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Chalta-Phirta Pret । चलता-फिरता प्रेत

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बहुत वक़्त से सोच रहा था कि अपनी कहानियों में मृत्यु के इर्द-गिर्द का संसार बुनूँ। ख़त्म कितना हुआ है और कितना बचाकर रख पाया हूँ, इसका लेखा- जोखा कई साल खा चुका था। लिखना कभी पूरा नहीं होता... कुछ वक़्त बाद बस आपको मान लेना होता है कि यह घर अपनी सारी कहानियों के कमरे लिए पूरा है और उसे त्यागने का वक़्त आ चुका है। त्यागने के ठीक पहले, जब अंतिम बार आप उस घर को पलटकर देखते हैं तो वो मृत्यु के बजाय जीवन से भरा हुआ दिखता है। मृत्यु की तरफ़ बढता हुआ, उसके सामने समर्पित-सा और मृत्यु के बाद ख़ाली पड़े गलियारे की नमी-सा जीवन, जिसमें चलते-फिरते प्रेत-सा कोई टहलता हुआ दिखाई देने लगता है और आप पलट जाते हैं। —मानव कौल

160 pages, Paperback

First published July 1, 2020

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280 people want to read

About the author

Manav Kaul

32 books395 followers
कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।

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Community Reviews

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82 (42%)
4 stars
81 (41%)
3 stars
27 (13%)
2 stars
2 (1%)
1 star
2 (1%)
Displaying 1 - 28 of 28 reviews
Profile Image for Prashasti .
111 reviews196 followers
December 14, 2020
यू सच कहू तो मैं बहुत घूमना चाहती हू। एक बार मैंने अपनी मा से कहा था कि मुझे नहीं लगता कि मै इस देश की हू। मै इस दुनिया में पैदा हुई हू। मेरा घर या मेरा देश मुझे बहुत छोटी बात लगती हैं। मै जिस भी देश जाती हू, कुछ वक़्त बाद लगता हैं कि मै वहीं की हू।

I felt I was reading about myself as I read those lines, resonating the most with my vagabond soul.

Spent the last weekend in the company of Chalta firta pret...figuratively, not literally! I loved how the author took me to places with him from Wanju-gun, Bombay, Almora, Mandi, to "इस देश की नाभी है हमारा गांव।" Hoshangabad. The narration at places was strongly reminiscent of Ruskin Bond's, taking us back to the mountains & RK Narayan's Malgudi Days showcasing 90s country life.

तेरी दुनिया में सारा कुछ अभी तू ही है, अगर दूसरे के लिए जगह नहीं बनायेगा तोह दूसरा तेरी दुनिया मै हक से प्रवेश कैसे करेगा?

The stories oscillated between the millennial post-break up scenes/existential crisis/mid-life crisis to the memories of childhood and home.

पैदा होने और मरने के बीच जीवन था और उसकी छोटी छोटी व्यस्तताएं थी।

Penning down about death is as exhaustive as experiencing it. This book seemed like a long closure letter to the dead, to the ones who left, & to our own old self that no longer existed.

यह मेरे भीतर की एक अव्यस्थित दुनिया है, जिसमें खाली पगडंडियां अनंत मै खुलती है, जिसमें मै भटक रहा हूं?

Sometimes, the protagonist reminded me of Dostoevsky's Myshkin..conflicted, flawed, & innocent, with lots of questions.

एक दिन जब हम रुककर उन मोड़ो को देखते है, जहां से हम बहुत पहले दाए मुड गए थे, तब बरबस बाए तरफ निगाहें चली जाती है। बाए तरफ की पगडंडी पर अब एक घना जंगल उग आया है। उसके रहस्य और भी आकर्षक लगने लगे है। क्या होता अगर हम बाए चले गए होते?

Took me 2 days to finish reading this book, & the aftertaste is utter calmness & unruffled repose.

