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Autobiography #2

हम नहीं चंगे…बुरा न कोय- आत्मकथा 'लेखकीय जीवन के सबसे हलचल वाले दिनों की कथा’

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लोकप्रिय साहित्य हिन्दी अकादमिक जगत के लिए मूल्यांकन की चीज़ कभी नहीं रहा, लेकिन हिन्दी के शिक्षित समाज का बड़ा तबका उसके ही असर में रहता आया है। हमें लोकप्रिय साहित्य का बाज़ार तो दिखता है, उसकी आन्तरिक दुनिया की बनावट नहीं दिखती। ऐसे में लोकप्रिय लेखन के एक बड़े नाम सुरेन्द्र मोहन पाठक आत्मकथा लिखकर बहस और मूल्यांकन की एक नई ज़मीन तैयार कर रहे हैं। उनका अपना जीवन है भी ऐसा जिसके बारे में दूसरों को दिलचस्पी हो! कान में सुनने की मशीन, आँखों पर मोटे लेंस का चश्मा लगाए, नौकरी करते हुए, तीन सौ से अधिक सफल उपन्यास लिखने वाले पाठक जी अपने ही रचे किसी अमर किरदार जैसे आकर्षक व्यक्तित्व वाले हैं। लेखन के तौर-तरीक़े और ख़ुद के लिए तय किया हुआ अनुशासन अचरजकारी! लाखों पाठकों की रुचि को समझना, उनकी अ

569 pages, Paperback

First published September 6, 2019

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129 people want to read

About the author

Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.

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4 (4%)
1 star
6 (6%)
Displaying 1 - 11 of 11 reviews
Profile Image for Sameer Mehra.
237 reviews2 followers
November 5, 2021
5/5 stars

किताब में पॉकेट बुक्स, fans और उनके प्रकाशक के किस्सों को शानदार तरीके से बताया है. ओम प्रकाश, कम्बोज, वेद प्रकाश जैसे बहुत सारे लोगो के बारे में पढ़कर अच्छा लगा.... बेहतरीन किताब 🥰🥰
1 review
April 13, 2020
बहुत बढ़िया

बहुत अच्छा लगा.... एक शिकायत है अगले (तीसरे) भाग के बारे में कुछ भी नही लिखा है.... मसलन कब तक आएगा वगैरह वगैरह
Profile Image for Rajan.
637 reviews43 followers
January 30, 2021
‘तारा प्रभात’ बन गया युवा, होनहार नरेन्द्र कुमार शर्मा सन आफ ओमप्रकाश शर्मा जिसे कभी मैथ्स पढ़ाने मैं पहाड़ी धीरज जाया करता था। गुरु नानक देव जी ने कहा है : जेहा चीरी लिखिया, तेहा हुक्म कमाई, घल्ले आवहि नानका, सद्दे उट्ठी जाई। यानी जैसा लेख में लिखा था, वैसा पेश हो गया। परमात्मा ने भेजा, आ गए; बुलाया, चल दिए। एक उर्दू शायर ने भी कहा है : आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं, सामान सौ बरस का, पल की खबर नहीं। लेकिन इन बातों से दिमाग बहलता है, चाक-चाक दिल नहीं बहलता। आखिर वक्त बड़े-बड़े गम भुला देता है। ऐसा न हो तो भुक्तभोगी का जीवन जीते जी मौत बन जाए। धीरे-धीरे शर्मा जी के घर से भी मातम का माहौल रुखसत होता चला गया। ऐसा ही दस्तूर जो था सृष्टि का! दुख आखिर दो सुखों के बीच का वक्फा ही तो है! मैं तब रात को शर्मा जी के घर में रुकने के हक में नहीं होता था। नौ बजे तक बस मिलती थी और दस बजे एक ट्रेन भी मिलती थी इसलिए मैं उससे पहले महफिल से उठ जाना चाहता था—अगले दिन मुझे आफिस जाना होता था—लेकिन कभी उठ नहीं पाता था। काम्बोज हमेशा आश्वासन देता था कि सुबह-सवेरे चल देंगे और मैं आराम से दफ्तर के टाइम से कहीं पहले—दस बजे से कहीं पहले—दिल्ली पहुँच जाऊँगा। लेकिन सुबह हिलता नहीं था। सोके ही नौ-साढ़े नौ बजे उठता था, फिर कहता था नाश्ता करके चल देंगे। नाश्ता हो जाता था तो शर्मा जी के साथ गपशप शुरू हो जाती थी, फिर बीयर खुल जाती थी, फिर खाना खाके झपकी जरूरी लगती थी, शाम होती थी तो कहता था अब शाम तो हो ही गई है, घूँट लगा के ही चलेंगे। एक बार ऐसे आठ दिन मैं घर न जा सका। रोज दिन में छुट्टी के लिए अफसर को दफ्तर फोन करता था, रोज कृष्णा नगर में पिता के एक दोस्त को फोन करता था कि मेरे घर पर कहलवा दें कि मैं रात को घर नहीं आऊँगा। फिर उस दुश्वारी का हल मैंने निकाला। मैं सुबह-सवेरे, मुँहअँधेरे उठता था, खाली टायलेट जाता था, खामोशी से घर के बाहर के दरवाजे की कुंडी खोलता था और बिना किसी को खबर किए वहाँ से कूच कर जाता था। आठ बजे तक मैं घर भी पहुँच जाता था, जाते ही फिर सो जाता था और नींद खुलने पर तैयार होकर दफ्तर के लिए रवाना होता था। ऐसा मैंने कई बार किया। एक बार तो शर्मा जी ने बाकायदा शिकायत की—“पाठक जी, दरवाजा खुला छोड़ के निकल लेते हो, हमारे घर में चोरी हो जाएगी!” “भाभी जी जाग गई होती हैं।” मैं दबा-सा जवाब देता था। कभी काम्बोज का साथ नहीं होता था, मैंने अकेला लौटना होता था तो मेरी हरचन्द कोशिश आखिरी बस नहीं तो दस बजे वाली ट्रेन पकड़ने की होती थी। दो बार ऐसा इत्तफाक हुआ कि उनके सुबह जाने के भरपूर आग्रह के बावजूद मैंने शर्मा जी से तो रुखसत पा ली लेकिन ट्रेन मिस हो गई। वो ट्रेन अमूमन लेट होती थी लेकिन दो बार ऐसा हुआ कि वो अपने सही वक्त पर आई और मेरे स्टेशन पहुँचने से पहले चली गई। अब घर लौटने का कोई जरिया बाकी नहीं था और शर्मा जी के यहाँ वापिस जाने को मेरा मन न माना। नतीजतन वो रात मैंने आरती पॉकेट बुक्स के बेगम पुल स्थित आफिस में गुजारी जहाँ मैं दो मेजें जोड़कर बहुत ही परेशानहाल सोया—सोया क्या, बस करवटें बदलते सुबह होने का इन्तजार किया।
























