तोलोलिंग की चोटी पर बीस दिन से भारतीय जवान शहीद हो रहे थे। आखिरी हमले की रात वे दुश्मन के बंकर के बेहद करीब पहुँच गए; लेकिन तभी गोलियों की बौछार हो गई। वे घायल थे; लेकिन वापसी उन्हें मंजूर नहीं थी। शरीर से बहते खून की परवाह किए बिना उन्होंने एक ग्रेनेड दागा और कारगिल में भारत को पहली जीत मिल गई।उसके सामने 100 चीनी सिपाही खड़े थे; गिनती की गोलियाँ बची थीं; लेकिन मातृभूमि का कर्ज चुकाते वक्त उसके हाथ नहीं काँपे और उसने युद्ध के मैदान को दुश्मन सिपाहियों का कब्रिस्तान बना दिया।ये भारतीय सेना की वे युद्ध गाथाएँ हैं; जो आप शायद आज तक नहीं जान पाए होंगे। रणभूमि में कान के पास से निकलती गोलियाँ जो सरसराहट पैदा करती हैं; वही कहानी इस किताब में है।बडगाम में मेजर सोमनाथ शर्मा की कंपनी ने कैसे