हम सब अंत मै कहानियां ही तोह है। हम सबने अपनी कहानी लिखी है, जैसे मैंने अपनी कहानियां लिखी है और पीछे पल्टो तोह लगता है कि देखो कहा तक आ पहुंची है।

I want you to keep writing always, now that you've made it to my favorite author list @manavkaul ❤️
Profile Image for Manas Barpande.
101 reviews29 followers
July 31, 2020
बोगनवेलिया की तरह, मुझे प्यार बड़ी आसानी से हो जाता है पर किसी लेखक से इतना प्यार मुद्दतों बाद हुआ है। @manavkaul की हर किताब पढ़ने के बाद जिस भी आसान में बैठा हुआ हूँ सीधा लेट जाता हूँ, ऊपर धीमी गति से चल रहे पंखे को ताकते हुए, इस उम्मीद में कि शायद जो बेचैनी गले तक उमड़कर आ गयी है वो वापस अंदर चली जाये। मगर वो किरदार कहानी से बाहर निकलकर सामने लगे शीशे में उतर जाते हैं और चीखते हैं कि कब तक मैं वही घुटन अंदर लिये रहूँगा। इस किताब के पढ़ने के बाद भी वही दोहराया गया - पता नहीं चला कि बावरा मन कब कल्पना की दहलीज़ लांघकर यथार्थ के आँगन में टहलने लगा।⁣

" बड़े होने की थकान में कितनी ही बार हम अपनी मृत्यु को सहते हैं, कितनी ही बार हम मार देते हैं उसे जो सबसे प्रिय है। बाहर सारा कुछ ख़त्म करना हम सीख चुके थे बहुत पहले, पर भीतर कुछ भी हमारे बस में नहीं है। वहाँ सारी ठोकरें, आज भी अपनी पूरी पीड़ा के साथ ऐसे पल रही हैं मानो हम अपनी ठोकरों के बाद उठना भूल गये थे। हम भी उन्ही गड्ढों में औंधे पड़े हुए हैं। "⁣

मैं मानता हूँ जो लेखक किरदार मानव की किताबों में होते हैं एकदम सच्चे होते हैं - अपने दोगलेपन में। उसका एक पैर वर्तमान में चलता है पर दूसरा हमेशा अतीत या भविष्य में यूँ होता तो क्या होता के सवालों के हल ढूंढ रहा होता है। वो, धीमी आंच पर सुलग रहे, उसके आखरी साँस लेते रिश्ते पर अपनी कविता की रोटी सेंकता है और उन अधूरी रह गयी प्रेम कहानियों की अर्थी, अपने शब्दों के कंधों पर, यादों के शमशान पहुँचाता है।⁣
उसके रिश्तों का epilogue, हमेशा उसकी कहानियों का prologue बन जाता है।⁣

" हम चाहते भी हैं कि कोई हमसे पूछ ले एक बार कि कैसे हो? और हम असल में कैसे हैं, उसके सारे जवाबों के बाँध हम खोल दें उसके सामने, सालों से जमे हुए पानी को बह जाने दें। पर यह डर भी उसी के साथ भीतर पल रहा होता है कि कहीं ये पूछ न लें कि कैसे हो? हमारे बाँध में जंग लग चुकी है, वे खुलेंगे नहीं और हमें हमेशा उनके टूटने का डर बना रहता है। "⁣

" एक दिन जब हम रूककर उन मोड़ों को देखते हैं, जहाँ से बहुत पहले हम दाएँ मुड़ गये थे तब बरबस बाएँ तरफ निगाह चली जाती है। बाएँ तरफ कि पगडंडी पर अब घना जंगल उग आया है। उसके रहस्य और भी आकर्षक दिखने लगे हैं। क्या होता अगर हम बाएँ चले गये होते ? "⁣

