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Vimal #3
इश्तिहारी मुजरिम
अजीत, नासिर और रश्मि ने मिलाकर एक डकैती की योजना बनाई थी । उनकी सारी योजना, सारी तैयारियां पूरी हो चुकी थीं बस उन्हें एक चौथे साथी की तलाश थी जो ना केवल डकैती की उनकी योजना में उनके काम आता बल्कि जिसे बाद में भी वे काम ला सकते ! और फिर जब उनकी मुलाकात विमल से हुई तो जैसे उनके मन की मुराद पूरी हो गई !
- GenresAudiobook
Audiobook
First published December 1, 1976
About the author
Surender Mohan Pathak
335 books398 followersSurender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
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Community Reviews
Displaying 1 - 8 of 8 reviews
November 25, 2020
Ok it has some nice twists. Especially for its time, 1970s when it was published.
There are certain segments that test your suspension of disbelief, but good yarn
There are certain segments that test your suspension of disbelief, but good yarn
January 20, 2021
“बीबी जी मेरा नाम बनवारी लाल है । मैं एक निहायत मामूली तांगे वाला हूं ।” “तुम्हारी सब बातें कबूल । तुम बनवारीलाल भी हो, मामूली भी हो, तांगे वाले भी हो लेकिन साथ ही वह सब कुछ भी हो जो मैंने तुम्हें कहा है ।” “बीबी जी, आप क्या पहेलियां बुझा रही हैं ?” “अब छोड़ो यह पाखण्ड” - अजीत बेसब्रेपन से बोला - “तुम्हारे से संबंधित कोई ऐसी बात नहीं जिसे हम नहीं जानते । तुम एक हौसलामंद अपराधी हो और जिन्दगी में तुमने जितने भी हाथ मारे हैं, बहुत खतरनाक और तगड़े हाथ मारे हैं, इसीलिए अब तुम्हारी हमारी बहुत तगड़ी पटने वाली है । बम्बई में सर गोकुलदास की नौजवान बीबी से मिलकर उनकी बेशुमार दौलत पर हाथ साफ करने की कोशिश करना कोई छोटी-मोटी बात नहीं । मद्रास में अन्ना स्टेडियम पर डाका डालकर सत्तर लाख रुपये ले उड़ना तो बहुत ही दिल-गुर्दे का काम है हालांकि मैं यह समझ पाने में पूर्णतया असमर्थ हूं कि इतने दिल गुर्दे वाली अपराधी आजकल एक मामूली तांगे वाला क्यों बना हुआ है ।” “साहब” - मैं फिर गिड़गिड़ाता हुआ बोला - “आपको गलतफहमी हुई है । मैं वह आदमी नहीं जो आप मुझे समझ रहे हैं । मैं एक मामूली तांगे वाला हूं और बेहद गरीब आदमी हूं । बाहर खड़ा घोड़ा-तांगा तक मेरा नहीं है, किसी से किराये पर लिया हुआ है । बड़ी मुश्किल से अपना पेट भरता हूं, हजूर । चाहें तो आप अड्डे पर जाकर जिससे मर्जी पूछ लीजिये । गांधी नगर के बनवारीलाल तांगे वाले को हर कोई जानता है । जिसकी आप बात कर रहे हैं, वह जरूर मेरा कोई हम शक्ल होगा । माई बाप मैं बहुत गरीब आदमी हूं । मेरा किसी चोरी डकैती से कोई वास्ता नहीं ।” अजीत की कठोर निगाहें मेरे चेहरे से नहीं हटीं । मैं दीनहीन मुद्रा बनाये उसकी बगल में बैठा रहा । मेरा हाथ आदतन चश्मे की ओर बढा लेकिन मैंने उसे आधे रास्ते से ही वापिस खींच लिया । अजीत तनिक विचलित दिखाई देने लगा । उसने उलझनपूर्ण निगाहों से रश्मि की ओर देखा । “मेरी आंखें धोखा नहीं खा सकतीं” - रश्मि निश्चयपूर्ण स्वर से बोली - “यह वही आदमी है । मैं एक महीने से इसको चैक कर रही हूं ।” अजीत फिर आश्वस्त दिखाई देने लगा । “तुम यह नाटक करना बन्द नहीं करोगे ?” - रश्मि कठोर स्वर से बोली । “क्यों मजाक करती हो, बीबी जी” - मैं गिड़गिड़ाया - “मैं आपको सुरेन्द्रसिंह दिखाई देता हूं ? मैं तो आपकी मदद की खातिर आपका बंडल उठाकर यहां तक लाया और आपने मुझे इस मुसीबत में फंसा दिया । बीबी जी, भगवान कसम, मैं...”
