कभी लगता था कि लंबी यात्राओं के लिए मेरे पैरों को अभी कई और साल का संयम चाहिए। वह एक उम्र होगी जिसमें किसी लंबी यात्रा पर निकला जाएगा। इसलिए अब तक मैं छोटी यात्राओँ ही करता रहा था। यूँ किन्हीं छोटी यात्राओं के बीच मैं भटक गया था और मुझे लगने लगा था कि यह छोटी यात्रा मेरे भटकने की वजह से एक लंबी यात्रा में तब्दील हो सकती है। पर इस उत्सुकता के आते ही अगले मोड़ पर ही मुझे उस यात्रा के अंत का रास्ता मिल जाता और मैं फिर उपन्यास के बजाय एक कहानी लेकर घर आ जाता। हर कहानी, उपन्यास हो जाने का सपना अपने भीतर पाले रहती है। तभी इस महामारी ने सारे बाहर को रोक दिया और सारा भीतर बिखरने लगा। हम तैयार नहीं थे और किसी भी तरह की तैयारी काम नहीं आ रही थी। जब हमारे, एक तरीक़े के इंतज़ार ने दम तोड़ दिया और इस महामारी को हमने जीने का हिस्सा मान लिया तब मैंने ख़ुद को संयम के दरवाज़े के सामने खड़ा पाया। इस बार भटकने के सारे रास्ते बंद थे। इस बार छोटी यात्रा में लंबी यात्रा का छलावा भी नहीं था। इस बार भीतर घने जंगल का विस्तार था और उस जंगल में हिरन के दिखते रहने का सुख था। मैंने बिना झिझके संयम का दरवाज़ा खटखटाया और ‘अंतिमा’ ने अपने खंडहर का दरवाज़ा मेरे लिए खोल दिया।
कश्मीर के बारामूला में पैदा हुए मानव कौल, होशंगाबाद (म.प्र.) में परवरिश के रास्ते पिछले 20 सालों से मुंबई में फ़िल्मी दुनिया, अभिनय, नाट्य-निर्देशन और लेखन का अभिन्न हिस्सा बने हुए हैं। अपने हर नए नाटक से हिंदी रंगमंच की दुनिया को चौंकाने वाले मानव ने अपने ख़ास गद्य के लिए साहित्य-पाठकों के बीच भी उतनी ही विशेष जगह बनाई है। इनकी पिछली दोनों किताबें ‘ठीक तुम्हारे पीछे’ और ‘प्रेम कबूतर’ दैनिक जागरण नीलसन बेस्टसेलर में शामिल हो चुकी हैं।
मानव कौल की अंतिमा को पढ़कर कुछ ऐसा लगा जैसे आप अपने दिमाग में चल रहे विचारों को बस पन्ने पर पढ़ते जा रहे हो, हर वाक्य ऐसा लगता जैसे कि अरे मैं तो यही सोच रही थी , ये लेखक को कैसे पता और कभी एक ईर्ष्या भी पैदा हुई कि काश मैं भी अपने विचारों को ऐसे सहज तरीके से काग़ज़ पर उतार पाती ।
इस उपन्यास के ज़रिए उन्होंने lockdown में घरों में बंद लोगों की मानसिक हालत को तो दर्शाया ही है साथ ही अनेक ऐसे विषयों के बारे में बात की है जो इस कहानी का मुख्य हिस्सा थे भी और नहीं भी , जैसे रोहित के पिता का वो छूटा हुआ कश्मीर और उसके हालात , इस पुरुषप्रधान समाज में औरतों का अस्तित्व , सलीम का उसके मुसलमान होने की वजह से वर्तमान समाज से उपजा डर , बच्चों का उनके माता पिता को पूरी तरह खुश ना कर पाने का guilt या फिर एक लेखक की ज़िन्दगी का दर्शन।
रियलिटी और कल्पना के बीच खोती और मिलती ये कहानी , आपसे सरल शब्दों में बहुत जटिल बातें कह जाती है और आप लगातार अपने आपको अलग अलग किरदारों में देख रहे होते हैं।
