लोक संस्कृति और पसमांदा मुसलमान परिवेष और श्रमशीलता की डोर धर्म के विभाजककारी रेशों से कहीं ज्यादा मजबूत होती है। मनुष्य, समान परिवेष और श्रमशील समाज में रहते हुए समान संस्कृतियों का निर्माण करता है और भिन्नधर्मी होते हुए भी रहन-सहन, खान-पान, सोच-समझ, रीति और प्रीति में समान आचरण करता है। आठवीं सदी में भारतीय भू-भाग में मुस्लिम धर्म के आगमन के बावजूद, लोकसमाज के परंपरागत रीति और प्रीति के तत्व बदले नहीं । देश के उत्तरी एवं पूर्वांचल के मैदानी इलाकों में मुसलमान बाहर से नहीं आये। यहीं के दुरूह कर्मकांडों, पाखंड़ों और हिन्दू धर्म की अमानवीयता से दुखी समाज ने अपनी मुक्ति के लिए मुस्लिम धर्म को अंगीकार कर लिया । मगर समाज के धर्मान्तरण के बावजूद, परिवेष और श्रमशीलता ने उन्हें आपस में बा