कृष्ण बलदेव वैद पुरस्कार से सम्मानित, 2016.***शाम एक स्कूली छात्र है जो सपने देखता है । उसकी समस्या केवल यह है कि वह जानना चाहता है कि वह जिस दुनिया में बसा है, उसका क्या मतलब है? उसका दोस्त शान उसकी इस यात्रा का साथी है । वे शहर के बाहर बसे अपने पहाड़ी गाँव की गलियों और बाहरी इलाकों में भटकते रहते हैं । पुस्तकों या लोगों के माध्यम से उनके पास जो भी जानकारी उपलब्ध है, वे उसे बड़े चाव से बीनते हैं । इस जानकारी से अजीबो-ग़रीब पैटर्न बना कर वे अपनी वास्तविकता पर नियंत्रण पाने के लिए योजना बनाते हैं। उनका परिवार व गाँव के अन्य लोग उनकी इस योजना के पात्र बन जाते हैं और अपनी वास्तविकता में दरारें प्रकट करना शुरू कर देते हैं। विज्ञान, दर्शन, परियों की कहानियां, लोक-किंवदंतियां और इतिहास के अंश उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाते हैं । शाम और शान अपनी इस कल्पना की दुनिया में छटपटाते रहते हैं ।***पुस्तक की प्रशंसा:विलक्षण कोटि का कलात्मक अनुभव। हर मायने से एक खूबसूरत किताब। – कृष्ण बलदेव वैद ***'कालजयी कमबख्त' एक सिने-उपन्यास है। यह सुनने व पढ़ने के लिए ही नहीं बल्कि देखने के लिए भी है। अमित का उपन्यास नये ढंग से लिखने का रास्ता खोल रहा है। सिर्फ अपने लिखने के ढंग में ही नहीं, भाषा के विशेष इस्तेमाल में भी। इस उपन्यास को ठहर कर पढ़ना होगा यानि देखना होगा जिससे हम अपने अन्तस के गुम प्रश्नों को खोजकर सामने लाकर उनका सामना कर सकें। और यह करते समय आनन्द में डूबे रह सकें।– उदयन वाजपेयी, कवि, लेखक***Amit Dutta's "Kaljayi Kambakht" is a book like none other in Hindi literature. A bildungsroman of sorts, it plunges you into the strange and unsettling world of its youthful protagonist and holds you there until you cannot breathe, a world of magic and danger, by turns prosaic and poetic, mythic and oneiric, that unfolds like a fevered dream as one startling image follows another with the logic and inexorability of dreams. – Rahul Soni, Author, Literary critic, Editor, Harper Collins.***लेखक के बारे में: अमित दत्ता अमित दत्ता ने कला, इतिहास और सिनेमा माध्यम की वैकल्पिक संभावनाओं को लेकर कई फ़िल्में बनायी हैं जिनमें क्रमश:, नैनसुख, चित्रशाला, गीतगोविन्द, पूर्ण/अपूर्ण, आदमी की औरत एवं अन्य कहानियाँ, सातवीं सैर और अज्ञात शिल्पी प्रमुख हैं । पुणे के भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान से फ़िल्म निर्देशन में स्नातक । कुछ वर्ष नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिज़ाइन, अहमदाबाद व भारतीय फ़िल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे में अध्यापन । 2015-17 में इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस स्टडीज़ (शिमला) में टैगोर फैलो रह कर गोंड-प्रधान चित्रकार जनगढ़ सिंह श्याम पर ‘इन्विज़िबल वेब्ज़’ नामक एक पुस्तक पर कार्य किया । फ़िल्मों को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार व सम्मान मिले हैं जिनमें चार राष्ट्रीय पुरस्कार, बिलबाओ-स्पेन व मुंबई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव में स्वर्ण व वेनिस फ़िल्म फ़ेस्टीयवल में ज्यूरी का विशिष्ट पुरस्कार शामिल हैं । 2007 में इन्हें जर्मनी के ऊबरहायुज़ेन फ़िल्म समारोह में अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म आलोचकों की फेडरेशन की तरफ़ से FIPRESCI अवॉर्ड से सम्मानित किया गया । फ़िल्में अनेक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों और कला संग्रहालयों में दिखायी जाती रही हैं । फ़िल्मों के पुनरावलोकी समारोह ऊबरहायुज़ेन (जर्मनी), लुगानो स्विट्ज़रलैंड), पोम्पेदु सेंटर (पेरिस), बर्क्ली म्यूज़ियम (कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय) व राष्ट्रीय फ़िल्म संग्रहालय (पुणे) जैसे स्थानों पर आयोजित किए जा चुके हैं । प्रयोगात्मक हिंदी लेखन के लिए 2016 में कृष्ण बलदेव वैद फ़ेलोशिप सम्मान ।*** 978-81-946920-0-3. First Electronic Edition published by Matra October, 2020,160 pages.