बाबू देवकीनंदन खत्री के योगदान को समझने से पूर्व एक बार हिन्दी की विकासयात्रा पर भी नज़र डालना आवश्यक होगा।
जिस काल में बाबूजी ने चंद्रकांता की सर्जना की, वह वो काल था जब हिन्दी पूरी तरह हाशिये पर थी। सरकारी कामकाज की भाषा उर्दू/फारसी थी। पढ़े-लिखों की भाषा भी उर्दू/फारसी ही थी। आप जानते ही होंगे, प्रेमचन्द्र ने भी आरम्भिक दौर में उर्दू में ही लेखन किया था। पर वह तो बहुत बाद की बात है। हिन्दी, जिसे आज हम हिन्दी कहते हैं, केवल मेरठ और उसके आसपास के क्षेत्रों में बोले जानी वाली एक बोली थी- जिसे खड़ी बोली के नाम से जाना जाता था; अभी भी जाना जाता है। खुद को सुरुचिपूर्ण और सम्भ्रांत मानने वाला तबका हिन्दी से परहेज़ रखता था, आज भी रखता है, पर आज से तबकी स्थिति बहुत भिन्न थी। आज उत्तर-पट्टी का प्रत्येक