इस किताब को पढ़नकर मन किया कि आज सब कुछ लिख दूं जो कभी नहीं लिखा और फिर वही बेचैनी हुई जिससे रोहित पूरी कहानी में लड़ता रहा। मैंने उस छत पर बैठ कविताएं भी लिखी और दरगाह पे हिरण को भी देखा , कभी मुझे भी महसूस हुआ नदी के नीचे फसे रहने जैसी घुटन और उन बंद दरवाजों को कभी ना खोल पाने का डर।
"एक लेखक के कितने डर होते हैं! पर सबसे बड़ा डर होता है कि एक दिन वह अपना सारा लिखा खत्म कर देगा और अकेला हो जाएगा। एक लेखक अपना लिखा खत्म करने के बाद जो खालीपन महसूस करता है, वह उस से कभी सहन नहीं होता।"
क्या एक पाठक के साथ भी ऐसा होता है? किताब अभी आधी भी नहीं पढ़ पाई थी कि एक अजीब सी बेचैनी मन को सताने लगी। दो दिन में करीब सौ पन्ने पढ़ लिए थे। बस दो दिन में किताब पूरी पढ़ ली जाएगी। अपने भीतर एक खालीपन सा लगने लगा। उसी खालीपन ने पढ़ने की गति कुछ कम कर दी। रोहित ने एक कहानी खत्म करते-करते अपने भावी खालीपन से बचने का तरीका ढूंढ लिया- एक नई कहानी। पर मैं तो इसी कहानी में कहीं उलझ कर रह गई। मुझे अपनी जड़ें गहरी करने की आदत है। एक ज़िंदगी से नई ज़िंदगी में प्रवेश करने की कल्पना भी डरा देती है। यह किताब एक पूरी ज़िंदगी के जैसे लगी। लाॅकडाउन की फुर्सतें और दिमाग की उलझनें घर में बंद कुछ महीनों को एक पूरी ज़िंदगी जितना लंबा खींच कर ले गईं। रोहित की तरह नई कहानी नहीं ढूंढ पा रही हूँ मैं। इस कहानी में क्या सच था और क्या कल्पना, क्या सपना था और क्या हकीकत, कौन सच में था और कौन केवल कहानी के लिए गढ़ा गया पात्र था, बस इन्हीं गुत्थियों को सुलझाने में मानव द्वारा रची यह ज़िंदगी बार-बार जीऐ जा रही हूँ। कहानियां लिखते-लिखते मानव उपन्यास तक जा पहुंचे। पर मुझे यह एक कविता जैसा लगा। हर शब्द पढ़ते हुए कविता सुनने का अहसास हुआ। ऐसा लगा मानव खुद कविता सुना रहे हैं। रोहित को पढ़ते हुए मानव की आवाज़ सुनाई दी मुझे। दो सौ पन्नों से लंबी यह कविता आखिर पूरी हो गई कयोंकि,
'कविता असल में पूरी ही तब होती है जब उसको सुनने वाला कविता के भीतर खुद को जीने लगता है।'
आपने कविता सुनाई और मुझे यह ज़िंदगी सी लगी। मैंने इसे जी लिया है और मेरे मन के अन्दर दौड़ते हिरन ने कस्तूरी मिलने जैसा अहसास पा लिया।
एक बात बताऊँ मानव जी? मुझे आपके लिखे में निर्मल वर्मा जी की खुशबू आती है। रोहित को जैसे वो दालचीनी की खुशबू मदहोश कर देती थी, वैसी ही मदहोशी आपकी किताबों में है। आपकी अगली किताब का इन्तज़ार रहेगा।
लेखक जब एक बेंचमार्क सेट कर देता है और फिर उसपर खरा न उतर पाए तो निराशा होती है। मानव के इस उपन्यास ने मुझे निराश किया। आलोचनात्मक हूँ पर मुझे ऐसा लगा कि ये कहानी ऐसे लिखी गई जैसे बस कुछ लिखना था। किताब के पन्ने बढ़ाने के लिए बहुत सी बातों को अनावश्यक दोहराया गया। शब्दों के लच्छे बनाना और बहुत कॉम्प्लिकेटेड लिख देने से उपन्यास बेहतरीन हो जाता है इस विचार से मैं सहमत नहीं हूँ। मानव एक बेहतरीन रचनाकार हैं और मैं उनका बहुत सम्मान करती हूँ पर अंतिमा ने मुझे निराश किया।
Easily the best I've read from him so far. I never wanted this book to ever end!
