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ख्वाहिशें अभी और भी हैं

ख्वाहिशें जीवन की ऊर्जा स्रोत है। हमारे मन में हज़ारों ख्वाहिशें रहती हैं। जीने की ख्वाहिश, कुछ पाने की ख्वाहिश, प्रेम की ख्वाहिश, द्वेष की ख्वाहिश, भलाई की ख्वाहिश, बुराई की ख्वाहिश। ख्वाहिशों से ही जीवन चलता है। यही ख्वाहिशें हमें आगे बढ़ने, कुछ कर गुजरने की ऊर्जा प्रदान करती हैं।

इस अखिल भारतीय साझा काव्य संग्रह 'ख्वाइशें अभी और भी है' के लिए 8 राज्यों से 14 कवियों व कवयित्रियों का चयन हुआ है।,

डॉ मोनिका शर्मा
संपादक

160 pages, Paperback

Published July 1, 2020

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Monika Sharma

68 books8 followers

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Displaying 1 - 2 of 2 reviews
Profile Image for Madhav Kumar.
1 review
July 24, 2021
Hh
This entire review has been hidden because of spoilers.
Profile Image for Monika Sharma.
Author 68 books8 followers
September 16, 2020
ख्वाहिशें जीवन की ऊर्जा स्रोत है। हमारे मन में हज़ारों ख्वाहिशें रहती हैं। जीने की ख्वाहिश, कुछ पाने की ख्वाहिश, प्रेम की ख्वाहिश, द्वेष की ख्वाहिश, भलाई की ख्वाहिश, बुराई की ख्वाहिश। ख्वाहिशों से ही जीवन चलता है। यही ख्वाहिशें हमें आगे बढ़ने, कुछ कर गुजरने की ऊर्जा प्रदान करती हैं।

पर सबसे बेवफा होती है ये ख्वाहिशें। क्योंकि पूरी होते ही बदल जाती हैं और उनकी जगह ले लेती हैं नई ख्वाहिशें। कोई भी ख्वाहिश आखरी नहीं होती, क्योंकि जब भी कोई पूरी होती हैं तो मन पुकारता है 'ख्वाइशें अभी और भी हैं'।

कविता भी ख्वाइशों और परिकल्पनाओं के दस्तावेज हैं। हमारे हृदय के अंदर दबी ख्वाहिशें बह कर लेखनी के साथ कागज पर उतर आती हैं।

'ख्वाइशों भरे एक दिन' की तलाश में निकली कवयित्री सोनिया 'सूर्यप्रभा' जी, कुछ 'अधूरे ख्वाब' लेकर 'तमन्नाओं के शहर में' ढूंढती है 'जिंदगी'।

ख्वाहिशें बंद मुट्ठी में डर कर रही
ख्वाहिशों की भी अपनी उमर कट गई

ललिता पाठक 'नारायणी' जी एक ऐसी कवयित्री हैं जो विविध विषय पर बारीकी से लिखती हैं। वे 'माखन चोर' का इंतजार करती हैं। उनका 'समर्पण' हर 'परिवर्तन' के समय में 'खौफ के मंजर में' 'चित में बस चेतना' तलाशता है।

सामर्थ्य है तो है सलामत
जिंदगी की डोर भी
मझधार के दोनों किनारे
इस ओर भी, उस और भी

प्रेम की कवयित्री 'पूनम पांडे' जी 'अक्सर तन्हाई में' 'स्त्री' के मन की बात बयां करती हैं, जब वे कहती हैं कि 'ढलती उम्र' में 'अब नहीं संवरती है वो' बस 'उम्र' छुपाती है।

बड़े करीने से संवारती है
वह चिर यौवन की ख्वाहिश में
अब पहले से ज्यादा वक्त जाया करती है

'साक्षी शांडिल्य' जी 'कहना चाहती हैं' कि 'एक तुम की खातिर' उन्होंने 'सौगात' का ख्याल रखा है। इसी इंतजार में पूछती हैं कि 'आओगे क्या'

सड़कें बूढ़ी हो चुकी
और मेरी नजरें भी
बीस बरस से
इन राहों को निहारते हुए
बस इतना बता दो
कि तुम आओगे क्या?

