‘सूखा बरगद’ मंजूर एहतेशाम का ऐसा उपन्यास है जिसने उपन्यास-जगत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए एक हलचल पैदा की। क्योंकि यह उपन्यास, महज़ उपन्यास ही नहीं, भारतीय मुस्लिम समाज की मुकम्मिल तस्वीर भी है। वर्तमान मुस्लिम समाज के अन्तर्विरोधों की गम्भीर पड़ताल की वजह से ही यह उपन्यास काल-सीमा को लाँघता प्रतीत हुआ और उपन्यासकार मंजूर एहतेशाम का नाम राही मासूम राजा और शानी सरीखे चर्चित लेखकों की श्रेणी में शूमार किया जाने लगा। ‘सूखा बरगद’ में मुस्लिम समाज में व्याप्त अशिक्षा, अन्धविश्वास, सामाजिक रूढ़ियों और विडम्बनाओं का अद्भुत चित्रण है। मंजूर एहतेशाम ने ‘सूखा बरगद’ में मुस्लिम-समाज के विकास से जुड़े जिन संवेदनशील गतिरोधों को स्पर्श किया है उनकी चर्चा से भी आमतौर पर लोग घबराते हैं। धर्म, जातीयता, क्षेत्रीयता, भाषा और साम्प्रदायिकता के जो सवाल, आज़ादी के बाद इस मुल्क में पैदा हुए हैं, उनकी असहनीय आँच इस समूची कथाकृति में महसूस की जा सकती है। इस उपन्यास में ये सवाल ‘सूखा बरगद’ की झूलती हुई जड़ों की मानिन्द फैले हुए हैं जिसके नीचे न तो कोई कौम पनप सकता है और न खुशहाली की कल्पना हो सकती है। इन सवालों का जवाब समाज के शोषित, पीड़ित, अपमानित और लांक्षित लोग ही हैं जो आज भी अपना वजूद बनाए हुए हैं! यह उपन्यास सामाजिक विकास के अत्यन्त संवेदनशील गतिरोधों को सिर्फ़ छूता ही नहीं, अस्तित्व और उम्मीद के सन्दर्भ में गहरी छानबीन भी करता है।
Manzoor Ehtesham is an Indian writer of Hindi literature known for his depiction of the lives of the Indian Muslim community in the independent India. Ehtesham was born in 1948 in Bhopal, in the Indian state of Madhya Pradesh and did his studies at the Aligarh Muslim University. He is the author of five novels and several short story anthologies and plays.
One of the best examples of "Indian Muslim Literature", if this genre really exists. All I want to say that the novel really explores the lives of Indian Muslim families which deal daily confusion with religious values and secularism in post partition india.
कथा जिसमें आज़ादी के तुरंत बाद की एक पढ़ी लिखी मुस्लिम युवती की मनोव्यथा , उसकी चुनौतियों , प्रेम तथा विवाह को लेकर मुस्लिम समाज मे आने वाली अड़चनों का बाकायदा बखूबी ज़िक्र है , कैसे एक लड़की , अपने महत्वाकांक्षी लगभग हमउम्र भाई से अधिक संतुलित रहते हुए घर , परिवार , कार्यक्षेत्र सब संभालती है , उसके पिता समाज के खिलाफ जाकर उसकी पढ़ाई लिखाई पर भरसक मेहनत करते हैं , भाई कट्टरपंथी राजनैतिक ताकतों के हाथों में जाकर बहक जाता है , ऐसे में एक हिंदू युवक जो उसके भाई का सहपाठी है और घनिष्ठ मित्र भी , से उसका अनजाना बन्धन बंधता है , समाज में अस्वीकृति के भय से दोनों हिचकते हैं कुल मिला कर पढ़ने योग्य है उपन्यास , धार्मिक भेदभाव , क्षेत्रीयता , जातिवाद , भ्रष्टाचार तथा देश मे हुए बंटवारे के बाद पनपी अस्थिर राजनैतिक हलचल ....सब उल्लिखित है इसमें ।क्योंकि ये हमारे समाज के अछूते अल्पसंख्यक समुदाय की नवयुवती को केंद्र में रख लिखा गया है , अतः इसमें आपको बहुत कुछ ऐसा मिलेगा जिससे एक आम मुस्लिम लड़की की दुश्वारियां समझ में आएंगीं
सूखा बरगद— मंजूर एहतेशाम की यह पुस्तक एक शहर भोपाल के बनने और एक प्रदेश की राजधानी के बनने के साथ ही मुस्लिम समुदाय के भीतर के अंतर्द्वंद और राजनीति का मजबूत ताना—बाना बुनती है। इसमें एक मुस्लिम लड़की की अधूरी डायरी के जरिए भारत की स्वतंत्रता के पहले और बाद की स्थितियों का हिंदू—मुस्लिमों के आपसी संबंध और उनके बीच बढ़ती टकराहट को बहुत अच्छी तरह से दर्शाया गया है।
मुझे थोड़ा मुश्किल होता है हिन्दी में रिव्यू लिखना। ऐसा नहीं है कि मुझे हिन्दी आती नहीं, इसीलिए की हिन्दी से जो रिश्ता मेरा रिश्ता था, न जाने क्यों, थोड़ा दूर कर लिया है। बहुत सारे कारण हो सकते है इस बिडंबना के पीछे। खैर ये महत्व बाली बात कतई नहीं हैं।
महत्व की बात ये है है कि चूकी किताब हिन्दी में लिखी गई है, इसका मूल्यांकन हिन्दी में करना अनिवार्य है। ऐसे मैंने इसे पढ़ी नहीं है, बल्कि सुनी है। और वो भी कमाल शर्मा की आवाज़ में। मंजूर एहतेशाम साहब लेखनी और कमल शर्मा जी के आवाज़ मेरे एहसास को उस जगह पहुंचा दिया जहां मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। लेखक महोदय और कमाल शर्मा जी का आवाज़ मेरे सारे एक्सपीरिएंस को यादगार बना दिया है।
मुझे थोड़ा अफसोस है कि इस पुस्तक से मेरे परिचय इतना देर से क्यों हुआ। पर खुशी की भी बात है कि हुआ तो सही। जिस संजीदगी से मंजूर एहतेशाम साहब ने किरदार का ताना बाना बिना है वो मेरे सोच से बिल्कुल परे है। लेखक महोदय ने किरदार के अंदर के अंदर बखूबी से झांके है और खूबसूरती से उसे प्रस्तुत किए हैं।
रशीदा, विजय, सोहेल के माध्यम से एक बहुत ही मार्मिक और हृदयस्प्रासी उपन्यास, जो बिना पक्ष भेद भाव के हिंदू मुस्लिम धर्मों के माध्यम से राजनीतिक और आपसी टकराव , मतभेद के कारण स्पष्ट करने का अच्छा ओर न्यायपूर्ण कोशिश करती है। उपन्यास के हर मोड पर डर और उत्सुकता रहती है कि आगे क्या होगा। सच में ये कहानी हम अपने आस पास के वातावरण में महसूस कर सकते है ।