About The Book गुलज़ार से बातें...'माचिस' के, 'हू-तू' के, 'ख़ुशबू', 'मीरा' और 'आँधी' के बहुरंगी लेकिन सादा गुलज़ार से बातें...फ़िल्मों में अहसास को एक किरदार की तरह उतारनेवाले और गीतों-नज़्मों में ज़िंदगी के जटिल सीधेपन को अपनी विलक्षण उपमाओं और बिम्बों में खोलनेवाले गुलज़ार से उनकी फ़िल्मों, उनकी शायरी, उनकी कहानियों और उस मुअम्मे के बारे में बातें जिसे गुलज़ार कहा जाता है। उनके रहन-सहन, उनके घर, उनकी पसंद-नापसंद और वे इस दुनिया को कैसे देखते हैं और कैसे देखना चाहते हैं, इस पर बातें... यह बातों का एक लम्बा सिलसिला है जो एक मुलायम आबोहवा में हमें समूचे गुलज़ार से रू-ब-रू कराता है। यशवंत व्यास गुलज़ार-तत्त्व के अन्वेषी रहे हैं। वे उस लय को पकड़ पाते हैं जिसमें गुलज़ार रहते और रचते हैं। इस लम्बी बातचीत से आप उनके ही शब्दों में कहें तो 'गुलज़ार से नहाकर' निकलते हैं।
यशवंत व्यास ने अपनी किताब ‘बोसकीयाना’ में गुलज़ार साब के साथ एक लंबी बातचीत को सहेजा है। ‘बोसकी’ गुलज़ार की बेटी हैं, ‘बोसकीयाना’ गुलजार साब का घर, जहाँ वरिष्ठ पत्रकार-संपादक यशवंत व्यास के साथ उनकी कई आत्मीय मुलाक़ाते हुईं, ये किताब उसी संवाद का निष्कर्ष है।
“मैंने गुलज़ार की छुई हुई हर चीज़ में जान देखी है, एक रहस्य सा होता है, बेजान सी लगने वाली चीज़ों की भी कोई आत्मा होती है, रिएक्शन होता है, फ़ीलिंग्स होती हैं, साँस लेती आवाज़ें होती हैं, स्वप्न और सत्य के बीच की रोमांचक अनुभूति होती है, दिल में उतरने की ये ताकत दिल से आई है।”
2020 में राजकमल प्रकाशन से आई यह किताब खास क्यूँ है? किताब पढ़ते हुए मुझे नहीं लगा कि इसका मुख्य उद्देश्य केवल ये जानना था कि गुलज़ार ने गीत के बोल कैसे लिखे होंगे या किसी फ़िल्म की कहानी पर उन्होंने कैसे काम किया होगा? उनके गीत, फ़िल्में, और नज़्मों का संदर्भ इसका हिस्सा ज़रूर रहे, लेकिन किताब का सम्पूर्ण आधार नहीं।
दरअसल, बोसकीयाना ̶ एक लेखक के मन में विचरते स्वच्छंद बादल सरीखी है, मूर्त सवालों से इतर, कवि के सृजन-मन का लेखा-झोखा। यहाँ यशवंत व्यास जी का काम क़ाबिले–ज़िक्र है, जिनकी आत्मीय संगत में गुलज़ार साब ने दिल खोलकर अपना जीवन-परिप्रेक्ष्य (perspective) साझा किया।
यशवंत लिखते हैं ̶ कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जिनके पैर छूओ और घुटने भी, तो पीठ पर हाथ ज़िंदगी-भर महसूस होता है।
इस बातचीत का सिरा भी ‘गुलज़ार और ज़िंदगी के बीच यारी’ से शुरू होता है और यशवंत व्यास उनके दिए हर एक जवाब से अगले सवाल की राह खोजते मिलते हैं ̶ एक कवि होने के मायने, एक लेखक की ज़िंदगी में रचने का अर्थ।
गुलज़ार कहते हैं, “जब तक आप ये ना जानें कि ज़िंदगी आम आदमी के साथ कैसे पेश आती है, आपकी संवेदनशीलता का दायरा बड़ा अधूरा रह जाता है, एकदम संकरा।”
बातचीत आगे बढ़ती है तो फ़िल्मों पर आकर ठहरती है, जो गुलज़ार की सृजन यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा रहीं हैं। यह संवाद किताब का बेहतरीन हिस्सा है, गुलज़ार बताते हैं कि, कैसे फ़िल्म-लेखन का दायरा सिर्फ़ संवेदनाओं और अनुभव में नहीं सिमट जाता। शिल्प, लेखन की एक मजबूत कड़ी है। लिखने से पहले साहित्य की दुनिया से वाक़िफ़ होना कितना अहम है। गुलज़ार इस उम्र में भी कई किताबें एक साथ पढ़ते हैं ̶ अपनी स्टडी में, किताबों से बनी किलेनुमा इमारत के बीच वे ख़ुद को महफ़ूज़ पाते हैं।
अगले पड़ाव पर यशवंत व्यास एक प्रश्न रखते हैं “आपके पिताजी के लिए इकोनोमिकली आर्ट का कोई मतलब नहीं था, फिर क्रिएटिविटी कैसे निकल कर आई?