रश्मि एक क्षण हिचकिचाई और फिर बोली - “यूनियन बैंक आफ इंडिया की एक गाड़ी सप्ताह में तीन-चार बार अपनी चांदनी चौक ब्रांच से पार्लियामेंट स्ट्रीट में स्थित रिजर्व बैंक तक रुपया लेकर जाती है । गाड़ी हमेशा दरियागंज, आसिफअली रोड, मिन्टो रोड और कनाट प्लेस होती हुई जाती है । आज तक उसका रूट नहीं बदला है । अगर गाड़ी दिल्ली गेट से दांये घूमने के स्थान पर सीधी आई. टी. ओ. हार्डिंग ब्रिज और सिकन्दरा रोड का रास्ता पकड़े तो आगे दो-तीन विभिन्न रूट संभव हैं लेकिन हमने हमेशा नोट किया है कि गाड़ी रिजर्व बैंक तक हमेशा मिन्टो रोड वाले रास्ते से ही जाती है ।” “खैर, आगे ।” “हमें विश्वस्त सूत्रों से पता लगा है कि 28 सितम्बर को सुबह दस बजे के करीब कम से कम चालीस लाख रुपया यूनियन बैंक, चांदनी चौक से रिजर्व बैंक पार्लियामेंट स्ट्रीट ले जाया जाना है । हमें उस रोज रास्ते में ही बैंक की गाड़ी रोक कर रुपया लूटना है ।” “कहां ?” “इसका फैसला अभी नहीं किया है । अभी हम कई रोज बैंक की गाड़ी की गतिविधि पर निगाह रखेंगे और तभी रूट में कोई उचित स्थान निर्धारित करेंगे ।” “गाड़ियां दो क्यों ?” “एम्बैसेडर केवल डकैती वाले दिन काम में लायी जायेगी ताकि वह कम से कम लोगों की निगाहों में आ सके । डकैती का रिहर्सल और रूट की जांच पड़ताल का सारा काम हम जीप पर करेंगे ।”
किसी को किसी की परवाह नहीं थी । मैं जब सोया था तो मैं अपनी उस शाम की संगिनी हिप्पी बाला से काफी परे हट कर लेटा था । बीच में जब मेरी नींद खुली तो मैंने पाया कि मेरा मुंह उसके अनावृत उरोजों के बीच में धंसा हुआ था । मेरी एक बांह उसकी कमर से लिपटी हुई थी और दूसरी उसके शरीर के नीचे दबी हुई थी । हम दोनों की टांगें एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था पड़ी हुई थीं । उस रात मैंने अपने बहुत से परम्परागत संस्कारों को अपनी आत्मा से धूल की तरह झाड़ कर अलग किया । उस रात मैंने अपनी मिडल क्लास मॉरेलिटी को यूं अपने व्यक्तित्व से अलग किया जैसे वह कोई गन्दी-सी लिजलिजी सी चीज थी जो बरसों से मेरे साथ चिपकी मुझे बेपनाह तकलीफ दे रही थी । उस रात मैं एक नया इनसान बन गया ।
मैंने उसके नाइट गाउन के गिरहबान में हाथ डाला और उसे एक झटके से नीचे की ओर खींचा । एक चर्र की आवाज हुई । नाइट गाउन उसकी कमर से नीचे तक चिरता चला गया । उसने सिसकियां लेते हुए अपनी दोनों बांहें क्रॉस की सूरत में अपने अनावृत वक्ष के गिर्द लपेट लीं । उसने सिर झुका लिया और वह पलंग की पट्टी पर उकडू सी बैठ गयी । “सीधी खड़ी हो जाओ ।” - मैं बोला - “तुम्हारा जिस्म मेरा खूब देखा-भाला और ठोका-बजाया हुआ है । जो चीज तुम पहले अपनी मर्जी से मेरे हवाले कर चुकी हो, अब उसे मुझसे छुपाने का क्या मतलब ?” “विमल” - वह