भारत के ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी अभियान की नियमित शुरुआत किताबी इतिहासकारों ने 1857 से मानी है और उसे भी राजाओं-नवाबों के निजी असन्तोष और अंग्रेजी फौज में तैनात देसी सिपाहियों की धार्मिक भावना में सीमित कर दिया गया है। बाद में गैर-सांस्थानिक इतिहासकारों ने जहाँ 1857 की देशव्यापी घटनाओं की विधिवत् पड़ताल करके 1857 के जन-विद्रोही चरित्र को उभारा, वहीं पूर्वाधर काल के उन बहुत-सारे छोटे-मोटे महाभारतों का पता भी लगाया, जिनके नायक राजे-नवाब या पेशेवर सैनिक नहीं, बल्कि भीतरी ग्राम्यांचलों के सीधे साफ किसान थे। इन किसान-विद्रोहों की शुरुआत 1857 से बहुत पहले सन् 1767-68 में ही त्रिपुरा के शमशेर गाजी विद्रोह से हो गयी थी, जिसे 'भारत का मुक्ति संग्राम' के लेखक अयोध्या सिंह ने किसानों का संगठित विद्रोह' कहा है। उसके बाद संदीप के विद्रोह (चटगांव-क्षेत्र), अफीम के किसानों के विद्रोह, चकमा विद्रोह, गोरखपुर का विद्रोह (1871-81), रंगपुर विद्रोह आदि के रूप में यह सिलसिला पूरे ब्रिटिश शासन के दौरान, बल्कि स्वतंत्र भारत में भी तेलंगाना, तेभागा, नक्सलबाड़ी किसान विद्रोहों के रूप में जारी रहा।
हाल के वर्षों में भारत के किसान संघर्षों पर काफी काम हुआ है। बांग्ला में सुप्रकाश राव की 'भारतेर कृषक विप्लव', हिन्दी में अयोध्या सिंह की 'भारत का मुक्ति संग्राम' जैसी बहुचर्चित पुस्तकों के अलावा अवध के किसान आन्दोलन पर महेन्द्र कुमार, कपिल कुमार आदि की शोधपरक पुस्तकें भी सामने आ चुकी हैं। किन्तु, 1947 की आज़ादी के तत्काल बाद, एक समय ऐसा था, जब इस विषय पर व्यवस्थित सामग्री न कुछ सी थी। एल. नटराजन की लिखी यह पुस्तक 'भारत के किसान विद्रोह' के दौरान पहले-पहल आयी थी। मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गयी इस पुस्तक का हिन्दी अनुवाद त्रिभुवन नाथ ने किया है।
इस पुस्तक में सन् 1850 1900 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में उभरे जिन प्रमुख किसान विद्रोह के स्वरूप पर प्रकाश डाला गया है वे हैं : संथाल विद्रोह (1855-56), निलहे किसानों की हड़ताल (1859-60), पबना और बोगरा का किसान विद्रोह (1872), मराठा विद्रोह (1875-76) और मोपला विद्रोह (1836-1896) । परिशिष्ट के अन्तर्गत मैसूर के किसान विद्रोह से सम्बन्धित संक्षिप्त सूचनाएँ भी उपलब्ध कराई गयी हैं। जो 1857 की घटनाओं से कोई 25 साल पहले 1931 के दौरान हुआ था। इन्हें लेखक ने यहाँ इस तरह प्रस्तुत किया है, कि भारतीय स्वाधीनता संघर्ष के इतिहास में रुचि रखनेवाले जिज्ञासु, प्रचलित धारणाओं के विपरीत, संघर्ष के वास्तविक चरित्र को समझ सकें।
मैंने हमेशा महसूस किया है कि कांग्रेस नेताओं और दिल्ली केंद्रित लोगों की बात करते हुए हमारा इतिहास प्रशंसा से भरा है।यह पुस्तक छोटी है फिर भी इसमें किसानों विद्रोह के बारे में जानकारी है। किसानों, सेना, नौसेना और महिला स्वतंत्रता सेनानियों को भी श्रेय दिया जाना चाहिए। हम भारतीय प्रलेखन के मामले में थोड़े पिछड़े हुए हैं। हमने इतिहास को मौखिक रूप से याद किया, उन पर लोक गीत बनाए, नाटक बनाए लेकिन उन्हें लेखन में बहुत कम रखा। इतिहास के पन्नों में, भारत की युद्ध की कहानियों और क्रांतियों को 1857 से 1947 तक शामिल किया गया है। इसके बारे में पहले और बाद में क्या हुआ, इसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।
भारत के ब्रिटिश-विरोधी साम्राज्यवादी अभियान की नियमित शुरुआत, 1857 के बाद से पुस्तक इतिहासकारों द्वारा मान्यता प्राप्त है और इसमें राजा की व्यक्तिगत संतुष्टि और अंग्रेजी सेना के मूल सैनिकों की धार्मिक भावनाओं तक सीमित कर दिया है। बाद में, हमारे इतिहासकारों ने भी ब्रिटिश इतिहास की उसी विरासत को जारी रखा है। इस लेखक ने कई छोटे विद्रोहों की खोज की जिनके नायक राजा-नवाब नहीं थे बल्कि भीतरी गाँव के सीधे किसान थे। भारत के किसान विद्रोह एक ब्रिटिश शासन के दौरान विभिन्न राज्यों में समान ऐतिहासिक किसान विद्रोहों का संकलन है। किसान विद्रोह, मराठा और मोपला किसान विद्रोह के बारे में विस्तार से पब्ना और बुगारा को लिखा गया है।