What starts as a theme from a novel, slowly transforms to a document on the process of writing. Manav ji has poured out his mind and heart in the form of characers in the (not so) fictional story.
More than the absolute command on wordplay, I loved the brutal honesty, added with a perfect dash of abstractness.
The cover felt dry on picking this book, just like that dried leaf. But after finishing the book, the same cover revealed its meaning. Small icons of a deer in front, lizard at the back. That shadow of a face emanating from that leaf. I could smell 'Daalchini' and assume this leaf is of a dalchini plant!
एक वक्त के बाद क्या हम कभी भी यह ठीक से कह सकते हैं कि हम किसी चीज़ से होकर गुज़र रहे थे या वो चीज़ हमसे होकर गुज़र रही थी?
इन दिनों मैंने इस रेखा को धुँधलाते हुए देखा है।
क्या यह कहा जा सकता है पूरे विश्वास से की हम कविता को पढ़ रहे थे?
क्या कविता हमको नहीं पढ़ रही थी?
एक कहानी के भीतर कितनी कहानियाँ बस सकती हैं? यह सवाल एक अंनत जंगल में उसके सारे पेड़ों को गिन लेने की इच्छा रखने जैसा है।
लेकिन सवाल तो एक यह भी है कि कहानी में लेखक की कहानी कितनी होती है? और पाठक की?
और इन सब के बीच फ़िर असल कहानी क्या होती है? वो जो हम पढ़ रहे थे या वो जो हमारे पढ़ने में धीरे धीरे हमारे जीवन में पसर रही थी?
अंतिमा का होना, इसे पढ़ना और फ़िर इसके निशान जहाँ तहाँ अपने जीवन में.. अपनी कहानी में बिखरे हुए पाना.. यह एक अनंत का दूसरे अनंत में रिसने जैसा है। अगर इस अनगिन जाल के एक तार को खींच दिया जाए तो क्या हलचल होगी पूरी कहानी में? और क्या इस हलचल की खबर सभी कहानियों को.. सभी पात्रों को होगी? क्या पात्र सूँघ लेते हैं जाल में तारों का खिंचना कहानी से पहले?
फल के बदले पेड़ हमसे क्या माँगते हैं? क्या कुछ ऐसा है जो हम पेड़ को देते हैं.. जिसे पाकर पेड़ तृप्त होते हैं? ठीक वैसे ही एक कहानी हमसे क्या माँगती है..? हमारा जीवन शायद.. हमारा उसे जीना.. पूरी ईमानदारी में?
मैं फ़िर से अंतिमा के साथ होने का सुख महसूस करना चाहती हूँ। इस वक़्त कितनी ज़रूरत है मुझे अंतिमा की.. और शायद अंतिमा को मेरी।
लेकिन हम हमेशा सुख को ही क्यूँ चुग लेना चाहते हैं हर कहानी से! उसके साथ आए दुःख को हम क्यूँ नहीं अपनाते उसी मुक्तता के साथ?