रोती हुई बोली - “मुझ पर रहम करो । भगवान के लिए मुझ पर और जुल्म मत ढाओ ।” “मैं क्यों रहम करूं तुम पर ?” - मैं क्रूर स्वर से बोला - “तुम लोगों ने रहम किया था मुझ पर ? तुम लोगों ने तो मुझे फांसी पर लटकवाने में कसर नहीं छोड़ी थी और मुझे गुमराह रखने में और पुलिस की गिरफ्त में पहुंचाने में सबसे बड़ा रोल तो तुम्हीं ने अदा किया था । आज तुम किस मुंह से मुझसे रहम की उम्मीद कर रही हो ?” “मुझे माफ कर दो ।” “क्यों माफ कर दूं ? मैं कोई साधु सन्यासी या पीर पैगम्बर नहीं जो तुम्हें माफ कर दूं । अपना अहित करने वाले को मैं माफ कैसे कर सकता हूं । मैं तो उसका दस गुणा अहित करना चाहूंगा ।”
रश्मि एक क्षण हिचकिचाई और फिर बोली - “यूनियन बैंक आफ इंडिया की एक गाड़ी सप्ताह में तीन-चार बार अपनी चांदनी चौक ब्रांच से पार्लियामेंट स्ट्रीट में स्थित रिजर्व बैंक तक रुपया लेकर जाती है । गाड़ी हमेशा दरियागंज, आसिफअली रोड, मिन्टो रोड और कनाट प्लेस होती हुई जाती है । आज तक उसका रूट नहीं बदला है । अगर गाड़ी दिल्ली गेट से दांये घूमने के स्थान पर सीधी आई. टी. ओ. हार्डिंग ब्रिज और सिकन्दरा रोड का रास्ता पकड़े तो आगे दो-तीन विभिन्न रूट संभव हैं लेकिन हमने हमेशा नोट किया है कि गाड़ी रिजर्व बैंक तक हमेशा मिन्टो रोड वाले रास्ते से ही जाती है ।” “खैर, आगे ।” “हमें विश्वस्त सूत्रों से पता लगा है कि 28 सितम्बर को सुबह दस बजे के करीब कम से कम चालीस लाख रुपया यूनियन बैंक, चांदनी चौक से रिजर्व बैंक पार्लियामेंट स्ट्रीट ले जाया जाना है । हमें उस रोज रास्ते में ही बैंक की गाड़ी रोक कर रुपया लूटना है ।” “कहां ?” “इसका फैसला अभी नहीं किया है । अभी हम कई रोज बैंक की गाड़ी की गतिविधि पर निगाह रखेंगे और तभी रूट में कोई उचित स्थान निर्धारित करेंगे ।” “गाड़ियां दो क्यों ?” “एम्बैसेडर केवल डकैती वाले दिन काम में लायी जायेगी ताकि वह कम से कम लोगों की निगाहों में आ सके । डकैती का रिहर्सल और रूट की जांच पड़ताल का सारा काम हम जीप पर करेंगे ।”
किसी को किसी की परवाह नहीं थी । मैं जब सोया था तो मैं अपनी उस शाम की संगिनी हिप्पी बाला से काफी परे हट कर लेटा था । बीच में जब मेरी नींद खुली तो मैंने पाया कि मेरा मुंह उसके अनावृत उरोजों के बीच में धंसा हुआ था । मेरी एक बांह उसकी कमर से लिपटी हुई थी और दूसरी उसके शरीर के नीचे दबी हुई थी । हम दोनों की टांगें एक दूसरे से गुत्थम-गुत्था पड़ी हुई थीं । उस रात मैंने अपने बहुत से परम्परागत संस्कारों को अपनी आत्मा से धूल की तरह झाड़ कर अलग किया । उस रात मैंने अपनी मिडल क्लास मॉरेलिटी को यूं अपने व्यक्तित्व से अलग किया जैसे वह कोई गन्दी-सी लिजलिजी सी चीज थी जो बरसों से मेरे साथ चिपकी मुझे बेपनाह तकलीफ दे रही थी । उस रात मैं एक नया इनसान बन गया ।