गुलज़ार ठहरकर कहते हैं, “क्रिएटिविटी तो एक प्रोसेस है, आपकी सेंसिटिविटी की वजह से, झुकाव की वजह से आप अभिव्यक्ति के माध्यम चुनते हैं, फिर बहुत सी चीज़ें साल दर साल आपको ‘मोल्ड’ करती हैं। ….मैं अपनी पहचान चाहता था, अपना मुक़ाम चाहता था। लिखने से बेहतर मुझे कोई काम नहीं लगता था।”
जब गुलज़ार से उस दिन के बारे में पूछा जाता है जब उन्होंने तय किया होगा कि चलो अब लिखकर ही रहेंगे। तो गुलज़ार साब कहते हैं ̶ ‘ये एक ग्रेजुअल प्रोसेस होता है जो चलता रहता है, …वो कठिनाइयाँ जो बचपन की थीं, वो ज़ाहिर है कि कुरेदती हैं ज़ेहन को। मुझे लगता है कि उन्होंने बड़ा अमीर कर दिया’
गुलज़ार साब का दिया हर जबाव, अपने पीछे एक गहरा मौन छोड़ जाता है, जहाँ पाठक की सोच विस्तार पाती है, पाठक अन्तर्मन की ध्वनि का पीछा करता मिलता है।
गुलज़ार जैसी शख़्सियत जब लेखक होने की रूमानियत को निरर्थक समझे, तो एक आईना टूटता है, जैसे कोई हथेली आपको झूठी रोशनी के कुएँ से बाहर खींच रही हो।
जब यशवंत जी उनसे लेखन के लिए ख़ास माहौल और राईटर्स ब्लॉक के बारे में सवाल करते हैं, तो गुलज़ार साब सटीक शब्दों में कहते हैं,
“लेखकों के लिए मेरी राय है कि हम थोड़ा ज़मीन पर चलें, ख़ुद को ज़्यादा सीरियसली ना लें, आप एक लेखक हैं, लेखन आपकी प्रकृति आपका काम है।
...लेखक कलाकार संवेदनशील है, लिहाज़ा उस पर ज़िम्मेदारी ज़्यादा है, पर एड़ियाँ उठाकर चलने की ज़रूरत नहीं है, प्रकृति से लेखक हैं लिखेंगे ही, अपना काम ईमान से कीजिए, लेखक होने का रौब डालना तो ठीक नहीं है। एक प्लम्बर है, उसका भी काम है, सोसाइटी में जैसे उसकी ज़िम्मेदारी है आपकी भी है।”
मैं अक्सर ख़ुद को आर्ट और क्राफ़्ट पर लिखी किताबों के क़रीब पाती हूँ, मेरे लिए इस किताब का हर पृष्ठ एक सम्मोहन रचता है, सृजन-मन एक अदृश्य केंद्र की ओर खिंचता चला जाता है।
गुलज़ार और उनके जीवन को करीब से जानने में यह किताब बहुत मदद करती है। जो अहसास गुलज़ार की फिल्में देखते हुए होता है वही यह किताब पढ़ते हुए आसानी से महसूस किया जा सकता है। अगर यह किताब अभी तक नहीं पढ़ी है, तो बिना सोचे समझे पढ़ने बैठ जाइए।