सा दुसरे पर कर सकता है। हाँ, ये सच्चियां अतीत के साथ ओझिल हो जाती हैं, पर अतीत अज्ञातवासी ही हो, तब भी क्या वो झकझोरता नहीं?
बात अधूरी सी लगी । क्या यह पश्चाताप के कारण जग को खुले मन से आत्मसात् करने की भावना के प्रादुर्भाव की कहानी थी या मात्र एक बाहर से पर्फ़ेक्ट दिखने वाले चरित्र की असली कमियों का चित्रण । आशय क्या था यह धुँध में छिपा ही रहा ।
“वैसे ही, मिस्टर रजनीकान्त, बसों के मुकाबले तुम भी रिक्शे का तिरस्कार मत करो। देखो कि रिक्शेवालों की हालत क्या है। यह एक सोशियलॉजिकल प्रॉब्लम है। और सच बात तो यह है कि एक पालतू वेश्या रख लेने से सिर्फ़ उसी का उद्धार न होगा, तुम्हारा भी भला होगा। उसके सम्बन्ध इतने साफ़ होते हैं कि उनसे तुम्हारी पत्नी की स्मृति पर भी कोई आघात नहीं पहुँचेगा। मौलिक पत्नियों की दुश्मन होती हैं मित्रों की पत्नियाँ, सोसायटी गर्ल्स, ये सब; वेश्याएँ नहीं। वह तो तुम्हारे जीवन में आकर भी वेश्या ही रहेगी, पर यह बात किसी दूसरे की पत्नी में, किसी क्लब-मेट में, स्कूल-मिस्ट्रेस, नर्स, डॉक्टर वगैरह किसी में भी नहीं मिलेगी। उनमें से कोई भी तुम्हारे जीवन में आ गई तो वह तुम्हारी भावुकता से खेलेगी, तुम्हारे मन को चारों ओर से छा लेगी और साथ ही साथ यह स्मतिवाली पोटली, जिसे तुम बहुत सँभालकर रखे हो, धीरे से उठाकर चल देगी और सड़क के किनारे किसी डस्टबिन में फेंक देंगी। तुम बुरा मान रहे हो पर मेरी बात बिल्कुल सच है, वेश्या से बढ़कर पुरानी स्मृतियों को सचेत रखनेवाली कोई मशीन अभी तक ईजाद ही नहीं हुई। जल्दी करो मिस्टर रजनीकान्त, ड्राइवर से बोलो, कार स्टार्ट करे, टाइम बहुत कम है, ज़िंदगी सिर्फ़ दो दिन की है!…”
A short, easy to read book...good characterisation. Author unfolds the story in such a way that interest is sustained throughout the book. Each one of us has to bear is own cross and no matter how long we stay in Oblivion (Agyatwaas) sooner or later we come to face with reality.
लेखक का यह उपन्यास सही मायने में उनकी सबसे चर्चित रचना "राग दरबारी" से भी पांच वर्ष पहले अस्तित्व में आया था। प्रस्तावना में लेखक के शब्दों में "‘अज्ञातवास’ 1956-60 में लिखा गया था। यदि 1961 में श्री स. ही. वात्स्यायन की मुझे सहज कृपा न मिली होती और राजपाल एण्ड सन्ज़ एक अपेक्षाकृत नये लेखक के लिए कुछ ख़तरा उठाने को तैयार न हुए होते, तो शायद इसका उस वर्ष भी छपना मुश्किल होता।" शायद यही कारण है कि जितनी चर्चा "राग दरबारी" या "बिश्रामपुर का संत" की होती है, उतनी इस उपन्यास की नहीं देखी गई है। पढ़ने के बाद यह एहसास हुआ कि यह लघु उपन्यास अपने आप में एक श्रेष्ठ रचना है। बात करते हैं इस उपन्यास के पात्रों और कहानी की।
कहानी में मुख्यतः दो ही केंद्रीय पात्र हैं :- सिंचाई विभाग के इंजिनियर साहब रजनीकान्त उर्फ आर. जे. साहब और उनकी २२ वर्षीया पुत्री आभा। रजनीकांत साहब के पास सभी अमीरों वाले शौक हैं, बढ़िया गाड़ी चलाना, दोस्तों के साथ महफ़िल सजाना, कलाप्रेम दिखाने हेतु महंगी पेंटिंग्स खरीदना या फिर बढ़िया व्हिस्की का सेवन। बस एक अजीब सा पुराना शौक है "ग्राम गीत" सुनने का। कहानी इन्हीं गीतों के संदर्भ में शुरू होती है। आभा, बिन माँ के पली बढ़ी सुसंस्कृत, कुलीन कन्या है। पढ़ाई पूरी करने के बाद पिता के साथ रहने आयी है। पिता से अथक प्रेम भी करती है। दिवंगत माँ की स्मृतियाँ उसके मस्तिष्क में लगभग ना के बराबर हैं।