मैं इस बार दुःख चुगना चाहती हूँ.. उसका इंतेज़ार करना चाहती हूँ कि वो आये और मैं उसे जियूँ अपनी पूरी क्षमता से.. एक मुक्त हँसी की तरह।
"कुछ जंग लगे तालों को कभी नहीं खोलना चाहिए, उनके खुलते ही सुन्दर अतीत के मुरझाए सूरजमुखी ज़ार-ज़ार नज़र आते हैं।" For me, reading a book again is a rare occurrence (thanks to the overflowing pile of unread books) but it's the first time that I re-read a book as soon as I finished it. "सुख की एक ख़ुशबू होती है। उस ख़ुशबू के आते ही पीड़ा के टूटे पड़े बाकी क्षण इस क़दर ज़िंदा हो जाते हैं कि लगने लगता है यह क्षण कितना पराया है जबकि ख़ुशबू कितनी अपनी है। एक दिन भूखे रह जायेंगे कि कल्पना में हम अपने में से पराया निकालना भूल जाते हैं। बाद में हमारी डकारों में देर तक सुख बस्ता रहता है।" Publishing a story interspersed with the process of writing it is a novel experiment. It was interesting to observe the effects of the pandemic on writing process of @manavkaul, & his soliloquies about life in 2020. "क्या हम एक ही कहानी को उसके अलग-अलग पात्र होकर पूरा जीवन जी रहे होते हैं? कोई नयी कहानी भी जीवन में आती है तो उसे हम वही अपने घिसे-पिटे पात्रों को सौंप देते हैं। कितनी आधी जी हुई कहानियाँ और उन कहानियों के टूटे-फूटे पात्रों से हम अपने भीतर पल रहे अकेलेपन को पूरा कर लेना चाहते हैं।" 'Gangadhar hi Shaktimaan hai'! The line between author's reality & his fictional world blurred as the book progressed. Pavan & Dushyant, Antima & Aru - is every one a shadow of the same person? With the revelation at the end, I couldn't help but look again for the various hints & subtle symbolism sprinkled across the narrative. "किसी की मृत्यु पर दुःख असल में धोखे का होता है। हम आवाज़ लगा रहे हैं और दूसरी तरफ उसे सुनने वाला कोई भी नहीं है अब। कोई ऐसे कैसे बीच में उठकर जा सकता है? वह तो अपने हिस्से की कहानी फाड़कर जा चुका था और हम उस फटी हुई कहानी से टपक रहे सन्नाटे में अपनी कहानी की कतरनें बटोरने की असफल कोशिश कर रहे थे।" "सुख जब घट रहा होता है तब उसका स्वाद इतना सख़्त क्यों होता है? उसके बीत जाने के बाद फिर वह चाशनी-सा बूँद-बूँद क्यों टपकता रहता है?" Sometimes you write a character, and sometimes a character rewrites your story. Who directs whom is a question which no writer can answer with confidence.
A heart touching book. Manav Kaul's way of writing has always been so close to my heart that I couldn't resist any of his book for long time. Antima is his first novel. A reader may take some time aligning with the way this story is presented. Beautiful book from the cover and content point of view. Loved it!
The novel is nothing but a journal of a random person. It just contains thoughts of the first person narrator. Already we humans are overloaded with thousands of thoughts everyday. So this novel will give food for your thoughts. (Pun intended)
Considering Manav Kaul's other works, I was a little disappointed with this one. It was his first attempt at a novel and I could see his desire to write a novel become a desperation to write one in this book. Something was amiss in the entire structure. Something seemed incomplete. The content, no doubt was as per his signature style and I loved it like always but I felt his words feel more impactful in his short stories and poems. What I absolutely loved about the novel though was that he bared his mind for his readers to see. He wrote about the writing process in the writing itself and it was a wonderful experience reading it and knowing how art is created.
Manav writes what he experiences, we find ourselves in those experiences. Antima is his best work among the books I've read so far. Highly recommended.
