हलाला यानी तलाक़शुदा औरत किसी दूसरे मर्द से निकाह करे और फिर उससे तलाक़, या उसकी मौत के बाद ही वह पहले शौहर के लिए हलाल होती है, इसी का नाम हलाला है। सल्लाहे वलाहेअस्सलम ने क़ुरान के किस पारे (अध्याय) और सूरा (खण्ड) की किस आयत में कहा है कि पहले शौहर के पास वापस लौटने के लिए दूसरे शौहर से निकाह के बाद उससे ‘हम बिस्तर’ होना ज़रूरी है। दरअसल, हलाला धर्म की आड़ में बनाया गया एक ऐसा कानून है, जिसने स्त्री को भोग्या बनाने का काम किया है। सच तो यह है कि हलाला मर्द को तथाकथित सज़ा देने के नाम पर गढ़ा गया ऐसा पुरुषवादी षड्यन्त्र है जिसका ख़मियाजा अन्ततः औरत को ही भुगतना पड़ता है। सज़ा भी ऐसी जिसे आदिम बर्बरता के अलावा कुछ नहीं कहा जा सकता। अपने पहले शौहर द्वारा तलाक़ दे दी गयी नज़राना का उसके पड़ोसी व दूसरे मर्द डमरू यानी कलसंडा से हुए तथाकथित निकाह और इस निकाह के बाद फिर से, तलाक़ देने की कोशिश के बावजूद नज़राना को क्या उसका पहला शौहर नियाज़ और उसका परिवार उसे अपनाने के लिए तैयार हो जाएगा? हलाला बज़रिए नज़राना सीधे-सीधे पुरुषवादी धार्मिक सत्ता और एक पारिवारिक-सामाजिक समस्या को धार्मिकता का आवरण ओढ़ा, स्त्री के दैहिक-शोषण के खि़लाफ़ बिगुल बजाने और स्त्री-शुचिता को बचाये रखने की कोशिश का आख्यान है। अपने गहरे कथात्मक अन्वेषण, लोकविमर्श और अछूते विषय को केन्द्र में रख कर रचे गये इस उपन्यास के माध्यम से भगवानदास मोरवाल एक बार फिर उस अवधारणा को तोड़ने में सफल हुए हैं कि आज़ादी के बाद मुस्लिम परिवेश को केन्द्र में रखकर उपन्यास नहीं लिखे जा रहे हैं। नियाज़, डमरू और नज़राना के माध्यम से स्त्री-पुरुष के आदिम सम्बन्धों, लोक के गाढ़े रंग और क़िस्सागोई से पगा यह उपन्यास उस हिन्दुस्तानी गन्ध से लबरेज़ है, जो इधर हिन्दी उपन्यास से तेज़ी से गायब होता जा रहा है।
हलाला एक ऐसा विषय है जिसके बारे में कोई बात नहीं करना चाहता। बात ना करने से सच्चाई छुपाई नहीं जा सकती| मुझे खुशी है कि लेखक ने इस विषय पर पुस्तक लिखी। यह एक काल्पनिक किताब है, लेकिन इससे आपको अंदाजा हो जाएगा कि हमारी मुस्लिम औरतें कैसे कैसे गुज़रती है|
मुझे इस पुस्तक को समझने के लिए मेवाती हिंदी भाषा को समझने के लिए 10 या 20 पृष्ठों का समय लगा, फिर मुझे भाषा से आराम से समझ आने लग गया। इस पुस्तक में गाली गलौच है, लेकिन मेवात की यही भाषा है| लेखक मेवात से भी हैं, इसलिए उन्हें बेहतर समझ है।
लेखक भगवानदास मोरवाल ने उपन्यास हलाला के माध्यम से धर्म की आड़ में महिलाओं के शोषण पर प्रकाश डाला है। हलाला वह प्रथा है जिसमें एक तलाकशुदा महिला अपने पहले पति के पास वापस जा सकती है जब उसकी शादी किसी दूसरे पुरुष से हो जाती है, और वह पुरुष बिस्तर पर होने के बाद उसे तलाक दे देता है। वैसे हलाला पुरुषों को दंडित करने के नाम पर बना शरिया कानून है, लेकिन इसने महिला को आनंद लेने के लिए एक वस्तु बना दिया है।
मैं हमेशा सभी भारतीय महिलाओं और पुरुषों के लिए समान अधिकारों का विश्वास करता आया हूँ। मुझे उम्मीद है कि भारत सरकार सही न्याय पाने के लिए समान नागरिक संहिता लाएगी।
As the title says, this book deals with a bold and very important issue in Muslim community.
