महुआचरित काशीनाथ सिंह का एक लघु उपन्यास है, जो लघु तो है परंतु अपने अंदर बहुत गहरी संवेदना लिए हुए है।
कहानी की नायिका 'महुआ' के माध्यम से काशीनाथ जी ने मनुष्य को जरूरतों को पाठकों के समक्ष हु-ब-हु प्रस्तुत किया है। अपनी अस्मिता की खोज में भटकता हुआ इंसान तथा शारीरिक सुख को केंद्र में रखकर ये उपन्यास लिखा गया है, जहां मनुष्य अपनी अस्मिता की खोज में किस तरह बेचैन है तथा भौतिक सुखों के साथ शारीरिक सुखों की क्या अहमियत है, को दर्शाया है।
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काशी का अस्सी की तरह ही यह उपन्यास भी अपने में एक नयापन और अनुठापन लिए हुए है, जो इस उपन्यास को और भी रोचक बना देता है। नए दौर की किताब लिखते वक्त काशीनाथ जी ने नया अंदाज़ ही अपनाया है। जैसे: महुआ की सहेली उसके मकान की छत को दिखाया गया है, जहां वह खुलती है, खेलती है, और खिलती है। यह कल्पना ही अपने आप में अनूठी और व्यंजन है।
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