मैंने उसके नाइट गाउन के गिरहबान में हाथ डाला और उसे एक झटके से नीचे की ओर खींचा । एक चर्र की आवाज हुई । नाइट गाउन उसकी कमर से नीचे तक चिरता चला गया । उसने सिसकियां लेते हुए अपनी दोनों बांहें क्रॉस की सूरत में अपने अनावृत वक्ष के गिर्द लपेट लीं । उसने सिर झुका लिया और वह पलंग की पट्टी पर उकडू सी बैठ गयी । “सीधी खड़ी हो जाओ ।” - मैं बोला - “तुम्हारा जिस्म मेरा खूब देखा-भाला और ठोका-बजाया हुआ है । जो चीज तुम पहले अपनी मर्जी से मेरे हवाले कर चुकी हो, अब उसे मुझसे छुपाने का क्या मतलब ?” “विमल” - वह रोती हुई बोली - “मुझ पर रहम करो । भगवान के लिए मुझ पर और जुल्म मत ढाओ ।” “मैं क्यों रहम करूं तुम पर ?” - मैं क्रूर स्वर से बोला - “तुम लोगों ने रहम किया था मुझ पर ? तुम लोगों ने तो मुझे फांसी पर लटकवाने में कसर नहीं छोड़ी थी और मुझे गुमराह रखने में और पुलिस की गिरफ्त में पहुंचाने में सबसे बड़ा रोल तो तुम्हीं ने अदा किया था । आज तुम किस मुंह से मुझसे रहम की उम्मीद कर रही हो ?” “मुझे माफ कर दो ।” “क्यों माफ कर दूं ? मैं कोई साधु सन्यासी या पीर पैगम्बर नहीं जो तुम्हें माफ कर दूं । अपना अहित करने वाले को मैं माफ कैसे कर सकता हूं । मैं तो उसका दस गुणा अहित करना चाहूंगा ।”
This entire review has been hidden because of spoilers.
December 30, 2021
I listened to the amazingly narrated audiobook from storytel and I must confess that the whole experience of devouring the book got doubled.
3 books done and 41 left to gooo.
I recommend it.
3 books done and 41 left to gooo.
I recommend it.
August 12, 2022
3/5 stars
ज़ब यूनियन बैंक की वन लूटने के बाद विमल पकड़ा गया तो उसने बाकी साथियों का नाम क्यों नहीं किया, ऊपर से पुलिस ने 3rs डिग्री भी यूज़ नहीं किया जबकि सब उसको पहचान भी चुके थे.... फिर अजीत की कोठी पर अटैक करते हुए पैड़ से फंदा लटकाये गुंडों को बेहोश करना कैसे सम्भव था??
क्लाइंमैक्स ने पूरा समाँ ही बाँध दिया, बड़े ही रोचक तरीके से कहानी को अंजाम दिया... अब तो अगला भाग पढ़ने की और भी उत्सुकता बढ़ गई है 🙂🙂🙂
ज़ब यूनियन बैंक की वन लूटने के बाद विमल पकड़ा गया तो उसने बाकी साथियों का नाम क्यों नहीं किया, ऊपर से पुलिस ने 3rs डिग्री भी यूज़ नहीं किया जबकि सब उसको पहचान भी चुके थे.... फिर अजीत की कोठी पर अटैक करते हुए पैड़ से फंदा लटकाये गुंडों को बेहोश करना कैसे सम्भव था??
क्लाइंमैक्स ने पूरा समाँ ही बाँध दिया, बड़े ही रोचक तरीके से कहानी को अंजाम दिया... अब तो अगला भाग पढ़ने की और भी उत्सुकता बढ़ गई है 🙂🙂🙂
May 14, 2022
Page turner book.