I have been a fan of Manav Kaul's writings since I first read his snippets on instagram and his signature style was present in this novel as well. Sadly, besides that there was not much of anything else that held me to this story. It is difficult to criticise an author you admire so much, but I have to admit that I was disappointed with this one. The idea of including the process of writing with the piece itself is definitely unique but it made the novel too complex to be enjoyable and also left the overall plot somewhat loose. There seemed to be a general lack of direction in the plot with blurry lines between the two narrations and paragraphs that were added just for the sake of it. Additionally, due to the addition of Manav's writing process, he was present in the story perhaps more than he should have. This made all the other characters very surface-level and hard to connect with. I tried hard but couldn't root for any of the characters, neither Varma Madam, nor Rohit or even Dushyant. I would still give this novel 2 stars (or maybe 2.5) for the beautiful poems and lines occuring every now and then that kept me going till the end and his attempt (or I should say courage) to present the story in a unique form that most have not read before. I still look forward to read his other works, probably travelogues or poems as I would be hesitant in picking up his novels again.
"प्रेम की सारी अच्छी-बुरी गलियों को पार करके यह स्थिति आती है, जब दूसरे के छूते ही लगने लगता है कि आप घर आ गए हों।" "अंतिमा" शीर्षक देख कर लगता है इसका केंद्र कोई लड़की होगी जिसके इर्द गिर्द लिखी गई होगी किताब, लेकिन यदि आपने मानव कौल को इससे पहले पढ़ा होगा तो आपको भी पता होगा की यह इतना आसान नहीं होने वाला है।अंतिमा को पढ़ते हुए लगता है कि लेखक कोई उपन्यास लिख रहे है या खुद को ही उतार रहे है शब्दो में मुझे किताब पढ़ते हुए ये भ्रम बना रहा। अंतिमा कहानी है अंतिमा,अरु,पवन खासकर रोहित कि जो कोरोना महामारी के दौरान एक कहानी लिख रहा है अब वो कहानी है या खुद का अतीत लिख रहा है यह आपको पढ़कर पता करना पड़ेगा। लेकिन जब ये कहानी रोहित की है तो फिर अंतिमा कौन है उसकी कहानी का किरदार, उसकी प्रेमिका, उसका अतीत या फिर उसका वर्तमान जिसकी डोर उसके अतीत से जुड़ी हुई है।रोहित व उसके पिता का संवाद और मां से उसके संबध हमे खुद की ही जिंदगी का सार लगता है। जब कहानी का एक किरदार कहता है कि - "तो राजा रानी की कहानियाँ लिखो, अगर सूरजमुखी की कहानी लिखोगे तो उसका मुरझाना भी दर्ज़ करना पड़ेगा।" कितना सच लगता है न। किताब के बीच बीच में कविताओं की चासनी पढ़ने के मिठास को और भी बढ़ा देती है। मानव कौल जी को पढ़ना एक अलग ही किस्म की अनुभूति देता है, किताब बहुत अच्छी है मुझे यकीन है आप इसके बाद मानव सर की दूसरी किताबो को जरूर पढ़ना चाहेंगे।
“जो किताबें मुझे बहुत पसंद हैं, उनका जिक्र मैं कम ही लोगों से करता हूँ। मुझे हमेशा लगता है कि मेरे और मेरी पसंदीदा किताब के बीच एक बहुत ही निजी संबंध बन गया है, उसके बारे में बात करके मैं उस किताब का इस्तेमाल लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए कर रहा हूँ। यह मेरी मूर्खता है, पर यह मेरे भीतर कहीं बह रही होती है, सो मैं अपनी पसंदीदा किताबों के नाम के आगे के सारे संवाद स्थगित रखता हूँ ||” - @manavkaul19 🍂 . This book is one of those books which I will not just keep it for myself but will recommend everyone to read and feel the beauty that it holds within. It is my third book written by Manav Kaul. The small things in life is beautifully described and complemented by the author. Whenever I start reading his books, my thought process totally changes when I finish reading it. His books really have that much intensity. अंतिमा शब्द का अर्थ है - अंतिम: किसी श्रृंखला का आखिरी या निर्णायक हिस्सा. There’s a line in the book which goes like- “तुम मेरे लिखे में अलग-अलग नाम लेकर आती रहोगी। मैं अगर यह अभी नहीं लिखूँगा तो इसके आस-पास के लिखे में तुम हमेशा भटकती रहोगी। मुझे ��से लिखकर ख़त्म करना ही पड़ेगा।” But I would say- “यह एक ऐसी किताब है जिसका अंत नहीं होना चाहिए”🍁 JUST READ THIS BOOK. One of the beautiful books by Manav Kaul.😊
For about an year now I have been yearning for a story, a story with a very specific plot. When I started this book, I was ecstatic & overjoyed! I thought I found it. Further in the reading I discovered, it wasn't to be.. I was disappointed.