प्रिय मानव लिखते रहिये और ऐसे ही हमें भी प्रेरणा देते रहिये कलम उठा कर लिखने की। इस उम्मीद में कि किसी दिन हमारी घुटन भी इतनी हावी हो जाये कि स्वतः बाहर निकल जाये।
Profile Image for Ekta Kubba.
229 reviews8 followers
August 12, 2020
कभी-कभी कुछ चीजें, कुछ लम्हे, कुछ ख्याल बहुत अपने से लगने लग जाते हैं। इस संग्रह की कहानी 'नादान' भी मेरी अपनी बन गई है। इतनी अपनी कि एकबारगी तो ऐसा लगा कि इस कहानी का नाम भी न लूँ किसी के सामने। यहां लिखते हुए भी ऐसा ही कुछ महसूस हो रहा था। मुझे अपनी निजी चीजों को किसी के सामने प्रकट करना पसंद नहीं। पर बहुत नाइंसाफ़ी लगी कि पुस्तक के बारे में बात हो और इस कहानी का ज़िक्र भी न आए। बहुत अपनापन मिला इस कहानी में। ऐसा लगा कुछ खोज रही थी बहुत लंबे समय से पर मिला इस कहानी में। इसे पढ़ने के बाद बहुत देर तक कुछ पढ़ नहीं पाई। इसी कहानी को जीते रहने का मन करता रहा। पर मानव के शब्दों की जादुगरी से कोई कब तक बचा रह सकता है।

किताब के बारे में मैंने कहीं पढ़ा था कि यह कहानी संग्रह मृत्यु के इर्द-गिर्द घूमता है। कुछ डर सा लगा इसे पढ़ने में। मृत्यु उदास कर देती है और उदास होने का मन नहीं चाह रहा था। लेकिन पढ़ने के बाद जाना कि यह तो ज़िंदगी से भरपूर है। हर कहानी का अन्त जहाँ होता है वहीं से एक नया मोड़ शुरू हो जाता है। जिंदगी के कई पहलुओं से रू-ब-रू करवाया इन कहानियों ने। ऐसा लगता है कि कुछ भी मिल जाए ज़िंदगी के सफर में, अब पता लग गया है कि कैसे संभालना है खुद को।
धन्यवाद मानव, इस किताब को लिखने के लिए।
Profile Image for Anchal Saksena.
Author 5 books9 followers
August 15, 2020
मानव को पढ़ती हूँ तो मानव सी हो जाती हूं। जो भी मानव ने जिया है और लिखा है सब लगने लगता है जैसे मैंने ही जिया और लिखा है। फिर ख़ुद पर गुरुर हो जाता है कि मैं ऐसा लिख सकती हूं।
मैं मानव की हर किताब पर यही कहती हूँ कि उसमें अकेलापन, अधूरापन है। असल में वो जो गंभीरता है उसकी गहराई को समझने के लिए उस तक पहुंचने के लिए वो अकेलापन और अधूरापन हमारे भीतर होना ज़रूरी है।
मानव की सभी किताबों में से प्रेम कबूतर मेरी पसंदीदा है। मैंने उनकी हर किताब पढ़ ली औए आगे भी पढूंगी। पर इस किताब से थोड़ा निराश हुई। ऐसा लगा मानो मानव बस कुछ-कुछ लिखते ही गए। कई बार बिना ठीक से सिर-पैर जोड़े भी। आख़री कहानी तो मुझे समझ ही नहीं आयी। शायद मेरी ही समझ का फेर हो। ऐसा लगा जैसे इस किताब को मानव ने पूरे मन से नहीं लिखा या शायद पूरे मन से नहीं जिया। पिछली 4 किताबों के मुकाबले ये किताब औसत है।
Profile Image for Saurabh Pandey.
168 reviews8 followers
December 17, 2020
I have said this earlier also that work of Manav takes me to some other world, you can relate each and every line of his with your own life. You feel a different kind of emotion after reading his books and this makes him the special author and a one who should be read by everyone.
Profile Image for Arun Singh.
252 reviews13 followers
August 2, 2020
चलता – फिरता प्रेत के साथ पहला दिन
झूठ सुनहरा था, भूस की तरह, सत्य उसमे काले सांप की तरह घुस गया। हम डर गए। बहुत। इतना डर गए कि लाठी लेकर भूस के ढेर में सांप मारने लगे। सारा घर भूस के तिनकों से भर गया। दीवार, छत, खिड़की, दरवाजे और हम – सब छोटे छोटे भूस के तिनकों के बीच छिप गए। सांप हाथ नहीं आया… रात में थककर सोने पर पैरों पर कुछ रेंगता महसूस हुआ और हम अकड़ गए, हमने डर कर हाथ जोड़ लिए, तभी कानों में फिस्फिसाती सी आवाज़ आई – ‘डरो मत, मैं तुम्हें नहीं काटूंगा। तुम पर अब भी झूठ के तिनके बिखरे हुए हैं। अभी तुम सत्य के काटे से जीने लायक नहीं हुए।’