Kahani Book 2nd Jitni Damdar nahi hai lekin Aap ko apne sath jodkar rakhegi.
is book k sath Vimal Ka character bhi ab badal rha hai, kahi kahi aesa lgta hai jldi jldi khtm kr diya aur kahi todi boring bhi kahani hai fir bhi aage kya hoga ye janne ki utsukta to bani rahegi
Kahani Book 2nd Jitni Damdar nahi hai lekin Aap ko apne sath jodkar rakhegi.
is book k sath Vimal Ka character bhi ab badal rha hai, kahi kahi aesa lgta hai jldi jldi khtm kr diya aur kahi todi boring bhi kahani hai fir bhi aage kya hoga ye janne ki utsukta to bani rahegi
Want to Read
September 22, 2019It's.very.fine.once.more
April 7, 2014
सरदार सुरेन्द्र सिंह सोहल उर्फ़ विमल कुमार खन्ना, एक दुर्दांत अपराधी, एक कातिल, अपनी खानाबदोश जिन्दगी जीने वाला और स्वयं को पहचान लिए जाने के डर से दिल्ली आकर तांगा चलाने का काम करता है और बन जाता है -"बनवारी लाल तांगेवाला"।
लेकिन दोस्तों, यहाँ भी विमल की बुरी किस्मत उसका पीछा नहीं छोडती। विमल कुछ लोगों द्वारा पहचान लिया जाता है। वे लोग विमल को ब्लैकमेल करके यूनियन बैंक में डकैती डालने को राजी कर लेते हैं।
डकैती सफल रहती है पर विमल के साथी विमल को धोखा देकर, पुलिस से पकडवा देते हैं।
विमल, एक हवालदार की सहायता से, निकल भागता है। विमल को यहाँ एक और बहुरूप मिलता है जो आज तक कायम है - "हिप्पी का रूप"।
तो दोस्तों विमल का अगला कदम क्या होगा - जेल से निकलने और बहुरूप प्राप्त कर लेने के बाद।
क्या वह अपने साथियों को सबक सिखाएगा। क्या वह उनसे अपने हिस्से का पैसा वसूल पायेगा। या विमल की जिन्दगी में ऐसा कोई परिवर्तन आएगा जिससे उसकी खानाबदोश जिन्दगी पर विराम लग जाए।
पढ़िए दोस्तों "इश्तहारी मुजरिम"। सन 1976 के दिसम्बर माह में पहली बार प्रकाशित हुई यह बहुप्रतीक्षित पुस्तक "शानू पॉकेट बुक्स" ने छपी थी।
लेकिन दोस्तों, यहाँ भी विमल की बुरी किस्मत उसका पीछा नहीं छोडती। विमल कुछ लोगों द्वारा पहचान लिया जाता है। वे लोग विमल को ब्लैकमेल करके यूनियन बैंक में डकैती डालने को राजी कर लेते हैं।
डकैती सफल रहती है पर विमल के साथी विमल को धोखा देकर, पुलिस से पकडवा देते हैं।
विमल, एक हवालदार की सहायता से, निकल भागता है। विमल को यहाँ एक और बहुरूप मिलता है जो आज तक कायम है - "हिप्पी का रूप"।
तो दोस्तों विमल का अगला कदम क्या होगा - जेल से निकलने और बहुरूप प्राप्त कर लेने के बाद।
क्या वह अपने साथियों को सबक सिखाएगा। क्या वह उनसे अपने हिस्से का पैसा वसूल पायेगा। या विमल की जिन्दगी में ऐसा कोई परिवर्तन आएगा जिससे उसकी खानाबदोश जिन्दगी पर विराम लग जाए।
पढ़िए दोस्तों "इश्तहारी मुजरिम"। सन 1976 के दिसम्बर माह में पहली बार प्रकाशित हुई यह बहुप्रतीक्षित पुस्तक "शानू पॉकेट बुक्स" ने छपी थी।
August 23, 2013
A great thriller of a book.
Displaying 1 - 8 of 8 reviews