It's a short read that says how it can demoralize and insult a woman and a man as well. The characters are realistic. And even though this subject talks about the hapless situation of women, women in this story are not weak, and this is the strength of this book.
My only (and big) problem with this book is its dialogues that is full of abuses and the uses the dialect throughout. I understand that dialect makes the characters more authentic but writing dialogues in regional language is too much. Every reader is not from that particular region. It really disturbed my reading experience.
कहानी शुरू होती है डमरू से, जो एक कुंवारा रह गया किरदार है जिसकी अब शादी की उम्र भी निकल चुकी है । वह और समाज के बाकी लोग उसकी शादी न होने का कसूर उसके रंग-रूप पे डालते है। उसके कमरे में एक टुटा, धुंधला पड़ गया आईना रहता है, जिसमे में वह अपना अक्स घूरता रहता है, अपने चेहरे के हर एक-एक कोने पर नज़र गाड़ते हुए किसी सोच में डूबा रहता है। लोग उसे कलसंडा (काली सांड) कह पुकारते है, जिसे सुनने पर डमरू के मानो किसी ने कांटे ठोक दिए।
उसकी सबसे छोटी भावज, आमना तो डमरू को सताते नहीं थकती और उसकी ज़बान कभी काबू में नहीं रहती जिसके वजह से वह कई परेशानिओ का कारन बन जाती है। वह सिंगार की बेटी है और कहते है सिंगरवाली जिस घर में जाए, वहाँ लड़ाई करवाके ही मानती है। आमना को यह भी लगता है की डमरू कि उसपे बुरी नज़र है पर फिर भी वह डमरू का विवाह नहीं होने देना चाहती क्यूंकि डमरू की लुगाई के आ जाने पर, सम्पति का और एक हिस्सा कर दिया जाएगा।
डमरू की सबसे बड़ी भावज, नसीबन ने डमरू को अपने बेटे से बढ़कर पाला है। डमरू भी कभी उनका कहना नहीं टालता और नसीबन को अपने डमरू के शिष्टाचारों पर और उसकी नेकनीयती पर बहुत गर्व है। नसीबन के कहने पर ही डमरू ने नजराना से निक़ाह करलिआ ताकि नजराना अपने पहले पत्ति के लिए हलाल हो जाए और वापिस उसके घर जा सके।
"हलाला का मतलब है एक तलाक़शुदा औरत किसी दूसरे मर्द से निकाह करे, और फिर उससे या तो तलाक़ ले या उसके उस शौहर की मौत हो जाए, तभी वह पहले शौहर के लिए हलाल होती है – इसी का नाम हलाला है।"
पर तलाक़ लेते वक्त हर बार एक नई शर्त का उन्हें पता चलता है जो हदीस और शरीअत के मुताबित हलाला करने के सही तौर तरीको में लिखी गयी है, जिसके वजय से कई बार उनका तलाक होने से रुक जाता है। इन सबके बिच जिस औरत को हलाल होना पड़ता है वह कही की नहीं रहती, न अपने पीहर की, न अपने पुराने शौहर के घर की न अपने नए शौहर के घर की, उसके पास किसी प्रकार का कोई उपाय नहीं रह जाता है।
यह सज़ा जो तलाक़ देने वाले शौहर के लिए बनाई गयी है, उसमे उनकी बीवियों को भी सज़ा काटनी पड़ती है और अक्सर शौहर से कई अधिक, क्यूँकि संस्था के मुताबित पहली बात तो ये की मर्द का पद स्त्री से ऊँचा माना गया है और दूसरी ये की गलती स्त्री की ही मानी जाती है अधिकतर विवादों में।
मेवात की कठोर भासण शैली में बहुत खूबसूरती से लिखी गयी यह कथा हलाला से जुड़े हर एक पहलु को पुष्प के पत्तो की तरह एक-एक कर बहुत लालित्य से खोलती है। हलाला से जुड़े, चाहे प्रत्यक्ष रूप से या परोक्ष रूप से, हर उस व्यक्ति कि स्तिथि का स्पष्टतः वर्णन किया गया है जिससे उसके मानसिक स्तिथि का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। साथ ही साथ कई सुनदर चित्रों के संग उचित क़ुरआन के उद्धरण भी दिये गए है।
कमाल की कहानी इस तरह से लिखी गई है जो मुस्लिम परिवार का प्रतिनिधित्व करती है। यह मूल रूप से उनकी जीवन शैली की दिनचर्या को दर्शाता है। लेखक ने मुस्लिम महिला पर हलाला के प्रभाव को दिखाया है।