जब इंसान अंदर से टूटता है तो वो अपनी बात समझाने के तरीके ढूँढने लगता है । और जब अंदर भावनाओं का ज्वार उठ रहा हो और सुनने वाला कोई न हो, तो वो खुद के लिए फैसलें लेता है । बेशक वो समाज की मान्यताओं में सही न हो लेकिन वो फिर भी अपने हक़ में फैसलें लेता है । यह कहानी है जागी आँखों से देखें जाने वाले सपनों की, उन अहसासों की, जिन्हें हम जीना चाहते हैं लेकिन जी नहीं पाते । उन अहसासों की जो जन्म तो लेते हैं लेकिन कुछ समय बाद सिकुड़ जातें हैं । यह कहानी है भावनाओं से भरे 6 लोगों की, जिनमें प्यार, विश्वास, अपनापन तो है लेकिन एक-दूसरे को आज़ादी देने की हिम्मत नहीं है । किसी की एक गलती उन सभी की जिंदगी को उस मोड़ तक ले जाती है, जहाँ से कुछ भी ठीक कर पाना न नहीं था । दखल किसने, किसकी जिंदगी में दिया था, कह पाना मुश्किल है । नादानी, नासमझी या अपरिपक्वता, चाहे जो भी नाम दें लेकिन सवाल तो बस आज़ादी से ही जुड़ा था ।
स्वार्थ, प्रेम, भावावेश, अधिकार, अपेक्षा, ईर्ष्या, विश्वासघात, चिन्ता और हताशा से भरा ये उपन्यास आपका भरपूर मनोरंजन करेगा। किन्तु, अन्त में वो ही सूनापन आपके अन्दर भर देगा जिसके साथ इसके सभी चरित्र आप से विदा लेते हैं। अनेक प्रकार के आकर्षक एवं चतुर तर्क-वितर्कों से भरी ये कथा अन्त में सिद्ध कर देती है कि अन्य को मूर्ख समझने वाला कैसे स्वयं को गर्त में धकेलता है।
कुछ बातें या घटनाएँ एक-दूसरे से तारतम्य नहीं बना पाती हैं, जैसे कि निर्मय स्कूल से ही गायत्री को जनता था या निवेदिता ने उन्हें बाद में मिलवाया था और प्रियल कैसे फिर से विक्रम की प्रति आकर्षित हुई।
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अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जीने की तड़प दिखाती है ये कहानी। मगर रिश्तो में तो जवाबदेही बनती ही हैं। हर रिश्ता कहीं ना कहीं बंधन ही है, भले ही अच्छा हो या बुरा। रिश्ते में बंधे हैं तो उसकी मर्यादाएं भी निभानी होंगी वरना वही हाल हो सकता है जो इस कहानी के नायक निर्मय का हुआ। 5 किरदारों की इस कहानी ने ऐसा उलझाया कि अपने आसपास के लोगों पर ही शक सा होने लगा। कहानी बेहद कसी हुई है, इंटरेस्टिंग है, तेजी से भागती है और आपको बार-बार चौकाती है। कहानी के नायक से सहानुभूति भी होती है और उस पर गुस्सा भी आता है। कुल मिलाकर इसे पढ़ना एक अच्छा अनुभव रहा।