यह रुचिकर गद्य की पोथी है। इसमें सुंदर और आत्मीय गद्य है और वाक्यों में पद्य सरीखा संगीत और अन्विति चली आई है, इसलिए ये गद्यांश ज्यूँ गद्यगीत सरीखे बन पड़े हैं। ललित गद्य और रम्य रचना, वृत्तान्त और आख्यान, निबंध और स्फुट-चेष्टा के नानारूपों में इनकी नित्य-गति है। यह अंत:प्रक्रियाओं की आत्मविभोर पुस्तक है। इसमें सौष्ठव है, परिष्कार है और निष्ठा भी। कल्पतरु शीर्षक इसलिए कि जैसे कल्पवृक्ष से जो मांगो मिलता है, इस पुस्तक में भी- लेखक का अभिमत है- वो महत्तम वरदान हैं जो भाषा में उससे अपने सुधी पाठकों के लिए सम्भव हो सकते थे। कह लीजिये कि यहाँ वृत्तान्तकार एक वृक्ष बन गया है! कल्पतरु का रचना-संसार विपुल और वैविध्यपूर्ण है। इसमें सागौन और मेपल के पत्तों, मरी तितलियों और भोर के पाखियों, धुले वस्त्रों और जूठे बरतनों, दुःख की व्याख्याओं और सुंदरताओं के रूपों, पिता की कविताओं और मां के प्रेम-पत्रों, फ़िल्मों और चित्रों, संगीत और चुप्पियों, एकान्त और संलग्नताओं तक फैला एक आत्मीय परिसर है, जिसमें साहित्य-विनोद की अनेक लीलाभूमियां सृजित हुई हैं। अच्छे गद्य के अनुरागियों के लिए तो यह उपहार से कम नहीं!