सुरेन्द्र मोहन पाठक का जन्म 19 फ़रवरी, 1940 को खेमकरण, अमृतसर, पंजाब में हुआ। विज्ञान में स्नातक की उपाधि लेने के बाद आप ‘इंडियन टेलीफ़ोन इंडस्ट्रीज़’ में नौकरी करने लगे। पढ़ने के शौक़ीन पाठक जी ने मात्र 20 वर्ष की उम्र में ही अन्तरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त उपन्यासकार इयान फ्लेमिंग रचित ‘जेम्स बांड’ सीरीज़ और जेम्स हेडली चेज़ (James Hadley Chase) के उपन्यासों का अनुवाद करना शुरू कर दिया था। सन् 1949 में आपकी पहली कहानी, ‘57 साल पुराना आदमी’, ‘मनोहर कहानियाँ’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई। आपका पहला उपन्यास ‘पुराने गुनाह नए गुनाहगार’ सन् 1963 में ‘नीलम जासूस’ नामक पत्रिका में छपा था। 1963 से 1969 तक आपके उपन्यास विभिन्न पत्रिकाओं में छपते रहे। सुरेन्द्र मोहन पाठक के सबसे प्रसिद्ध उपन्यास ‘असफल अभियान’ और ‘खाली वार’ थे। इनके प्रकाशन के बाद पाठक जी प्रसिद्धि के सर्वोच्च शिखर पर पहुँच गए। इसके बाद अब तक पीछे मुड़कर नहीं देखा है। 1977 में छपे आपके उपन्यास ‘पैंसठ लाख की डकैती’ की अब तक ढाई लाख प्रतियाँ बिक चुकी हैं। जब इसका अनुवाद अंग्रेजी में प्रकाशित हुआ तब इसकी ख़बर ‘टाइम’ मैगज़ीन में भी प्रकाशित हुई। पाठक जी के अब तक 300 से अधिक उपन्यास छप चुके हैं और वे अपने शुरुआती जीवन की कथा ‘न बैरी न कोई बेगाना’ नाम से लिख चुके हैं।
2 reviews
September 4, 2019
It is a wonderful piece of writing. You are not reading an autobiography rather you will be experiencing late 60s to 80s with the author. Hindi fiction publication industry, author's experiences in his government job are not only insightful, many times hilarious but also give you an idea of the social structure of that time. Do not miss it. Eagerly waiting now for the final part.
3 reviews
September 10, 2019
Amazing Autobiography

This second part is as mesmerizing as the first one. This talks about adult life and took us on two professional journeys along with one personal. Hardship faced in corrupt and uptight govt. Organization and as an upright writer moves you and enhances respect for the creator. It's awesome read.
5 reviews
September 24, 2019
एक बेहतरीन अत्मकथा का दूसरा भाग। लेखक की चिर-परिचित , अनूठी शैली जिसके लाखों शैदाई हैं अपने संपूर्ण जलाल पर है। अवश्य पढ़े और दूसरों को भी पढ़ने को दें। सन 60 और 70 के सभी

समय के लुगदी साहित्य, उपन्यासकारों और प्रकाशकों का प्रमाणिक दस्तानेज। उस समय के समाज की सोच और सरकारी कार्य प्रणाली का सटीक विवरण मौजूद है
This entire review has been hidden because of spoilers.
8 reviews
October 8, 2020
Ok, not better than the earlier one but still worth reading to know the 70s and 80s. Surprisingly SMP has not mentioned about his joke books, I was really interested in knowing about the origin of those books, anyways awesome writing style, full of urdu, hindi, punjabi style. Unique league of writers.
6 reviews1 follower
September 8, 2019
Well explained A crime fiction writers journey

हिंदी म���ं काल्पनिक अपराध कथा लेखक के पचास वर्षों के लेखन का दस्तावेज, जिसमे गुजरे हुए वक़्त को लेखक ने अपने शब्दों में बांधकर पुनर्जिवित कर दिया है।
Profile Image for Satyajeet.
497 reviews9 followers
April 13, 2024
A spellbinding sequel to an awe inspiring tale. The second part of the autobiography of Mr. Surender Mohan Pathak takes along the reader to an era which is almost like tumbling into a wonderland. Reliving nostalgia is what one feels after going through this opus.
Profile Image for Yogesh.
1 review
October 3, 2019
Galtiyo ka putla.....lekin imaandaar .

Nice book . I think their must be one more part . Writer has not reveal secret of his writing which is very much required .
Displaying 1 - 11 of 11 reviews

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