वरिष्ठ कथाकार काशीनाथ सिंह का उपन्यास ‘महुआचरित’ जीवन के अपार अरण्य में भटकती इच्छाओं का आख्यान है। मध्यवर्गीय समाज की सच्चाइयों को लेखक ने विशिष्ट कथा-रस के साथ प्रकट किया है। यह उपन्यास जिस शिल्प में अभिव्यक्त हुआ है वह क में एक नया प्रस्थान निर्मित करता है। छोटे-बड़े किंचित् असमाप्त अपूर्ण वाक्य संकेतों की ओर उन्मुख विवरण और बहुअर्थी बिम्ब इस रचना को महत्त्वपूर्ण बनाते हैं। महुआ की सहेली है उसके मन की छत जहाँ वह खुलती, खिलती और खेलती है। यह कल्पना ही अपने आपमें अनूठी और व्यंजक है। कहना न होगा कि ‘महुआचरित’ को ‘वृत्तान्त का अन्त’ करती कथा-रचना के रूप में रेखांकित किया जा सकता है। अस्सी साल के स्वतन्त्रता सेनानी पिता की पुत्री महुआ की देहासक्ति से विवाह तक की यात्रा और फिर उस
Nice book on inner conflict created by societal norms
It's hard to understand connection between consciousness and body. Societal norms prevale over individual feelings. Great story by Kashinath. Must read
Kashinath singh ji has encashed his name by writing Mahuacharit. It lacks story and when story is not there all the excellence of a master wordsmith, can not save it.
बदलते सामाजिक मूल्यों और रिश्तों का प्रतिबिम्ब - जो इस सत्य को नकार रहें है या इससे अनभिज्ञ हैं वे पिछली सदी में जी रहे हैं और जल्द ही उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकने वाली है
काशीनाथ सिंह अपने काल से आगे के साहित्यिकार हैं। यह रचना स्त्री और पुरुष दोनों के मन के द्वंद का प्रतिम्बिब है। हिंदी साहित्य ऐसी रचनाओं से समृद्ध होती है।
इस उपन्यास में लेखक ने नायिका के मन में चल रहे अन्तर्द्वन्द्व का बख़ूबी चित्रण किया है मानव मन में उठते विभिन्न विचारों को भी काफ़ी अच्छी तरह दर्शाया गया है और पुरूषों के दोहरे मापदंडों पर भी काफ़ी कुशलतापूर्वक कटाक्ष किया गया है
Love and envy are presented in trademark simplicity and trademark satire. Kashinath Singh's books are known for the simplicity of storytelling while capturing the mood brilliantly. And this short story is no exception. Under 30 minutes read, go for it.
महुआचरित काशीनाथ सिंह का एक लघु उपन्यास है, जो लघु तो है परंतु अपने अंदर बहुत गहरी संवेदना लिए हुए है। कहानी की नायिका 'महुआ' के माध्यम से काशीनाथ जी ने मनुष्य को जरूरतों को पाठकों के समक्ष हु-ब-हु प्रस्तुत किया है। अपनी अस्मिता की खोज में भटकता हुआ इंसान तथा शारीरिक सुख को केंद्र में रखकर ये उपन्यास लिखा गया है, जहां मनुष्य अपनी अस्मिता की खोज में किस तरह बेचैन है तथा भौतिक सुखों के साथ शारीरिक सुखों की क्या अहमियत है, को दर्शाया है। . काशी का अस्सी की तरह ही यह उपन्यास भी अपने में एक नयापन और अनुठापन लिए हुए है, जो इस उपन्यास को और भी रोचक बना देता है। नए दौर की किताब लिखते वक्त काशीनाथ जी ने नया अंदाज़ ही अपनाया है। जैसे: महुआ की सहेली उसके मकान की छत को दिखाया गया है, जहां वह खुलती है, खेलती है, और खिलती है। यह कल्पना ही अपने आप में अनूठी और व्यंजन है।