"ये फिल्म अपने आप में आखों की राहत का एक सामां हैं। डायरेक्टर के आसिफ़ ने जिस तरह इस तमाम कारनामे को तसव्वुर करके अंजाम दिया है, वह कमोबेश उसी तरह है जिस तरह एक पेंटिंग बनाना। इसी वजह से मैं इसकी तरफ़ राग़िब हुआ क्योंकि उसका तसव्वुर निहायत हसीन था ... मैं समझता हूँ कि ऐसी फ़िल्म अगर फिर बनाना हो तो के आसिफ़ को ही इस दुनिया में वापस आना होगा। कोई और इस कारनामे को अंजाम नहीं दे सकता।"- मक़बूल फ़िदा हुसैन"एक निर्देशक (के आसिफ़) अपनी बेमिसाल प्रतिभा, कड़ी मेहनत और कल्पना से सिनेमा के बड़े पर्दे पर लाने के लिए ढेर सारे सुंदर और सुनहरे सपने बुनते है। वह अपनी इसी कल्पना, इसी तख़य्युल से एक महल तामीर करता है और अपनी कीमियागरी के हुनर से इस महल कि मिट्टी को अपने खून और अपनी ख़ुश्बू से गूंधकर हक़ीक़त के रंग में रंग देता है। आहिस्ता-आहिस्ता मगर पूरी पुख़्तगी से इसका सपना एक दिन बड़े पर्दे कि सच्चाई बन जाता है। जिस दम यह हक़ीक़त लोगों के सामने ऑटो है तो इसे देखने वाले हर इंसान की सांसें थम सी जाती हैं। उन्हें यूं महसूस होने लगता है मानो किसी जादू से वो सिनेमा हॉल से यक-ब-यक शहंशाह अकबर के दौर में पहुंच गए हैं। ऐसे हसीन और जादूई शाहकार के ख़ालिक़, रचनाकार ने अपने इस बेमिसाल कारनामे को नाम दिया - मुग़ल-ए-आज़म। "-शारूख खान
26 नवम्बर 1950 को भोपाल में जन्मे राजकुमार केसवानी की पहली पहचान एक पत्रकार के रूप में है। 1968 में कॉलेज पहँचते ही यह सफर 'स्पोर्ट्स टाइम्स' के सह-सम्पादक के रूप में शुरू हो गया। पिछले 40 साल के दौरान इधर-उधर भागने की तमाम कोशिशों के बावजूद जहाज़ का पंछी पुनि-पुनि उड़कर इसी जगह लौटता रहा है। इन सालों में छोटे-छोटे स्थानीय अखबारों से लेकर, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय अखबारों, जैसे न्यूयार्क टाइम्स, द इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, संडे, द संडे आब्जर्वर, इंडिया टुडे, आउटलुक, इकॉनामिक एंड पोलिटिकल वीकली, इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, दिनमान, न्यूज़टाइम, ट्रिब्यून, द वीक, द एशियन एज, द इंडिपेंडेंट जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों से विभिन्न रूपों से सम्बद्ध रहे। 1998 से 2003 तक एनडीटीवी के मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ ब्यूरो प्रमुख। फरवरी 2003 से दैनिक भास्कर, इन्दौर संस्करण के सम्पादक। नवम्बर 2004 से भास्कर समूह में ही सम्पादक (मैगज़ीन्स) के पद पर अगस्त 2009 तक कार्यरत। 1984 में विश्व की भीषणतम भोपाल गैस त्रासदी की ढाई वर्ष पहले से लगातार चेतावनी देते रहने के पुरस्कार स्वरूप राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना। इनाम-इकराम मिला, जिनमें श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए भारत का सर्वोच्च पुरस्कार 'बी.डी. गोयनका अवार्ड' (1985) और पर्यावरण पर रिपोर्टिंग के लिए 2010 में प्रतिष्ठित 'प्रेम भाटिया जर्नलिज़्म अवार्ड' भी सम्मिलित है। 2004 में कनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन और व्हाइट पाइन पिक्चर्स द्वारा पत्रकारिता में अवदान को रेखांकित करता वृत्तचित्र 'भोपाल-द सर्च फार जस्टिस' । पेंग्विन द्वारा प्रकाशित 'ब्रेकिंग द बिग स्टोरी' के प्रथम अध्याय के लेखक। 2008 में एशिया के 15 चुनिंदा पत्रकारों में चयन, जिनके लेख छह एशियाई भाषाओं में पुस्तक रूप में कोरिया से प्रकाशित। 'पहल', 'नया ज्ञानोदय', 'कथादेश', 'कादम्बिनी' सहित देश भर की विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में कविता, कहानी प्रकाशन । वर्ष 2006 में पहला कविता संग्रह 'बाकी बचें जो', 2007 में दूसरा संग्रह 'सातवाँ दरवाजा' 2008 में 13वीं शताब्दी के महान सूफी सन्त-कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी की फारसी कविताओं का हिन्दुस्तानी अनुवाद 'जहान-ए-रूमी' प्रकाशित। पिछले पाँच वर्ष से 'दैनिक भास्कर' में संगीत और सिनेमा को समर्पित लोकप्रिय कॉलम 'आपस की बात' लगातार जारी है।
The passion of K Asif is world known. Tons of words have been written on the making of the epic - Mughal E Azam. With the same passion, Rajkumar Keswani has penned this book, having chapters ranging from making, to snippets of biography of everyone - actors and even the technicians associated with the film. Definitely well researched and dedicated work this is. The author is absolutely in love with the movie and K Asif, that shows in his often over-decorated language (which actually feels excess at places). However, I felt the chapters on actual 'making' of the movie are short and don't focus much on technicalities. But as we progress further, and read about each and every actor, every song, every technician and further look into Asif's life - it feels that in such a small canvas, the author has tried his best. Keepsake is the book for hardcore fans of the movie, as it has gorgeous stills and images from and related the movie. (an ad for 'actress wanted to play Anarkali' and much more like this).
Reading this book has actually changed my perception toward the movie (as I never have completed watching it - thinking and comparing it to new-technically superior-ones). Indeed it was an achievement - a superhuman effort making this 65 years back. A must read for film fanatics.
Bahut bahut shukriya is kitab ki likhne ke liye. Kahani us funkaar aur lajawab insan ki jisne khwab dekhe aur use pura karna ka jazba kabiletarif hain.