बच्चे को जन्म देते समय 206 हड्डियों के टूटने का दर्द सह लेने वाली औरत एक नाजुक ख्याल दरकने की पीड़ा क्यों बर्दाश्त नहीं कर पाती है? क्या रिश्ते निभाने का अर्थ रूहानी न होकर उम्मीदों और दुनियादारी की जिम्मेदारी का सही गणितीय संतुलन है? ऐसे आदिम सवालों के जवाब तलाशने धनिका, प्रेमा, अर्चना, br>-संजय और वासु के जीवन सफर पर चलिए ‘धनिका’ के साथ। ‘धनिका’ कहानी उन रिश्तों की जो रह-रहकर पिछले 17 साल से मेरे जेहन में ख़दबद मचाए थे। उन चेहरों की जिन्हें मैं आखिरी साँस तक नहीं भूल सकती। उन त्रासदियाँ की जिनकी नमी पलकों से आजीवन विदा नहीं ले सकती। उन्हें सांत्वना देने, दुलार भर थपकने की कोशिश है—धनिका। दो साल पहले जब इसे लिखना शुरू किया था तो आधी-आधी रात तक बरसों पहले गुजर चुके वे आत्मीय पल, वो हृदय विदारक हाद
मैने कही पढ़ा था की स्त्री को जानने के लिए आपको स्त्री होना पड़ेगा कि वह कितने सुख दुख को खुद के भीतर समेटे हुए है। इस बात का काफी हद तक मतलब मैने "धनिका" किताब को पढ़कर जाना।
हमारे भारतीय समाज में स्त्री होना कभी भी आसान नहीं रहा है, वो हमेशा से समाज को कभी मां के रूप में कभी बहन के रूप में, तो कभी बीबी के रूप में अपना प्यार, अपना सर्वस्व न्यौछावर करती आई है। अपनी कितनी ही इच्छाओं को अपने पति, बच्चो के लिए कुर्बान कर दिया। शायद इसलिए ही औरत को ममता और त्याग की देवी कहा गया है।
कुछ ऐसे ही औरतों की कहानी बयां करती है ये उपन्यास। धनिका जो घर में बच्चो में सबसे बड़ी है उसकी तीन छोटी बहने अर्चना, श्रद्धा और प्रेमा है और सबसे छोटा भाई धनंजय। चार लड़कियों के होने का कारण लड़के की इच्छा थी। पिताजी सरकारी कलर्क थे कमाई सीमित थी और लड़कियां चार। मां को हमेशा लड़कियों की शादी की चिंता लगी रहती इस कारण से कब मां की और लड़कियों की छोटी छोटी इच्छाओं ने दम तोड दिया किसी को पता नही चला।
धनिका का वैवाहिक जीवन उसकी कोख के सूनेपन से बिगड़ जाता है वही पर अर्चना जो पड़ोस के लड़के से मिले धोखा के कारण से टूट जाती है लेकिन परिवार के इज्जत के चलते शादी के बंधन में बंध जाती है। सबसे छोटी प्रेमा जो बचपन से चंचल रहती है और घर में उसका दुलार ज्यादा होता है क्युकी उसके बाद लड़के का जन्म हुआ होता है, की जिंदगी तब बदल जाती है जब उसका लगाव उसके जीजा संजय से हो जाता है। अब धनिका का क्या होता है अपनी ही बहन को सौतन के रूप में पाकर वो क्या करती है जैसे सवालों का जवाब आपको किताब पढ़कर निकालना होगा।
किताब बहुत ही खूबसूरती के साथ लिखा गया है जो हमारे समाज के स्त्रियों की स्तिथि और उनके पक्ष को हमारे सामने रखती है। ये किताब चार बहनों और उनकी मां के द्वारा स्त्री और उसके अन्तर्मन को जानने में बहुत मदद करती है। इन 5 स्त्रियों के द्वारा लगता है कि हम उन सभी भारतीय नारी को पढ़ रहे है जो परिवार और समाज के बीच में फसकर न जाने अपनी कितनी ही इच्छाओं का गला घोट दे रही है, फिर वो चाहे पढ़ाई हो, अपने मन के लड़के से शादी हो या फिर बिना किसी के डर से कही आने - जाने की आजादी।
यदि आप नारी जीवन पर लिखा कुछ अच्छा पढ़ना चाहते है साथ ही अपने आस पास के समाज को एक स्त्री के नजर से देखना चाहते है तब आप इस किताब को जरूर पढ़े।