Disappointed largely because I still had not found the story I was yearning for, and partly because the book seemed like a regular male protagonist story about his love interests starting from his teenage till deep into his adult life.
And at its core it is that only. A regular guy and the story of his love life. But stating that its all there is in the book would be a cruel injustice!
The narration is extraordinary, there are so many layers, so many characters, metaphors, elements...
The "House cleaning" sequence was in the first half and then no mention of any cleaning after that! Was it deliberate? Does that symbolises the state of mind of the character? Or is it me trying to read too much between the lines?
The lizards, the deer, chai, wine, evening walks, Pawan's backstory.. All these elements are so beautiful used making the story intriguing and enjoyable.
There is this passage in the book, about how we inculcate the same characteristics as our parents, specially there most annoying ones.
I remember saying the exact same thing to a bunch of my friends. And if the timeline of the book is assumed to be accurate, me saying it to my friends and narrator saying it to the readers could well have happened the same day! Does that make me a character in the book? Or was the narrator one of my friends? Now I am talking like the narrator, I should stop!
कुछ भी नया करना कितना कठिन है। फिर चाहे वो गलती ही क्यों न हो।
These lines remind me so much of the infamous dialogue from the movie Her- "Sometimes I think I have felt everything I'm ever gonna feel. And from here on out, I'm not gonna feel anything new. Just lesser versions of what I've already felt."
There is a lot of usage of poetry in the book, most of them was very well placed, some could have been avoided. But the last two poems absolutely stand out for me!
(One of them, at the dargah is from Manav Kaul's other book- Tumhare Baare Mein) Which made me wonder- Is this the real origin story of that poem?
In Tumahre Baare Mein Manav writes- If we know the origin story of a poem, then that poem becomes our own. I suppose that Dargah poem is mine too now.
I absolutely loved the overlapping of the two books. Like in a movie franchise, 2 stories or characters give cameos in eachother's movies. I am on to reading more of Manav Kaul's writings now and look for more such overlapping..
लेखक के लिए - मैंने अभी अभी 'अंतिमा' पढ़ी। उसमें जब दुष्यंत रोहित की कविता को फाड़ देता है जिसमें वो कविता को कविता के जैसे लिखता है, उसी पल मेरे भी जहन में एक कविता आई थी, मैंने पहली बार कोई ऐसी कविता लिखी जो कविता जैसी नहीं थी।