कहानी शुरु और खत्म सिंचाई विभाग के एक डाक बंगले में रात भर में होती है। गाँव का परिदृश्य, लहलहाते खेत, पशु पक्षी, नदी नहर और इन सबके बीच पछुआ हवा। अद्भुत है गाँव की पूरी फिज़ा, चारों तरफ़ शांति और इन सबसे हृदय में एक अलग तरह का सुकून मिलता है। शाम का आगाज़ होता है , इंजिनियर साहब अर्थात् रजनीकांत बाबू अपने चार दोस्तों के साथ व्हिस्की के पेग लगाने शुरू कर देते हैं। दोस्त आपस में एक दूसरे की खूब टांग खिचाई करते हैं। इनमें से एक तथाकथित फिलोसोफर मित्र (विनायक) तो रजनीकांत और अन्य दोस्तों पर खुल कर कटाक्ष भी करते हैं। दूसरी तरफ़ गाँव के देहातियों का एक दल आया हुआ है ग्राम गीत गाने के लिए, बिरहा के राग छेड़े जा रहे हैं । सबके बीच में रहते हुए भी रजनीकन्त की बेटी आभा खुद को खोया खोया सा महसूस करती है। इसी बीच एक ग़रीब किसान का पढ़ा लिखा लड़का वहाँ मौजूद ओवरसीयर को उसकी धूर्तता के लिए खूब खर��� खोटी भी सुनाता है । आभा ये सब बस देखती रह जाती है। उसे अहसास होता है कि जाति व्यवस्था से पैदा होने वाला उत्पीड़न आज भी ग्रामीण क्षेत्रों का अभिशाप बना हुआ है। जिस समाजवाद और साम्यवाद की बातें कॉलेज और विद्वानों के बीच होती है, सब बेईमानी है। एक के ब���द एक ऐसी घटनाएं होती हैं जिस से सभी पात्रों की मानसिक स्थति का अँदाज़ा उनके हाव, भाव, विचार आदि से होता है। इन्हीं बातों में रजनीकान्त की दिवंगत पत्नी, रानी का ज़िक्र भी आता है। रानी कई वर्ष पहले गुजर चुकी है, पर रजनीकान्त आज भी उसकी मृत्यु के पश्चाताप में जल रहे हैं। इसका सही कारण सिर्फ़ उनको ही पता है। वो किसी के भी साथ इस राज़ को साझा नहीं करते हैं ।
समाज में विवाह जैसी प्रथा की क्या स्वीकृति है ? ऐसा कौन सा भेद है जो रजनीकान्त को सहज नहीं होने देता है ? क्या अपने अतीत को लेकर जो असमंजस बना हुआ है वो अपनी बेटी आभा तक उसे पहुंचने देंगे ? क्या आभा अपनी मां के जीवन का सच जान पायेगी, क्या पिता के प्रति उसका प्रेम ज्यों का त्यो बना रहता है ? इन सवालों के जवाब ढूंढ़ते हुए आप उपन्यास के अंत में पहुंच जाते हैं ।
उपन्यास की भाषा अति विशुद्ध और सुंदर है। कई स्थानों पर पात्रों के बीच के संवाद बहुत ही रोचक हैं। गांव और शहर के बीच का अंतर दिखाने में लेखक पूर्णतया सफल रहे हैं। वाक्यों की बनावट और ग्राम्य जीवन का सुंदर चित्रण आपको मंत्रमुग्ध करता है। सही मायने में रजनीकांत का अज्ञातवास है उनके माजी का वो कठोर सच जिसने उनको जीवन भर विधुर रहने के लिए विवश किया। जो हिस्से मुझे पसंद आये, उन्हें नीचे उद्धृत कर रहा हूं :-
"मुझे ग्राम-गीत बहुत अच्छे लगते हैं, क्योंकि मेरी जीभ पर अब भी आषाढ़ के जामुनों का रस है और दाँतों के नीचे मक्के के भुट्टे का कच्चापन है और मेरे मन में सुनहरे धान लहलहाते रहे हैं…"
"सभी अपनी आदतों के, संस्कारों के गुलाम हैं। उन्हीं के सहारे लोग जो कुछ बार-बार करते हैं, उसी को अपना सिद्धान्त बना देते हैं।"
"ओ निर्वासित वनवासियो, अपनी अज्ञात तमोमयी गुफ़ाओं से लौट आओ। अपना विक्षोभ छोड़ो। यह पुराना घर एक नवीन तेजस्विता में तुम्हारा आह्वान करता है। आओ, अपने को एक-दूसरे में समाविष्ट करो। मेरी जागृति की आलोक-धारा में एक साथ प्रस्फुटित होकर निर्बाध बहो। अपनी अपूर्णता को खोकर मुझे सम्पूर्णता से सम्पृक्त करो।"
A quick read about a man's rise in the society and a parallel downfall in morality. This book starts off when a high ranking government official looks at a painting which suddenly awakes in him the past which he has lived - a past where he rose from being a regular landlord's son, married off to a woman from his village, moved to the city for education and then a government job, started having affairs, started hating his wife whom he starts considering uncivilized... Started living a life to show that he's living a life rather than actually living it.
Through a series of conversations and reminiscent monologues, Shrilal Shukla sheds light on the philosophy of life, morals, relationships, poverty and powerplays of rich people over the poor. The book also talks about the protagonist's daughter but doesn't delve into her psyche as much as I would have liked.