स्वतंत्र भारत में कुछ अर्थों में धर्म, संस्कृति, और शिक्षा की स्थिति बिगड़ी है। आम शिक्षित जनों में भारतीय धर्म, साहित्य और संस्कृति के प्रति चेतना और जानकारी भी पिछली पीढ़ियों की तुलना में कम हुई है। इतिहास और समाज के बारे में कुछ गंभीर बिन्दुओं पर मिथ्या विचारों, हानिकर मतवादों का फैलाव भी हुआ है। लोगों के बीच धर्म और दर्शन के प्रति एक हल्केपन की प्रवृत्ति भी बढ़ी प्रतीत होती हैं, यद्यपि इसके प्रतिकार के प्रयत्न भी हो रहे हैं। इस सांस्कृतिक गिरावट में देश में प्रभावशाली कई राजनीतिक धाराओं ने जाने-अनजाने, सक्रिय और निष्क्रिय रूप से सहयोग दिया है। विशेषतः शिक्षा और भाषा के क्षेत्र में तो दलीयता और राजनीतिकरण ने ही अधिक हानि की। इन सब के हानिकर परिणामों, प्रभावों की चर्चा बौद्धिक जगत में कम ही हुई है। बल्कि कुछ हानिकारक परिवर्तनों को उलटे उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस पुस्तक में, भारतीय इतिहास, धर्म, संस्कृति और राजनीति के कुछ गंभीर प्रसंगों और विषयों पर ‘हिन्दू दृष्टि’ से विचार किया गया है। यह पुस्तक कोरी अकादमिक या तटस्थ दृष्टि से नहीं लिखी गई है। यह हिन्दू दृष्टिकोण इस पुस्तक की एक विशेषता है। सभी अध्यायों में अधिकांश बातों को प्रमाणित संदर्भों के साथ रखा गया है। इससे पाठक उनकी जाँच-परख कर सकते हैं। साथ ही, किसी बिन्दु पर विस्तृत अध्ययन करने के लिए भी सहायता पा सकते हैं।