वैसे मैंने आपकी लिखी कई किताबें पढ़ी हैं,और सबको आपकी किताब पढ़ने का सुझाव भी देता हूँ मगर कोई पूछे उस किताब को पढ़ने का कारण तो मैं उन्हें समझा नही पाता। पर जब भी मैं आपका लिखा पढ़ता हूँ तो एक बवंडर सा होता हैं शरीर में या कहूँ कोई कबूतर अंदर फड़फड़ा रहा है अंदर से बाहर आने को जैसे आपने अंतिमा में लिखा था। वो कबूतर शायद मेरे अंदर बसे शब्द हैं जो कागजों पर उतरने के लिए फड़फड़ा रहें हैं। मैं बहुत कुछ बोलना चाहता हूँ , लिखना चाहता हूँ मगर मुझे नही पता की आपका जबाब आयेगा या नहीं। मैंने आपकी पहली किताब जो पढ़ी थी वो थी ' ठीक तुम्हारे पीछे ', फिर "शर्ट का तीसरा बटन", फिर "तुम्हारे बारे में", " रूह" , "अंतिमा", और आज मैंने " तितली " पढ़ना शुरू किया। उसको ही पढ़ने के बाद आपको ये review कर रहा हूँ ।
"अंतिमा", मानव कौल की एक और सुंदर किताब है, जिसकी कहानी "रोहित" के इर्द-गिर्द घूमती है। रोहित, जो पहले कविताएँ लिखा करता था, अब कहानियाँ लिखने की कोशिश कर रहा है। लेकिन उसे यह समझ नहीं आता कि क्या वास्तविक है और क्या सिर्फ कल्पना। वह कभी "अंतिमा" से प्रेम करता था, लेकिन अपनी ज़िंदगी का एक भुला हुआ पन्ना बनने के बाद वह फिर से उसकी ज़िंदगी में लौट आई है। अब वह समझ नहीं पा रहा कि क्या वह सचमुच उससे मिल रही है या यह सिर्फ उसकी अनेक कल्पनाओं में से एक है। जिससे भी वह मिलता है या जुड़ता है, उसके मन में संदेह पैदा हो जाता है। इसके साथ ही, वह लगातार अपने पिता के साथ अपने रिश्ते को सुधारने के लिए भी संघर्ष कर रहा है। कहानी का एक और महत्वपूर्ण पात्र है "वर्मा मैडम", जो उसके जीवन के दूर के अतीत से जुड़ी हैं, लेकिन वर्तमान में उस पर गहरा प्रभाव डाल रही हैं। कहानी बहुत ही खूबसूरती से बुनी गई है और मुझे शुरू से अंत तक बाँधे रखी। हमेशा की तरह पंक्तियाँ इतनी सुंदर और गहन अर्थ से भरी हुई हैं कि मैं किताब को नीचे नहीं रख पाया। मैं कहूँगा कि यह "मानव कौल" की एक और शानदार कृति है।
मुझे अक्सर मानव कौल की कहानियों में कविता-सी मिठास दिखती है जो हल्के-हल्के छीटों के तौर पर चारों ओर छिड़क दिए गए होते हैं और आप उसे सूंघ रहे होते हैं। अंतिमा, उनका पहला उपन्यास, उसी दालचीनी की खुश्बू के साथ पढ़ी जा सकती है जिसका ज़िक्र लेखक ने इसी उपन्यास में किया है। कहानी के ओर-छोर पर उसके किरदारों के साथ टहलते हुए हम कब उसके साथ जीना सीख जाते हैं हमें पता ही नहीं चलता। ये उपन्यास सच और कल्पना के बीच में जो महीन रेखा होती है शायद हमें वहाँ से सबकुछ देखने के लिए कहती है और हम दोनों तरफ के कथाकारों और किरदारों से अभिभूत हो रहे होते हैं। यहाँ एक ख़ास बात यह है कि मानव कौल जी इतनी विभ्रान्तियों और यथार्थ के बीच के अंतर सरलता से बोल पाते हैं।
Not a review just a little Manav Kaul appreciation post.
Manav Kaul is one of the very few writers about whom I feel that I loose words when I write about his books. But there is a constant feeling and ever existing question whenever I read anything written by him that how can a man write about his own experience and be so relatable? How this man got abilities to make you visit far corners of the world by just reading what he has written? How did he get that third eye to perceive the everyday mundane life from a radically different point of view?
Antima padhna hai jaise lekhak Manav Kaul se unke upnyas aur unke baare m gehri baatcheet karna. Kuch jagah kuch jyada hi 'in the face hints' deke unhone khudke hi paathako ko kam aanka hai. Shayad kuch jagaho pe sab kuch na keh jaane ki jagah direct callback chhupane ki zarurat thi.
