कहते हैं कि एक भयानक दुर्घटना कई जिंदगियां बदल देती है। उस रात हम लोगों के साथ भी वैसा ही कुछ हुआ। घड़ी की बढ़ती सुईयों के साथ जब साक्षात मौत हमारे सिर मंडराने लगी, बचपन से सुने सारे डरावने किस्से हमारी आंखों के सामने घूमने लगे। वो भयानक रात, जस्ट लाइक दैट और तेरी इश्क़ वाली खुशबू के लेखक की कलम से
कहानी अच्छी है, पठनीय है, बीच-बीच में बोर भी करती है लेकिन अंत जानने की उत्सकुता बनी रहती है। इसे फर्स्ट पर्सन नरेटिव की बजाय थर्ड पर्सन में लिखा होता तो ज्यादा उचित रहता।
जब कोई पुस्तक आपका समय और पैसे बर्बाद करे, तो बहुत गुस्सा आता है। इस पुस्तक ने ठीक वही काम किया। एक्नॉलेजमेंट मे लिखा था कि लेखक महोदय को बढ़िया सजेशन मिले और पुस्तक का बढ़िया संपादन हुआ! पर मुझे तो ऐसा लगा कि न तो उन्हें मिला सजेशन ढंग का था और न ही संपादक का काम।
पिछली पुस्तक की तरह ही मैं यही कहूँगा इस पुस्तक के लिए कि यह लघुकथा के लिए ज्यादा उपयुक्त थी बजाय एक उपन्यास के। पढ़ते हुए ऐसा लगा कि कहानी को बेवजह खीचा गया। कई संवाद बेवजह लंबे खिंचे गए और रिपीट किए गए। लेखक साहब को बस इस उपन्यास को बड़ा करने की जल्दबाज़ी थी। कहानी पर ध्यान दिया ही नही। कहानी मुझे औसत लगी और इसमे कुछ बड़े प्लॉटहॉल्स है। पहला यह कि रोनित बुढ़िया और उसके पोते सोनू का ज़िक्र करता है। भला रोनित को या अन्य लोग, जो उस भूतिया सड़क के बारे मे जानते थे, उन्हें कैसे पता चला? मतलब यह कि उस सड़क पर अमावस्या वाली रात को जो गाड़ी जाती, वह टाइम लूप मे फस जाती और उनका कुछ पता नही चलता। ऐसे मे जब कोई जिंदा बचा ही नही, तो बुढ़िया और सोनू के भूत के बारे मे किसने बताया? यानी कोई तो उस टाइम लूप से जरूर बचकर निकला था जिसने बुढ़िया और सोनू के बारे मे बताया।
दूसरा प्लॉट होल, कहानी प्रथम पुरुष मे अभिमन्यु सिंह के ज़रिये सुनाई गई है। प्रथम पुरुष नैरेटर जब हॉरर मे इस्तेमाल होता है, तो नैरेटर हमेशा जीवित बचता है, ताकि वह अपनी कहानी आप पाठको को सुना सके। मगर अंत मे तो पता चला कि अभिमन्यु मारा गया। ऐसे मे यह कहानी किसने सुनाई? लेखक को प्रथम पुरुष के बजाए तृतीय पुरुष का इस्तेमाल करना चाहिए था।
इसके अलावा अंत मे यही लिखूंगा की इस पुस्तक को बिल्कुल न पढ़े। इसका पहला भाग एक बार पढ़ा भी जा सकता है, लेकिन यह नही।
सत्य घटना पर आधारित होने के झांसे मे न फसे। नेट पर एक आसान सर्च से आपको पता चल जाएँगा कि लेखक के जन्मस्थान मे ऐसी विचित्र तथाकथित घटनाओ का कोई ज़िक्र नही है, जिनसे यह कहानियॉ प्रेरित कही गई है। यह कहानिया 100% काल्पनिक है।
डरावने दृश्यों से भरपूर, लेकिन कहानी और भी अच्छी हो सकती थी
कोंसेप्ट वही ‘वो भयानक रात’ वाला ही है, लेकिन इसमें डर का प्रमाण दुगना हो जाता है । सभी दृश्यों में लेखक डराने में कामयाब हुए हैं । मेरे खयाल से कहानी में और भी कुछ नयापन लाया जा सकता था । ओवरोल एक अच्छी हॉरर ।
कहानी काफी अच्छी है मगर मध्य मे धीमी और बोरिंग लगने लगती हैl कभी कभी लगता है कि कुछ बातों को बार बार दोहराया गया है, एक ही बात को बार बार दुहराने के कारण ये कहानी थोड़ी खींची हुई प्रतीत होती है l