और फिर वो चला गया… और हम सुकून से मरते रहे अपने भूस के साथ।

किताब आते ही एक चुप्पी आयी है। सिर्फ भूमिका पढ़ी है। आगे पढ़ने से डर लग रहा है – मृत्यु जैसा डर। लिखा है कि ये कहानियां मृत्यु शब्द के आस पास लिखी हैं। क्या हर मृत्यु अपने आस पास इतनी चुप्पी मांगती है? और लिखा है कि ये कहानियां मौन के बीच की चुप्पी हैं – तब तो मुझे अपना मौन इन कहानियों के मौन से मिलाना पड़ेगा, वरना तो धोखा होगा ना? किताब पढ़ने की बहुत चाह है – पर उससे कहीं ज्यादा डर… ये डर उस काले सांप का है जो मेरे जीवन के सुनहरे भूस में आ गया है – नहीं, जिसे मैंने बुलाया है और अब डर लग रहा है – अब या तो मैं लाठी लेकर भूस बिखेरूं या मौन रहकर काटे जाने का इंतजार करूं! पर डर बहुत है।

दूसरा दिन..
डरते डरते रात के सन्नाटे में दो कहानियां पढ़ ली हैं। कहानियों के शब्द बुदबुदाते हैं कानों में। आत्मा के कुएं में हर शब्द टप टप की आवाज़ सा गिरता है, अंदर कुछ बहुत देर तक गूंजता रहता है। घोड़ा कहानी के पात्र निजी जीवन में देखें हैं… दूसरी कहानी में कितना सच है कितनी कल्पना – परिधि पर चलती कहानी। यही तो हम जी रहे हैं – नहीं हम नहीं, शायद मैं – शायद सिर्फ परिधि पर चलने का भ्रम है। पर ये भ्रम भी कितना सुन्दर है। कहानी पढ़ के बड़ा मन किया कि ये मेरे साथ हो पर फिर डर गया कि कितना दुखद है ये। पर इस दुख के अंदर कुछ चमत्कार सा बैठा है जो बार बार अपनी ओर बुलाता है। तबसे उस चमत्कार के इर्द गिर्द घूम रहा हूं। हर कहानी के साथ सांप का डर बढ़ रहा है।

तीसरा दिन…
पूरे दिन कहानी अपने पास बुलाती रही पर टालता रहा। वहीं सांप का डर। पर अंत में दबे क़दमों से जाना पड़ा। थोड़ा पढ़ते ही कुछ अंदर घुमड़ने लगा – कितना निजी, निजी रह जाता है और कितना कहानी का हिस्सा, वो कौनसा बिंदु जहां छूकर कहा जा सकता है कि देखो यहां से असल जीवन शुरू है और यहां से दूसरी तरफ सिर्फ कहानी है – और अब चुन लो। चुनाव ना कर पाना कहानी को तिलिस्म बना देता है जिसके सपने बचपन से बहुत देखे हैं – तिलिस्म को पूरा खोलने का खयाल हाथ पकड़ता है पर मैं तिलिस्म की सुंदरता में इस कदर खोया हूं वो पकड़ ढीली पड़ जाती है। बहुत धीमे से सांप बुदबुदाता है – तुम अभी इस परिधि पर नहीं चल सकते जहां असल और कहानी को एक कर सको और अंदर कोई बहुत तेज़ रोता है।

रोना और ना बढ़े का डर जल्दी से अगली कहानी पर ले जाता है। कायरता – नाम का सबसे पहला पत्थर मन के भीतर गूंजता है। सब सरल होने के बावजूद हमें कठिन जीने की आदत है – इसके विपरीत जीत ही ऐंठन होती है। और जलन की पहली पीड़ा – ऐसा मैं कब जी पाऊंगा का प्रश्न कनपटी पर देर तक ठक ठक करता रहता है।

