परसाई जैसा बड़ा रचनाकार जब ‘हम इक उस से वाकिफ हैं’ होने की बात करता है तो उसका मतलब सिर्फ उतना ही नहीं होता, क्योंकि उसकी ‘उम्र’ एक युग का पर्याय बन चुकी होती है। इसलिए यह कृति परसाई जी के जीवनालेख के साथ-साथ एक लम्बे रचनात्मक दौर का भी अंकन है। परसाई जी ने इस पुस्तक में अपने जीवन की उन विभिन्न स्थितियों और घटनाओं का वर्णन किया है, जिनमें न केवल उनके रचनाकार व्यक्तित्व का निर्माण हुआ, बल्कि उनकी लेखनी को भी एक नई धार मिल सकी। उनका समूचा जीवन एक सक्रिय बुद्धिजीवी का जीवन रहा। वे सदा सिद्धान्त को कर्म से जोडक़र चले और अपनी रचनात्मकता पर काल्पनिक यथार्थवाद की छाया तक नहीं पडऩे दी। इसलिए आकस्मिक नहीं कि इस पुस्तक में हम उन्हें विभिन्न आन्दोलनरत संगठनों के कुशल संगठनकर्ता के रूप में भी देख पाते हैं। इसके अलावा यह कृति उनकी सहज व्यंग्यप्रधान शैली में विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों से भी परिचित कराती है, जो किसी भी तरह उनसे जुड़े। कहना न होगा कि परसाई जी का यह संस्मरणात्मक आत्मकथ्य उन तमाम पाठकों और रचनाकारों के लिए प्रेरणाप्रद है जो कि एक बुनियादी सामाजिक बदलाव में साहित्यकार की भी एक रचनात्मक भूमिका को स्वीकार करते हैं ।
Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) was one of the greatest hindi satire writer. Despite holding a MA degree in English, he never wrote in this language. Started his career as a teacher, he later quit it to become a full time writer and started a literature magazine "Vasudha"(it was later closed because of financial difficulties).
He was famous for his blunt and pinching style of writing which included allegorical as well as realist approach. He was funny enough to make you laugh but serious enough to prick your conscience. There would be hardly any dimension of life left which has not appeared in his satires. He received Sahitya Academy Award(biggest literature award in India) for his book "Viklaang Sraddha ka Daur". He has penned down some novels also.
परसाई जी के जीवन के बहुत से रोचक किस्से कहानियाँ जिनपर कभी कभी विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि ऐसे व्यक्तित्व के लोग रहे होंगे असल में और इन सब के बीच से गुज़रते हुए परसाई जी। उनकी समझ समाज और राजनीति के बारे में, उनके खुद के निजी जीवन की कुछ घटनाएँ जिनका उनपर..उनकी सोच पर असर पड़ा जो खुद भी हमें सोचने पर बहुत मजबूर कर देती हैं। इक उम्र से..एक दौर से..उस समय के समाज के भीतर घुमड़ती तरह तरह की समस्याओं और इस बीच लोगों के जीवन से करीब से वाकिफ़ होने का मौका है यह किताब।
बहुत ही बढ़िया इंसान थे परसाई जी। आज ज़िंदा होते तो व्यंग्य लिखने का इतना मौक़ा पाकर और ख़ुश हो जाते। आज के दौर में फ़ासिज्म की ऊँचाइयाँ देखकर उनकी लेखनी भी बहुत ऊँचा व्यंग्य कसती।
परसाई जी द्वारा लिखा ये संस्मरण इनकी अन्य रचनाओं की तरह ही रोचक है। जो भी घटित हुआ उसको जैसे को तैसे लिखा। ना ही अपने संघर्षो से सांत्वना प्राप्त करने की कोशिश की, ना ही अपनी उपलब्धियों का महिमामंडन किया, ना ही अपनी चीजों को छिपाकर आदर्श लेखक बनने का ढोंग किया। यही चीजें परसाई जी को व्यंग रचनकारों मे अग्रणी का स्थान देती है। अपने लेखन को धंधा बोलने मे बिल्कुल नही सकूँचाए, क्योंकि यही उनकी आय का स्रोत रहा। संस्मरण भी इसलिए लिखा क्योंकि प्रकाशक से उसके पैसे मिले, ना ही की कोई ज्ञान का दर्शन कराना था। परसाई जी कहते हैं सबके सिखने के रास्ते अलग होते हैं। किसी के लिए भोजन दूसरे का जहर होता है। उन्हें जो लिखना था लिख दिया, लेकिन उसे कतई आँख मूँद के पालन करने को नही कहा। आगे कहते हैं कि कठोर लिखने के कारण वो पिटे फिर भी लिखते रहे। इससे प्रेरित होकर कोई अपनी जिंदगी बर्बाद करे तो उन्हें कोई एतराज नही। ऐसा पारदर्शी लेखन अपने आप मे रोमांच से भरा होता है, ऊपर से परसाई जी का लेखन चार चाँद लगा जाता है।
पुस्तक - हम एक उम्र से वाकिफ हैं लेखक - हरिशंकर परसाई प्रथम संस्करण - १९८९
