अपने परिचय भाषण में डॉ० पालीवाल ने भूजल के निरंतर घटते स्तर, भूजल प्रदूषण, घटती वर्षा आदि विभिन्न मुद्दों को छूते हुए इस बात पर जोर दिया कि हमें अपनी पारंपरिक जल संग्रहण व्यवस्था को पुनर्जीवित करना होगा। उन्होंने सभी मंचासीन गण्य मान विभूतियों का संक्षिप्त परिचय देते हुए, सम्मेलन के उद्देश्यों और संभावित उपलब्धियों के साथ-साथ सम्मेलन के विभिन्न सत्रों का परिचय देते हुए सभी का स्वागत किया। उनके उपरांत वक्ताओं ने जल संकट और उससे उत्पन्न और संभावित समस्याओं का आँकड़ों के साथ उल्लेख करते हुए संरक्षण के लिए अतिशय भूजल दोहन पर अंकुश लगाने, नदियों, जल स्रोतों को प्रदूषण मुक्त करने और जल को व्यापार की वस्तु न बनने देने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की माँग की।
“आप तो जानते ही हैं कि इस देश का सिस्टम किस कदर भ्रष्टाचार में डूबा है। पर्यावरण का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है।” –प्रो० कुछ देर को रुके, फिर सीधे उनकी ओर देखते हुए बोले–“ऐसी अव्यवस्थाओं की सप्रमाण पोल पट्टी खोलें।” “सर, ये हमारा काम नहीं। ये तो एक तरह का स्टिंग अभियान हुआ।” “लेकिन क्या सच को उजागर करना ही सही पत्रकारिता नहीं है?” “सर, पत्रकारिता में बहुत सी चीज़ें आती हैं। जैसे हर कोई हर काम नहीं करता वैसे ही हर पत्रकार हर प्रकार की पत्रकारिता नहीं करता। ये बिलकुल वैसा ही है जैसे एक विशेषज्ञ केवल अपने विषय में ही काम करता है।”
“प्रथम ग्रासे मक्षिका पातः!”–गोकुल शुक्ला बोला–“यह सोचकर जाओगे तो क्या कर पाओगे?” “सर आप मुझे रेत में पिन ढूँढ़ने को कह रहे हैं, जिसका यह भी पता नहीं कि वह है भी या नहीं। मैं अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ूँगा। लेकिन जो चीज़ होगी ही नहीं, वह कैसे खोजी जा सकती है?” “तुम्हें अगर विश्वास होगा कि वह चीज़ है, तभी तुम खोज पाओगे। अगर तुम सोचोगे कि चीज़ है ही नहीं, तो खोजोगे क्या?” “सर, वहाँ पर कुछ भी मिलना नामुमकिन है और आप चाहते हैं कि मैं निर्माण में हुये घोटाले का सबूत ढूँढू। अब जब निर्माण के अवशेष तक ही नहीं हैं, तो सबूत कहाँ होंगे? जब निर्माण ही नहीं, तो उसके घटिया होने को साबित कैसे करेंगे?” “हम नहीं साबित कर सकते, तो वे भी तो साबित नहीं कर सकते कि निर्माण घटिया नहीं था।”
“हूँ।”–अमन ने स्वीकृति में सिर हिलाया–“मगर ये भी कैसी विडम्बना है कि जो योजना बाढ़ से छुटकारा दिलाने के लिये लाई गई, वही बाढ़ की चपेट में आ गई!” “इसमें योजना की कोई कमी नहीं है।”–विजय ने कहा–“दरअसल, राजनीति और बाबूगिरी के चलते जो योजना चार वर्ष में पूरी होनी थी, वह पाँच वर्ष में भी पूरी न हो सकी। बिहार सरकार से पैसा ही बहुत बाद में जारी हुआ। लिहाजा निकास नहरों का केवल सर्वेक्षण का काम ही पूरा हो सका।” “लेकिन इसमें तो विश्व बैंक और ‘ग्लोबल एन्वायरमेंट फण्ड’ का पैसा लगना था न?” “जो पैसा विलायत से मिलता था, वो ही काम मुश्किल से पूरे हुये। योजना आयोग और बिहार सरकार की ओर से घपला ही रहा।”–विजय बोला–“इसलिये निकास नहरें समय से न बन सकीं। अगर वे बन जातीं, तो आज इस क्षेत्र का हुलिया ही कुछ और होता।”