राम कमलानी खूब रुतबे वाला, समाज के उच्च वर्ग का एक आधारस्तंभ था । अपने इस ऊंचे रुतबे को हासिल करने के लिये उसने क्या अपने कर्मचारी, साथी, परिवार या प्रतिद्वंद्वी हर किसी की पीठ में छुरा भोंका था, हर किसी का गला काटा था । छोटे आदमी की जात से नफरत करना, उनको दुत्कारना, जलील करना वह अपना धर्म समझता था । ऐसे आदमी - जिसने जीवन में सिर्फ दुश्मन ही बनाये थे - की लाश जब उसके घर में पड़ी पायी गई तो किसी को कोई ताज्जुब ना हुआ ।
Surender Mohan Pathak, is an author of Hindi-language crime fiction with 314 books to his credit. His major characters are Crime reporter Sunil (unprecedented 123 Titles), Vimal (46 Titles) and Philosopher Detective Sudhir (23 titles). Apart from series, he has written 60+ Novels in thriller category.
सुनील कुमार चक्रवर्ती आपनी आदतों से मजबूर एक बार फिर मुसीबतजदा हसीना को बचाने के लिए क़त्ल के इलज़ाम में गिरफ्तार होते होते बचा।
एक उद्योगपति के क़त्ल की साजिश में उसकी शिरकत तब बनी जब वह उस उद्योगपति द्वारा दी जा रही पार्टी में सम्मिलित हुआ था।
जिस रिवाल्वर से क़त्ल हुआ था उस पर सुनील के उँगलियों के निशान थे। वह मौकाए-वारदात पर मौजूद देखा गया था। उसके पास क़त्ल के समय की कोई एलिबाई नहीं थी। उसे वारदात के वक़्त में घटी घटनाओं की कतई भी याद नहीं था।
पुलिस को शक उद्योगपति के छोटे बेटे पर था जो वारदात के बाद से ही फरार था।
सुनील के शक के घेरे में कई लोग थे मसलन उद्योगपति की दोनों लड़कियां, उसकी अपंग बीवी, उसके दोनों लड़के। साथ ही कुछ ऐसे लोग भी जिनका सम्बन्ध एक अलग ही रूप से इस वारदात के साथ जुड़ा था।
क्या सुनील अपनी पर बन आये "जान के खतरे" को हटा पाया। क्या सुनील इस अनोखी मर्डर मिस्ट्री को हल कर पाया जिसमे स्वयं वह शक के दायरे में था। क्या अपनी आदतों से मजबूर मुसीबतजदा हसीनाओं की सहायता करने का फल उसे कड़वा मिल सकता है।
पढ़िए रहस्य और रोमांच की तेज़ तर्रार गाथा-हम सब के प्रिय- सुनील और प्रभुदयाल के टक्करों से भरपूर- पाठक साहब का सन 1977 के दिसम्बर में छपा उपन्यास - "जान का खतरा"।
एक ऐसे कथानक को पढेंगे आप जिसमे स्वयं कथानायक अपने आप को फंसा पाता है।