उसके निचले होठ पर अपने दाँतों के निशान बनाते हुए बड़ा ही मज़ा आ रहा था. उसकी की छातिया मेरे बोझ तले दबे हुई जा रही थी. उसने अपनी दोनो टाँगे मेरी कमर के इर्द-गिर्द लपेट दी और हम दोनो एक दूजे मे समाए हुए उन पलों का मज़ा लूटने लगे थे.तभी अचानक उसने मुझे नीचे पलट दिया.उसकी वासना भरी आंखों में अब गुस्सा भर गया था.उसने मेरा गला दबा दिया और हाथ मे छुपाया चाकू मेरे छाती में गाड़ दिया.शरीर मे दर्द की लहर दौड़ती चली गयी.वो चिल्लाने लगी .... तुम्हारा बाप कोई साधुसंत नही था. बल्कि एक नंबर का ऐय्याश था. ना जाने गाँव की कितनी औरतो को उसने अपने नशे और गुरूर के नीचे कुचल दिया था. . हवस के नशे मे चूर उस शैतान ने इसी हवेली मे मेरी अस्मत का शिकार किया. पूरी हवेली मे मेरी चीख गूँजती रही पर किसी ने भी मेरी मदद नही की.