चौथा दिन….
कुछ इतना निजी पढ़ कर लगता है कि ये सब किसी एक समय में मेरे साथ हो चुका है। ये एक एक संवाद, ये एक एक चुप्पी मैंने जी है। ये मेरी कहानी है। अपनी कहानी जीने के लिए दो बार और पढ़ी कुछ कहानियां। कुछ कहानियां इतनी निजी हो जाती हैं लगता है ये हम हैं – कोई दूसरा एक एक शब्द से हमें लिख रहा है और हम उसे चाहकर भी नहीं रोक सकते क्योंकि जो लिखा जा रहा है वो बहुत सुंदर है – इतना सुन्दर जितना हम जी नहीं सकते। लाख कोशिशों के बाद भी।

Full review - Ekchaupal
Profile Image for Harshita Pandey.
43 reviews
December 6, 2020
मृत्यु के इर्द गिर्द बुनी हुई कहानियाँ.. ठीक मृत्यु नहीं लेकिन मृत्यु की त्रासदियाँ। और त्रासदियों के रोशनदान से झाँकता हुआ जीवन। और इस सब की परिधि पर मंडराते हुए तुम। तुम और एक चलता-फिरता प्रेत।
Profile Image for Ajeet Kumar.
22 reviews1 follower
September 11, 2024
I rarely criticize an author. But sorry to say this readers - manav is watered down version of nirmal verma. While he doesn't shy away from confessing the influence, many of his stories are shamelessly copied from Nirmal verma. Like in this collection - Pita aur Putra is copied from Nirmal's Dedh inch upar.
This is a very sad thing to say as as it not only impacts readers but raises questions on how Hindi literature will evolve if such things are appreciated. I guess Hindi literature and criticism has been dead for a while and that's why such questions are never raised. Ironically manav himself has said this - the society gets literature it deserves!
Profile Image for Srijan Singh.
14 reviews1 follower
July 16, 2021
मानव कॉल की लेखन की पहली विशेषता तो ये है की उनके लेखन में ये अंतर कर पाना कठिन है की कब वो कहानी का रूप ले रही और कब कविता का | आपको उनकी कहानियों में भी कविता पढ़ने का अनुभव होता है जो की बहुत ही सुन्दर अनुभव है | उनके लेखन की दूसरी और सबसे अच्छी विशेषता ये है की वो आपसे आपका ही सच कहते है | ऐसा सच जो पढ़ते हुए आपको डर लगने लगता है पर फिर भी आप उसको पूरा पढ़ते है | इन्ही कहानी , कविता, और सच के बीच में मानव कॉल का लेखन छुपा हुआ है |
Profile Image for WhimsyReader.
114 reviews1 follower
August 2, 2024
This was my first book by Manav Kaul and i really enjoyed it.

Chalta Firta Pret is a collection of short stories. All of them are very different. Some i enjoyed a lot and some i didn't like.

Almost all of the stories are closely related to death. Only one of them is a stream of consciousness kind of writing while traveling. It wasn't my favourite.

But other than two stories I loved all of the others.
1 review
January 22, 2022
Pehli dafa review likh rha hoon.

Inn kahaaniyon mein maine khud ko paaya..
kayi jagah apne Kareebi logon ko paaya..

Beech mein rukk gya tha
Jab apna hee khauf paaya

Par iss kitaab ne mujhe bahut kuchh
apne baare mein bataaya
Profile Image for Udit Baxi.
31 reviews9 followers
March 7, 2022
Just like his other books that I've read, the writing is very personal!
Loneliness & Grief is central theme to all the stories, so if you have lost your loved and dear ones, brace yourself for a storm of emotions from within you..
Profile Image for Books&Chill.
64 reviews2 followers
August 13, 2025
मेरी पहली हिंदी साहित्य किताब - चलता फिरता प्रेत। पढ़ते हुए कई बार ऐसा लगा कि मैं भी कहानी में कहीं हूँ। मानो जैसे की मैं भी एक कहानी हूँ।

ये किताब मुझे जन्मदिन पर गिफ्ट की गई थी- काफ़ी सुंदर लिखा है और मैं जिसने गिफ्ट दिया था उसे थैंक यू बोलना चाहती हूँ।
2 reviews
December 7, 2023
Heart touching stories

Stories, will give you an another way of thinking and feeling about life. Love the way you write manav kaul.
Profile Image for Ashley  Tews.
113 reviews6 followers
April 19, 2024
Stories, will give you an another way of thinking and feeling about life. Love the way you write manav kaul.
Profile Image for Rohini Biswas.
52 reviews4 followers
March 19, 2022
नयी कहानी आंदोलन और नयी वाली हिंदी के बीच एक मज़बूत पुल की तरह हैं मानव कौल.. जहाँ एक तरफ उनकी कहानियों में आज के किरदार, उनके मन के अंतर्द्वंद्व और वर्तमान समाज का चित्रण है, वहीं दूसरी तरफ उनकी भाषा में शालीनता भी है और ठहराव भी..

