अर्चना तिवारी की कहानियों के साथ उनके प्रशंसक अपनी जिंदगी का ताना-बाना बुनते हैं। एकदम सहज और घरेलू होने के बाद भी उनकी कहानियां बड़ा संदेश देती है। ये कहानियां संस्कारों का भंडार है। मानवीय संवेदनाओ के सूक्ष्मतम स्पंदनों को भी अपने शब्दों में बांधने की क्षमता रखने वाली अर्चना जी अपनी सहज एवं सरल भाषा शैली के माध्यम से कब पाठकों के मन की गहराई में उतर जाती है ,पता ही नहीं चलता। उनकी कहानियां समाज के हर वर्ग में चाहे गृहिणी हो या कामकाजी महिलानवविवाहित हो या वानप्रस्थ की ओर जाते दंपति ,गांव में पढ़ने वाले युवा हो या महानगरों में पढ़ने वाले युवा सभी पीढियों में आदर और सम्मान के साथ पढ़ी जाती है । जीवन में रिश्तो की द्वंद्व कभी खत्म नहीं होती। कई तरह की स्मृतियां और अपेक्षाओं पर रिश्त
📚 Anmol Rishtey - अनमोल रिश्ते हर कहानी अपने आप में उम्दा प्रस्तुति के साथ सरल भाषा में पिरोई हुई है जो हर किसी के मन को छू जाती हैं । "ममता की छांव" में गोपाल को अपने मां बाप की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं लगती और उसे अकेले ही रहना पसंद था जो कि आज की एक सच्चाई है कोई फर्क नहीं पड़ता कि को कोनसा वर्ग है जिसे इंग्लिश में पॉवर्टी और लोअर मिडिल क्लास या कुछ भी समझें "छिपी प्रतिभा" में दो बच्चो की प्रतिभा को कम और ज्यादा मूल्यांकन करना मुश्किल काम है , कब कौन अपनी छिपी प्रतिभा को निखार ले। "बरसात की रात" हो या और "वह बदल गया" या "शिकायत जिन्दगी से " कहानी एक नई शुरुवात की है जो जीवन में नया सवेरा भरती है । "मेरा घर मुझसे कुछ कहता है" बहुत ही रोमांचक कहानी इसको पड़ कर लगा ये तो मेरे अंतर्मन की ही चहल पहल है जो अक्सर मै खुद करती हूं । "वो सच्चा प्यार" कहानी तो निराली ही हैं । "नादानी" कहानी अनोखी है । जिसमे आज कल की स्वछंदता के साथ जीने वाली पीढ़ी और बहुत जल्दी परिणाम को पाने वाली के लिए प्रेम और त्याग से मिलने वाले सम्मान को प्राप्त करना सिखाया है। "मां की कसक" कहानी में सास का एक नया रूप दिखाया है जो आज के जमाने की जरूरत भी है और समझदारी भी । "छोटी काकी" में पुरुष प्रधान समाज का प्रभाव पड़ने को मिलता है । "लत मोबाइल की" आज का सच है जिसे नकारा नहीं किया जा सकता , अब तो सारी दुनिया इस पर आकर सिमट गई है । पर समय के साथ अपनापन और आदर खोना यह नही होना चाहिए। "पापा का शाल" कहानी को एक लाइन मै समझा जा सकता है की" घुटने पेट की तरफ ही मुड़ते है" यानी हम बड़ों की कितनी ही आदतों को अनदेखा करे पर जब हम भी बड़े होते है तो वो ही करने लग जाते हैं जो हमारे बड़े करते हैं । "अपनों के दिए घाव" ओर "स्वार्थी मां" जैसी काहनी कहीं ना कहीं ये सब हम अपने आस पास होते हुए देखते हैं पर इनको व्यक्तिगत मसला मान कर चुप हो जाते है । "जन्मदिन" पर पिता अपनी बेटी को अपनी हैसियत से ज्यादा कर गुजरने का जज्बा रखते हुए अपना वात्सल्य दिखाता है । "बिना शर्तों का प्यार" बहुत ही जज्बाती और रूहानियत से पूर्ण है । "दूसरी दुनिया" पड़ कर लगा "वाकई" ऐसा हो सकता है , अविश्वसनीय है यह। लेखिका अर्चना तिवारी जी को बधाई और शुभकामनाएं । आप ऐसे ही लिखते रहे । .