हम एक उम्र से वाकिफ हैं परसाई जी की आत्मकथा संस्मरण है जिसमें लेखक ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण विषयों, परिवार, समाज, लेखन, राजनीति,व्यक्तियों, स्थान का संस्मरण पंद्रह अलग अलग अध्यायों में लिखा हैं। फैज़ अहमद फैज़ के शेर - हम एक उम्र से वाकिफ हैं अब न समझाओ के लुत्फ क्या हैं मेरे मेहरबाँ सितम क्या हैं । परसाई जी ने शेर के आरंभ को संस्मरण का शीर्षक बना दिया । यह संस्मरण परसाई जी के जीवन संघर्ष का अनुभव कड़वापन, अपमान, उत्पीड़न, अन्याय और यातना की स्मृति हैं। लेखक स्वयं को भारतीय क्लासिक का अध्येता कहते हैं और स्वीकार करते हैं कि उन्होंने अपनी रचनाओं में तुलसीदास, कबीरदास, कुम्भनदास, रहीम आदि के खूब उद्धरण पेश किए हैं। रामचरित मानस और सुंदरकांड उन्हें बचपन से ही काफी पसंद थी। लेखक ने मौत को काफी करीब से अनुभव किया हैं उनके अनुसार वो दो बार डूबने से बचे हैं और दो बार रेल से कटने से भी बाल बाल बचें हैं। ज्योतिषियों के अनुसार लेखक पुलिस इंस्पेक्टर बनेगा क्योंकि यह उस वक्त का सबसे रसूख वाली नौकरी मानी जाती थी। लेखक अपने विद्यालय के कड़वे अनुभव को साझा करते हैं और भारतीय शिक्षा पद्धति और शिक्षक प्रताड़न नीति का उल्लेख करते हैं। अपने पसंदीदा अध्यापक के विषय में परसाई जी लिखते हैं मैं खुद अध्यापक रहा हूं सैकड़ों अध्यापक देखें हैं पर केशवचंद्र बग्गा सरीखा कोई नहीं । दस फार एंड नो फर्दर परसाई जी अपने बुआ की पुत्री के विवाह के माध्यम से वर्तमान समय में व्याप्त दहेज प्रथा की तीखी आलोचना करते हैं। धर्म, मजहब, पुनरुत्थानवादी सोच और कट्टर सांप्रदायिक संगठनों पर तंज करते हुए कहते है इनकी सोच जातियों को जड़ बनाती हैं जवाहर लाल नेहरू ने ठीक कहा है religion gives static view of things. लेखक ने अपने रोजगार, अध्यापन और शिक्षा संघ के अध्यक्ष पद से संबंधित संघर्ष को बड़ी चेतनापूर्ण शब्दों में लिखा हैं । परसाई जी मंच कला में पूर्णतः निपूर्ण थे उन्होंने कई साहित्यिक सभाओं का संचालन और अध्यक्षता किया मंच से उद्दंड भीड़ को कैसे काबू करना है उन्हें अच्छे तरह मालूम था। परसाई जी स्वयं को समाजवादी आंदोलनकारी पहले और लेखक बाद में मानते हैं। परसाई के व्यंग लेखक बनने में प्रहरी नामक पत्रिका का बहुत बड़ा हिस्सा रहा हैं। परसाई जी ने प्रहरी और वसुधा मासिक पत्रिका का संपादन भी किया। तब जबलपुर के कुछ व्यक्तित्व नाम के अध्याय में परसाई जी ने अपने समय के कुछ खास राजनीतिक, सामाजिक, संपादक, अध्यापक, लेखक और मित्रों का लघु परिचय और उनसे जुड़े रोचक किस्से दिये हैं इन व्यक्तियों से परसाईं जी का खास लगाव और प्रेम हैं। परसाई जी ने एक अध्याय में अपनी प्रथम पुस्तक "हंसते हैं रोते हैं" के विषय में लिखा हैं कि सिर्फ प्रथम संस्करण में प्रकाशित होने के कारण पुस्तक विश्वविद्यालय और शोध छात्रों के लिए दुर्लभ ग्रंथ हो गई। जिसकी कीमत डेढ़ रुपए से बढ़ कर पच्चीस से तीस रुपए हो गई। परसाई जी की मुक्तिबोध, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, उपेंद्रनाथ अश्क, डॉ राम विलास शर्मा,श्रीकांत वर्मा जैसे लेखकों से काफी घनिष्ठता थी। जैनेंद्र जी और फणीश्वर नाथ रेणु परसाई जी के आलोचनात्मक व्यंग के बड़े प्रशंसक थे। कुल जमा इस रचना में लेखक हरिशंकर परसाई ने अपने जीवनों के सभी प्रमुख संस्मरण को बताते हुए हिंदी साहित्य में उपस्थित गुटबंदी की खुले तौर पर आलोचना की है और भारतीय राजनीति के साम्यवाद, समाजवाद, गांधीवाद जैसे जटिल राजनीति रंगों को अच्छे से उभारा है स्वतन्त्रता के बाद के दौर का सटीक राजनीतिज्ञ निरूपण किया हैं साथ ही भारतीय शिक्षा पद्धति में अध्यापकों की यथा स्थिति और उनसे संबंधित आंदोलन को भी बेहतर तरीके से उकेरा हैं ।
Parsai Ji's writings shaped my young mind as a teenager. My tools for understanding the world were given by him. I might have outgrown that world view but have not outgrown my love for his writings. I had read part of this book long time back and had an image of him with me. This book brought me back to his world. Reading this book is watching his world through his eyes and realising that while satire was the prime expression of his deep rooted sensitivity to social ills, his social and political activities were as important a contribution to the world around him. From this book, I take away the message for standing for the right, being honest in expression and of living life as it comes.
परसाई जी के बारे मैं जितना भी कहा जाए उतना कम है । उनका लिखा हुआ आज भी सत्य है । बल्कि उनका लेखन यथार्थवादी ज्यादा और हास्य व्यंग कम है। यह उनकी आत्म जीवनी तो नही कहेंगे परंतु जो इंग्लिश मैं कहते है न memoir वह भी नहीं है।