चलता फिरता प्रेत एक कहानी संग्रह है जिसकी हर कहानी अपने आप में कई कहानियाँ समेटे हुए हैं.. पढ़ते हुए यूँ लगता है जैसे कोई सामने बैठ कर सुना रहा है.. अनायास ही पाठक, लेखक और उनके किरदार एक हो जाते हैं..

चूँकि मानव कौल लेखक होने के साथ ही साथ एक सफल अभिनेता भी रहे हैं, और कई कहानियाँ उत्तम पुरुष शैली में लिखी गयीं हैं, पढ़ते हुए अनायास ही उनका ही चेहरा मुख्य किरदार का चेहरा लगने लगता है..

मानव कौल को पढ़ना किसी बरसाती शाम में गरमा गर्म चाय की चुस्की जैसा है.. उनके लेखन में एक अपनापन है, चिर-परिचित सुख का बोध है.. अच्छा लिख पाने के पीछे कितने सारे अच्छे लोगों का पढ़ना निहित है ये उनकी लेखनी में साफ़ झलकता है..
Profile Image for Shivesh Ranjan.
23 reviews3 followers
August 4, 2020
जैसा कि मैंने पहले कहा था मानव कॉल की कहानियों के बारे में
उनकी कहानियाँ बहती नदी के पानी के नीचे के पौधे जैसी है जिसे हम नदी में खड़े होकर काफी देर तक निहार सकते हैं। ये कहानी की किताब बिलकुल वैसी ही है।
इसमें एक कहानी है ब्लू रेनकोट, जिसमें उन्होंने लिखा है की उनके अंदर उपन्यास लिखने का संयम नहीं है। कुछ दिनों पहले मानव जी ने इंस्टाग्राम पर कहा की उन्होंने एक उपन्यास ख़त्म की है। इस कथा-संकलन के बाद उस उपन्यास को पढ़ने की भी उत्सुकता है।
Profile Image for MAYANK.
1 review1 follower
October 9, 2020
सिर्फ ये ही नहीं बाकी की चार किताबें पढ़ते हुए यही महसूस हुआ कि हमारे अचेतन मस्तिष्क में कहीं ये बातें ये ही लाइन रखी हुई थी और लेखक ने उसे चुरा कर किताब में रख दिया,मानो हमारे ही ख्याल हों,मानो हमारा ही जिया हो और हमसे पहले किसी और ने लिख दिया,मानव के लिखे की यही खासियत है कि उनकी कहानियां पाठकों को बांधे रखती हैं और बीच बीच में रुक कर विचार करने पर बाध्य कर देती हैं कि कोई इतना गहरा भला लिख कैसे सकता है।
Profile Image for Akshunya.
65 reviews
September 20, 2020
किताब के पहले पन्ने पर लिखा है "कुछ दूर साथ चलते हैं"। अभी कुछ दिन पहले ही तो साथ चलना शुरू किया था। यह उन सफरों में से था, जो बहुत जल्दी खत्म हो जाते हैं, पर उस छोटे सफर से ही हमारे जीवन को इतनी यादों से भर देते हैं, कि उन यादों के सहारे बिन सफर का रुका हुआ जीवन उन्हें याद करके कट जाता है।
आशा है, हम फिर मिलेंगे... जल्दी ही!
Profile Image for Satwik.
60 reviews11 followers
April 28, 2021
It felt different. The stories revolve around death/defeat and that makes you sad and anxious sometimes but it also pushes you to make a change to feel alive. It is different from previous books. Language is similar but content is not.
Displaying 1 - 28 of 28 reviews

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