Barhaal Unka padha hamesha dil ko hi chhuta aur vakya aisa jaise kisi kavita se nikaale gaye ho jo ab Manav ji likhna pasand nahi. Unki kavitayein shayad aisi chhupi taur pe hi dikhegi aur milegi. Unke dimaag m unke saath rah ke ye hafta achha beeta. Dhanyavad
मानव का लेखन बहुत ही उत्तम है। उनका लिखा हुआ आपके जहन में घर कर जाता है। पता नही कैसे वो दर्द को अपनी किताबों के माध्यम से महसूस करा देते है जो की बहुत मुश्किल काम है। उनकी कहानी आपको छू जाती है। अंतिमा बहुत ही अच्छा उपन्यास है बहुत अच्छा लिखा गया है। मैं जब भी उनकी किताब पड़ता हूं लगता है की कैसे वो इतना न्याय कर लेते है अपनी हर एक कहानी से। यही बात इनको दूसरे लेखकों से अलग करती है। उनकी लिखी बहुत गहरी है। ऐसा लगता है की वो किताब की असफलता और सफलता की बीच अपने लिए लिख रहे हैं। मुझे यह किताब बहुत पसंद आई। लिखावट मैं कई तरह को लेयर्स हैं और आपको किताब पूरी करनी पड़ेगी सब कुछ समझने के लिए।
किताब अच्छी लगी| पर उतनी नहीं जितनी मुझे ‘तुम्हारे बारे में’ लगी थी। एक वक्त के बाद वर्मा मैडम, दुष्य���त, और रोहित के किरदार थोड़े उबाऊ और सतही लगने लगे थे| खासतौर पर तब जब वर्मा मैडम कल्पना में आकर लैपटॉप पर कहानी लिखने लगती हैं। फिर भी, मानव के शब्द बेहद खूबसूरत हैं। कहानी में कहानी होना, अंत में अगली कहानी की झलक छोड़ना, और साथ में ऐसी एक्सपेरिमेंटल किताब लिखना सचमुच कमेंडेबल है। ओवरऑल ३.५ स्टार|
लेखक जो लिखता है उस जी भी रहा होता है? अगर ऐसा होता है तो जो वो लिख रहा है वो कहानी कहलाएगी या सच? ऐसे ही प्रश्नों का जवाब मानव कौल अपने इस उपन्यास में ढूंढते हैं। अपने पात्रों को लिखने से पहले उनकी इजाजत मांगते हैं। सच और कल्पना के बीच लड़ाई लड़ते हैं। मानव कौल का लेखन इतना प्रभावी और रियलिस्टिक होता है की उसे कहानी या कविता की संज्ञा देना मुश्किल हो जाता है।
Another beautiful read by ManavKaul . He introduces a poem by Bokhrez that says, "After a while you learn... That even sunshine burns if you get too much. So plant your garden and decorate your own soul, Instead of waiting for someone to bring you flowers." This book might seem relatable to many of the pandemic corporate job survivors.
उत्तम... अद्भुत उपन्यास । मानव कौल हमें एक अलग ही दुनिया मे लेकर जाते है जहाँ emotions के कई layers है.... कहानी में कहानी है। लोकडाउन के दौरान लिखे गए इस उपन्यास को हम सरलता से relate कर सकते है... इसे ज़रूर पढ़े।
बेहद आश्चर्य होता है ये देख के कि कोई इतनी सरलता से वो सारी बातें शब्दो में कैसे गढ़ लेता है जो बस आप सोच ही रहे थे। कहानी लिखनी की प्रक्रिया भी अजीब है, कभी कभी कहानी से भी दिलचस्प। @manavkaul की ये किताब रात रानी की उस खुश्बू की तालाश में, ज़रूर पढें! @hind.yugm
I just love the way, Manav has written and I am a big fan of his writing, the way he presents every minute details of the surrounding is just fascinating. My words cannot express the beauty of this book. Go read this piece which is based on the journey which was undertaken during this lockdown.