आसाम की वादियों से 'रिमी साहू' जी कहती हैं कि 'हर इंसान के मन में' 'प्रेम' की 'कुछ ख्वाहिशें' होती हैं और होता है एक 'इंतजार'।

कुछ चाहतें अधूरी ही शोभा पाती हैं
कुछ ख्वाहिशें अधूरी हमेशा रह जाती हैं।

सविता सिंह 'सैवी' जी अपनी बात को बेबाकी से कहती हैं कि 'दहलीज तेरे घर की' किसी नारी की सीमा हो 'जरूरी तो नहीं'। तुम उसे 'बदतमीज नारी' कह सकते हो पर उसे 'क्या भुला पाओगे'

क्यों बनूं तुम्हारी भागीदार मैं
परमेश्वर पति के आधे पाप खटने को
न नहीं तैयार मैं, अत्याचार का चक्रव्यू लड़ने को
नहीं बनना मुझे महान नारी

अमित कुमार 'आधार' दोहराते हैं 'वही कहानी' कि 'हाँ! मेरी है तू' और 'हाँ! एक कवि हूंँ मैं'

क्या दूं मैं ऐसा कुछ तुम्हें लिख कर
जिससे तुम कहो कि
हाँ एक कवि हूंँ मैं

'गरिमा कासंकर' जी 'चुप रह कर' 'मूक रिश्ता' निभाती हैं। 'मां की याद' में 'आशा का दीप' जलाती हैं।

भावनाओं से एक सुंदर
मूक रिश्ता बन गया है
जो हम समझते हैं
ये एहसास बहुत सुंदर है

'सोनू चौहान' जी 'ख्वाहिशों' की 'दास्तां' सुनाती हैं

ख्वाहिशें छोटी छोटी चिड़िया होती हैं
जो डाल डाल पर फुदकती रहती हैं
पर किसी के हाथ नहीं आती

'नूतन योगेश सक्सेना' जी 'कोरोना' वायरस को प्रकृति का दंड मानते हुए कहती हैं कि 'वन से जीवन' है और प्रकृति की हर 'एक संपदा' का आदर करना ही होगा।

कब तक सृष्टि रहती खामोश
ठिकाने लगाने आई सबके होश
अब भी जो न चेता इंसान
तो भुगतने होंगे गंभीर परिणाम

पूनम सक्सेना 'निर्मल चेतना' मानती हैं कि 'हृदय के भावों' में 'संतुलन' पर ही 'जीवन का वृक्ष' पनपता है और 'प्रार्थना' ही से 'चिंतन चैतन्य का' संभव है।

आज में थपेड़ों को सहता है
कल को फिर मुस्कुरा के जीता है
जीवन का कैसा वृक्ष है ये
बहुतों को नव जीवन देता है

'रेनू श्रीवास्तव' जी 'रिश्ते' को 'संशय' से दूर अडिग 'विश्वास' से संभालने का प्रयत्न करती हैं। वो 'प्रेम' व 'बसंत' की 'याद' में 'जिंदगी' जीना सिखाती हैं।

रिश्ते कभी ढाल
तो कभी वार से
रिश्ते कभी नफ़रत
तो कभी प्यार से

'माधव तिवारी' 'मन के एक खामोश कोने' में प्रेम को पुकारते हुए कहते हैं 'तुम आओ तो'। साथ ही कहते हैं 'मैं कवि हूंँ' और अपनी मजबूरियों को बयां करते हैं।

चंद सिक्कों को
जुटाने
ताकि तुम्हें
फिर बुला सकूं
चाय की टपरी तक
और दे सकूँ
कविता का
एक और उपहार

'रेनू मिश्रा' जी कहती हैं 'नारी की कहानी', उसकी 'चुनौती'। बताती हैं नारी के बारे में, जिसकी हर चीज 'खास होती है' उसका 'रुमाल', उसकी 'ओढ़नी'।

सम्मान करो नारी का
नारी से समृद्धि सारी है
दर्द की कलम से लिखी
नारी की कहानी है

डॉ मोनिका शर्मा
संपादक
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